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जन्मदिन विशेषः आलोक धन्‍वा, कविता में वाचिक विद्रोह व प्रेम का वैभव

साहित्‍य में एक दौर ऐसा भी रहा है कि लोग आलोक धन्‍वा को खोजने व उनसे मिलने पटना पहुंच जाया करते थे. उनके जन्‍मदिन पर उनके कवि कर्म पर रोशनी

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aajtak.in
ओम निश्चल नई दिल्ली, 02 July 2020
जन्मदिन विशेषः आलोक धन्‍वा, कविता में वाचिक विद्रोह व प्रेम का वैभव कवि आलोक धन्वा [ फाइल फोटो ]

साहित्‍य में एक दौर ऐसा भी रहा है कि लोग आलोक धन्‍वा को खोजने व उनसे मिलने पटना पहुंच जाया करते थे. अपनी क्रांतिकारी राजनीतिक कविताओं के बलबूते और बाद में बहुत बारीक संवेदना की कविताएं लिख कर आलोक धन्‍वा ने कविता में एक जगह बनाई. उनके जन्‍मदिन पर उनके कवि कर्म पर रोशनी डाल रहे हैं कवि, आलोचक डॉ ओम निश्‍चल
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जुलाई, 1948 की दो तारीख को बिहार के मुंगेर में जन्मे आलोक धन्वा हिन्दी के उन बड़े कवियों में हैं, जिन्होंने अस्सी के दशक में कविता को एक नई पहचान दी. उनकी गोली दागो पोस्टर, जनता का आदमी, भागी हुई लड़कियां, कपड़े के जूते और ब्रूनों की बेटियाँ जैसी कविताएँ बहुचर्चित रही है. वे ऐसे सौभाग्यशाली कवियों में हैं जिनकी पहली ही कविता 'वाम' पत्रिका में छपते ही वे चर्चा के केंद्र में आ गए थे. उनका एक मात्र बहुचर्चित कविता संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' 1998 में छपा. यद्यपि यह संग्रह भी काफी देर से लगभग पचास की वय में आया.

आलोक धन्वा कवि होने से अधिक एक कवि कार्यकर्ता के रूप में ज्यादा जाने पहचाने गए. उनकी कविता का पाठ्यबल संक्रामक और पाठ बहुत ही संवेदी है. अरसे तक वाचिक कवि के रूप में ही आलोक अपनी कविताओं को पढ़ते-सुनाते रहे तथा पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं सत्तर के आसपास ही छपने लगी थीं. बिहार के राजनीतिक परिदृश्य, आपातकाल, संपूर्ण क्रांति के आंदोलनों से लेकर नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रति गहरी सहानुभूति के तत्व उनकी कविताओं में देखे जा सकते हैं.

यह आलोक धन्वा का वैशिष्ट्य है कि अभी तक केवल एक संग्रह के बलबूते वे हिंदी कविता के कुछ चुनिंदा समकालीन कवियों में शुमार किए जाते हैं. उनकी हर कविता संवेदना की कूची से रची गयी है. उसे पढ़ते हुए कविता पढ़ने का रोमांच होता है. वाचिक अदायगी में भी आलोक धन्वा का पाठ प्रभावी होता है. उन्होंने अपने समय के मुद्दों को अपनी कविता की अंतर्वस्तु अवश्य बनाया किन्तु उसमें स्थूल तत्वों का परिमाण नहीं बल्कि अंत:करण की विदग्धता विद्यमान है. कविता क्या होती है, उसकी बेचैनी क्या होती है, इसे आलोक धन्वा के इस कवितांश से जाना जा सकता है, जो उनकी मशहूर कविता 'जनता का आदमी' से उद्धृत है-

बम विस्फोट में घिरने के बाद का चेहरा मेरी ही कविताओं में क्यों है?
मैं क्यों नहीं लिख पाता हूँ वैसी कविता
जैसी बच्चों की नींद होती है,
खान होती है,
पके हुए जामुन का रंग होता है,
मैं वैसी कविता क्यों नहीं लिख पाता
जैसी माँ के शरीर में नये पुआल की महक होती है,
जैसी बाँस के जंगल में हिरन के पसीने की गंध होती है,
जैसे ख़रगोश के कान होते हैं,
जैसे ग्रीष्म के बीहड़ एकांत में
नीले जल-पक्षियों का मिथुन होता है,
जैसे समुद्री खोहों में लेटा हुआ खारा कत्थईपन होता है,
मैं वैसी कविता क्यों नहीं लिख पाता
जैसे हज़ारों फ़ीट की ऊँचाई से गिरने वाले झरने की पीठ होती है ?
हाथी के पैरों के निशान जैसे गंभीर अक्षरों में
जो कविता दीवारों पर लिखी होती है
कई लाख हलों के ऊपर खुदी हुई है जो
कई लाख मज़दूरों के टिफ़िन कैरियर में
ठंढी, कमज़ोर रोटी की तरह लेटी हुई है जो कविता ?

'गोली दागो पोस्ट़र' भी अपने वक्त की जानी मानी कविता है, जिसमें लोग आठवें दशक की नाराज कविता का अक्स देखा करते थे. किसानों-मजदूरों के लिए लामबंद कवियों की पीढ़ी में आलोक धन्वा सबसे तेजस्वी कवि हैं, जिन्होंने उस दौर में किसानों-मजदूरों से जुड़ी सबसे ज्यादा तेजाबी कविताएं लिखीं. इस कविता का आखिरी अंश देखें जो कवि के सरोकारों का सूचकांक है :

जिस ज़मीन पर
मैं अभी बैठकर लिख रहा हूँ
जिस ज़मीन पर मैं चलता हूँ
जिस ज़मीन को मैं जोतता हूँ
जिस ज़मीन में बीज बोता हूँ और
जिस ज़मीन से अन्न निकालकर मैं
गोदामों तक ढोता हूँ
उस ज़मीन के लिए गोली दागने का अधिकार
मुझे है या उन दोग़ले ज़मींदारों को जो पूरे देश को
सूदख़ोर का कुत्ता बना देना चाहते हैं

यह कविता नहीं है
यह गोली दागने की समझ है
जो तमाम क़लम चलाने वालों को
तमाम हल चलाने वालों से मिला रही है.
***

कविता में आक्रोश

जमीन को जोतने बोने वालों के प्रति हमदर्दी का आलम यह कि धूमिल के बाद आठवें दशक में सबसे आक्रोशधर्मी कविताएं आलोक धन्वा की ही रही हैं. उनका अपना कवि मिजाज भी है कि वे ही यह कह सकते हैं कि 'सरकार ने नहीं-इस देश की सबसे सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया.' हालांकि इस कविता में ही एक जगह रेड़ के पौधे को दारोगा के भैंसे द्वारा चरने का बिम्ब आता है- बहन के पैरों के आस-पास/ पीले रेड़ के पौधों की तरह/ उगा था जो मेरा बचपन-उसे दरोग़ा का भैंसा चर गया; जिसका जिक्र चलने पर कभी शिवप्रसाद सिंह से धूमिल ने कहा था, यह असंगत बिम्ब है क्योंकि रेड़ का पौधा तो बकरी भी नही चरती फिर भैंसा क्यों चरेगा, चाहे वह दारोगा का ही भैंसा क्यों नहीं हो. तथापि सफेद रात, किसने बचाया मेरी आत्मा को, भागी हुई लड़कियां, ब्रूनों की बेटियां, जिलाधीश, कपड़े के जूते तथा एक जमाने की कविता पढ़ते हुए लगता है, भाषा कैसे चांदनी की तरह हमारी आत्मा में झरती है. 'जिलाधीश' कविता नए दिमागों के जिलाधीशों पर निगरानी की अपील है क्योंकि वह हमें आजादी से दूर रख सकता है -

यह दूर किसी किले में- ऐश्वर्य की निर्जनता में नहीं
हमारी गलियों में पैदा हुआ एक लड़का है
यह हमारी असफलताओं और गलतियों के बीच पला है
यह जानता है हमारे साहस और लालच को
राजाओं से बहुत ज़्यादा धैर्य और चिन्ता है इसके पास

यह ज़्यादा भ्रम पैदा कर सकता है
यह ज़्यादा अच्छी तरह हमे आजादी से दूर रख सकता है
कड़ी
कड़ी निगरानी चाहिए
सरकार के इस बेहतरीन दिमाग पर !

कभी-कभी तो इससे सीखना भी पड़ सकता है !
***

कविता-कार्यकर्ता

आलोक धन्वा जितना एक एक्टिविस्ट पोएट के रूप में सफल हैं, उतना ही अपने निजीपन के लिए कविता में जाने जाते हैं. उनके कवि के भीतर एक भावुक कवि मन विद्यमान है जो उनसे 'एक जमाने की कविता' जैसी कविता भी लिखवाता है, जिसमें वह अपनी अनपढ़ मां के लोकगीतों को याद कर उसे अनाम ग्राम कवि कह कर याद करता है. एक नास्टैल्जिया भी उनकी कविताओं में दिखता है, जो उनके कवित्व में ओस सी ठिठकी नमी की याद दिलाता है. आलोक धन्वा सदैव तीखी कविताओं के कवि हों, ऐसा नहीं है, सफेद रात जैसी अनेक ऐसी कविताएं हैं जिनमें उनका पदलालित्य बोलता है. सघन सांद्र संवेदनशील भाषा दिल को छूती और विचलित करती हुई निकल जाती है. नींद, प्या‍र, नदियां, शरद की रातें, चौक, किसने बचाया मेरी आत्मा को, आम का पेड़, छतों पर लड़कियां, समुद्र और चांद, पानी, मैटिनी शो, चेन्नई में कोयल, बारिश, ओस और आम के बाग़ ऐसी ही कविताएं हैं जहां लगता है आलोक धन्वा ने दिल में डूब कर कविताएं लिखी हैं. 'अचानक तुम आ जाओ' ऐसी ही कविता है. इस कविता की कुछ पंक्तियां :

घनी आबादी का देश मेरा
कितनी औरतें लौटती हैं
शाम होते ही
अपने-अपने घर
कई बार सचमुच लगता है
तुम उनमें ही कहीं
आ रही हो
वही दुबली देह
बारीक चारख़ाने की
सूती साड़ी
कन्धे से झूलता
झालर वाला झोला
और पैरों में चप्पलें.
***

कविता: शब्‍दों की मंडी नहीं

आलोक धन्वा ने बेशक कम लिखा है लेकिन उनकी कविता न अपने समय के सरोकारों से मुँह मोड़ती है न कविता को केवल राजनीतिक परचम की तरह लहराती है. एक घने कवि-विवेक से परिचालित आलोक धन्वा सत्तर के बाद की पीढ़ी के सबसे संजीदा कवियों में रहे हैं, जिन्होंने कविता को कठिन शब्दों की मंडी न बनाकर उसे संवेदना का वाहक बनाया है. उनकी वाचिक अदायगी भी संवेदना के रस में भीगी लगती है.

पटना में अनेक बार उनसे मुलाकातें हुई हैं. मेरे संज्ञान में बिहार के दो कवि ऐसे रहे जो अपने रहन-सहन और अपनी कवि छवि से दूर से ही पहचाने जाते हैं. आलोक धन्वा और ज्ञानेन्द्रपति. दोनों लगभग ग्राहस्थ्‍य वैराग्य जीने वाले. आलोक धन्वा पटना में ही रह गए. यायावरी में कहीं गए भी तो ज्यादा दिन टिक न सके. ज्ञानेंद्रपति ने पटना छोड़ कर बनारस की शरण ली. यायावरी उन्हें भी बहुत रास नहीं आती पर काशी के चप्पे चप्पे को उन्होंने अपनी काव्य वस्तु बनाया है. उस तरह आलोक धन्वा ने स्थानिकता की छाया अपनी कविता पर नहीं पड़ने दी. हां राजनीतिक आंदोलनों की छाया उनकी कविताओं में जरूर नजर आती है, जिसके चलते उन्होंने आक्रोश से भर कर अनेक कविताएं लिखीं. जबकि ज्ञानेन्‍द्रपति ने काशी और गांगेय इलाके को अपना ठीहा बनाया. '75 के लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने दोनों कवियों को प्रेरित किया. ज्ञानेन्द्र पति की 'भिनसार' में संकलित अधिकांश कविताएं उसी जेपी मूवमेंट की देन है, जिससे रेणु, नागार्जुन, आलोक धन्वा, ज्ञानेंद्रपति सहित अधिकांश लेखक प्रभावित हुए.

यह अचरज ही है कि पहले संग्रह के बाद उनका अन्य कोई संग्रह नहीं आया. इसलिए इसके लगभग डेढ़ दशक बाद जब उनकी कुछ कविताएं आईं तो वे चर्चा का विषय बनीं. यह भी तब संभव हुआ जब वे अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्ववविद्यालय वर्धा में राइटर इन रेजीडेंस के रूप में रहे. उस अपार एकांत ने ही उनसे करीब दो दर्जन नई कविताएं लिखवाईं, जो प्रकाशित हुईं तो यह हिंदी की दुनिया के लिए खबर जैसी थीं कि जैसे आलोक फिर से कविता की दुनिया में सक्रिय होकर लौट आए हैं. पर वह एक संयोगमात्र था. उन्हीं दिनों लिखी गयी एक कविता-

कवि मरते हैं
जैसे पक्षी मरते हैं
गोधूलि में ओझल होते हुए!

सिर्फ़ उड़ानें बची रह
जाती हैं

दुनिया में आते ही
क्यों हैं
जहाँ इंतज़ार बहुत
और साथ कम

स्त्रियाँ जब पुकारती हैं
अपने बच्चों को
उनकी याद आती है!

क्या एक ऐसी
दुनिया आ रही है
जहाँ कवि और पक्षी
फिर आएंगे ही नहीं!

एक बार एक पत्रकार के यह पूछने पर कि आप किन कवियों, विचारकों से प्रभावित रहे हैं, आलोक धन्वा ने कहा था,''सूरदास, मीरा और कबीर मेरे मन के बहुत निकट रहे हैं. बांग्ला के कवियों चंडीदास, रामप्रसाद का भी मुझ पर प्रभाव पड़ा है. रबींद्रनाथ ठाकुर, काजी नजरूल इस्लाम की भी कविताएं पढ़ता था. कभी-कभी मराठी के संत तुकाराम की कविताएं भी पढ़ लेता था. भक्तिकालीन कवि ईश्वर से संवाद करते थे, ऐसा माना जाता है. कविताओं से इतर बात करें तो प्रेमचंद, शरतचंद, रबींद्रनाथ ठाकुर के उपन्यासों ने मेरे मन का विस्तार किया. वॉल्ट ह्विटमैन, लियो टॉलस्टॉय, गोर्की, हेमिंग्वे, सा‌र्त्र, कामू, सिमोन द बोउवा आदि विदेशी साहित्यकारों से भी मैं प्रभावित रहा. राजनीतिक विचारकों में मैं लेनिन, फिदेल कास्त्रो और नेल्सन मंडेला के विचारों से सहमत हूं.''

आलोक धन्वा को उनकी रचनाधर्मिता के लिए पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फिराक गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, भवानी प्रसाद मिश्र स्मृति सम्मान मिल चुका है. वे बिहार संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष भी रहे हैं. बहुत बेफिक्र इंसान और कवि होते हुए भी आलोक धन्वा को पकड़ पाना बहुत मुश्किल है. वे अक्‍सर अपनी ही सुविधा से मिलते हैं. मैं चार साल पटना रहा, उसके पहले उनसे घर पर कई मुलाकातें रहीं जब उनकी पत्नी क्रांति भट्ट जी भी वहीं थीं. पर पटना प्रवास के दौरान सार्वजनिक मंचों को छोड़ कर उनसे बहुत कम मिलना हो सका. अनेक साहित्यकारों से बातचीत के क्रम में अनेक बार उनसे बातचीत की योजना बनाई पर हर बार मेरे प्रयास विफल हुए. इस तरह वे जैसे बातचीत और अपने कवि व्यक्तित्व के प्रदर्शन से लगभग विमुख ही रहते आए हैं. हॉं, इन दिनों वे सोशल मीडिया पर अवश्‍य सक्रिय दिखते हैं अपनी पसंद को लेकर. किसी की पोस्‍ट अच्‍छी लगी तो वे उसे निर्ब्‍याज साझा भी करते हैं. अपने दौर के युवा कवि-कवयित्रियों के लिखे पर खुश दिखते हैं कि युवा पीढ़ी आज बहुत अच्छा लिख रही है.

आलोक धन्वा ने अपनी पीठ पर कभी शब्दों की फसल नहीं ढोई. कम लिख कर वे सबके चहेते कवि बने रहे. उनके वाचिक काव्यपाठ का दबदबा भी रहा है तथा आकर्षण भी. पर वे अज्ञेय की तरह सहज ही काव्यपाठ के लिए उत्सु‍क नहीं दिखते. उन्हें सुनने वालों का वाजिब जमावड़ा हो और उपयुक्त माहौल तभी वे कविता सुनाने के लिए प्रस्तुत हो सकते हैं. उनके मित्रों में वीरेन डंगवाल नहीं रहे, उन्हें सबसे ज्यादा याद करते हैं, मंगलेश डबराल, असद जैदी को याद करते हैं. उस पीढी को याद करते हैं जो अब धीरे धीरे हमसे बिदा हो रही है. कम लिख कर ख्याति अर्जित करने का उनके अलावा अन्य कोई उदाहरण हिंदी में नहीं है.
***

# लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. इनकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, भाषा में बह आई फूल मालाऍं:युवा कविता के कुछ रूपाकार व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. युवा कवियों पर लगातार लिखने का श्रेय उन्हें जाता है. हिंदी अकादमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उत्तशर प्रदेश हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब के शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मोबाइल 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

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