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बहादुर शाह ज़फरः एक बदनसीब शहंशाह, जो उतना ही शानदार शायर था

मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह बहादुर शाह ज़फर उर्दू के जाने-माने शायर थे. सल्तनत जब बिखर रही थी, तब उन्होंने हिंदुस्तानी को समेटने की कोशिश की.

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जवाहर लाल नेहरू नई दिल्ली, 07 November 2019
बहादुर शाह ज़फरः एक बदनसीब शहंशाह, जो उतना ही शानदार शायर था बहादुर शाह ज़फर [फाइल फोटो]

मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह बहादुर शाह ज़फर उर्दू के जाने-माने शायर थे. सल्तनत जब बिखर रही थी, तब उन्होंने हिंदुस्तानी को समेटने की कोशिश की. ज़फर के समय में उर्दू साहित्य खासकर उर्दू शायरी अपने चरम पर पहुंच गई थी. बहादुर शाह का जन्म 24 अक्तूबर, 1775 को दिल्ली में ही हुआ था. वह अपने पिता अकबर शाह द्वितीय की मौत के बाद  1837 में दिल्ली के बादशाह बने.

बहादुर शाह ज़फर को जीवन ने चाहे जितने झटके दिए, पर इतिहास ने उन्हें याद रखे जाने के अनगिनत मौके दिए. उन्हीं के समय में 1857 की क्रांति हुई. वही देश में राष्ट्रवाद के प्रतीक बने. उन्हीं के समय में मुगलिया सल्तनत की सीमाएं दिल्ली के मुहाने तक सिमटीं. वह पहले ऐसे शहंशाह थे, जिन्हें अपनी जन्मभूमि से दरबदर किया गया. उन्हें कालेपानी की सजा मिली थी. मुल्क से अंग्रेजों को भगाने का ख्वाब लिए 7 नवंबर, 1862 को 87 साल की उम्र में उनका इंतकाल हो गया.

बहादुर शाह ज़फर एक कवि और सूफी दार्शनिक भी थे. उन्होंने उर्दू, पर्शियन और अरेबिक की शिक्षा ली थी. उन्हें इब्राहीम जोक और असद उल्लाह खान ग़ालिब से कविताओं का शौक लगा. उन्होंने इस शौक को साहित्य साधना में तब्दील करते हुए ताउम्र साहित्य की साधना की. उन्हें सियासत से ज्यादा सूफीवाद में, संगीत और शायरी में, शब्दों और हर्फों में रूचि थी. वह साहित्य के अनुरागी थे. उनकी ग़ज़लें आज भी मुशायरों की शान हैं. उनकी कविताओं को कुल्लियत-इ-ज़फर में संग्रहित किया गया.

दर्द में डूबी उनकी शायरी में मानव जीवन की गहरी सच्चाई और भावनाएं झलकती हैं. जब वह रंगून में अंग्रेजों की कैद में थे, तब भी उन्होंने ढेरों गज़ल लिखीं. कहा जाता है कि बतौर कैदी उन्हें कलम तक नसीब नहीं थी, पर इससे बादशाह ज़फर के जज्बात थमें नहीं, उन्होंने जली हुई तीलियों से दीवार पर गजलें उकेर दीं. 

कहा जाता है कि प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब बादशाह ज़फर को गिरफ्तार किया गया, तो उर्दू जानने वाले एक अंग्रेज ने उन पर कटाक्ष करते हुए कहा-
'दम दमे में दम नहीं, अब खैर मांगो जान की
ए जफर, अब म्यान हो चुकी है, शमशीर हिन्दुस्तान की!

इस पर बहादुर शाह ज़फर ने करारा जवाब देते हुए कहा था-

'हिंदीओ में बू रहेगी जब तलक ईमान की,
तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिन्दुस्तान की!'

उनकी यह चेतावनी सही साबित हुई और आजादी के मतवाले स्वतंत्रता मिलने तक लगातार कुर्बानी देते रहे. बर्मा की राजधानी रंगून में जब वह अपने जीवन के आखिरी दौर में थे तब वतन की याद में तड़पते हुए उनके लफ्जों से निकल पड़ा−

कितना है बदनसीब ज़फर दफन के लिए
दो गज जमीन भी न मिली कूए यार में.
इन पंक्तियों में उनकी देशभक्ति के साथ ही अपनी माटी के लिए उनकी दिली  मुहब्बत भी झलकती है. उन्हें हर वक्त अपने वतन की फ़िक्र रही. उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

ज़फर को याद करते हुए साहित्य आजतक पर उनकी यह गज़ल-
बुलबुल को बागबां से न सैय्याद से गिला
किस्मत में कैद थी लिखी फ़स्ले बहार में
कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिल-ए-दाग़दार में
इक शाख़-ए-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां
कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लालाज़ार में
उम्र-ए-दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में
दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई
फैला के पांव सोएंगे कुंजे मज़ार में
कितना है बदनसीब 'ज़फ़र दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
जलाया यार ने ऐसा, कि हम वतन से चले
बतौर शमा के रोते, इस अंजुमन से चले
खुलता नहीं है हाल, किसी पर कहे बगैर
पर दिल की जान लेते हैं, दिलबर कहे बगैर
क्या ताब क्या मशाल हमारी कि बोसा लें
लब को तुम्हारे लब से मिलाकर कहे बगैर
बात करनी मुझे मुश्किल, कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तेरी महफिल, कभी ऐसी तो न थी
देखते हैं ख्वाब में जिस दिन किसू की चश्म-ए-मस्त
रहते हैं हम दो जहां से बेखबर दो दिन तलक...

उनके शब्दों को सुनकर ऐसा लगता है जैसे की उनमे दिल को छू जाने का जादू हो. उनकी साहित्यिक प्रतिभा काबिल-ए-तारीफ है. उनकी ज्यादातर गजलें जिंदगी की कठोर सच्चाई और मोहब्बत पर होती थीं. उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में रंगून में बहुत सारी गजलें लिखीं. अक्तूबर, 1858 में निर्वासन के बाद के पस्ती और टूटन भरे दिनों में अपनी तकलीफें बयान करने का उनके पास एक ही माध्यम थी- शायरी.

ज़फर को इतिहास में सम्मान केवल इस बात के लिए नहीं मिला कि वह आखिरी मुगल बादशाह थे, बल्कि उससे कहीं अधिक इस बात के लिए मिला कि उन्होंने देश के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में एक प्रभावशाली भूमिका निभाई थी.

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