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सृजन व संवाद में डूबा साहित्योत्सव 2020 आयोजन की गुणवत्ता के चलते रखा जाएगा याद

साहित्य अकादमी का सालाना जलसा 'साहित्योत्सव' अपनी सृजनात्मकता के लिए लंबे समय तक याद रखा जाएगा. पूरे सप्ताह विचार, सम्मान, संस्मरण, सृजन, अनुवाद और ज्ञानवर्धन के सत्र आयोजित होते रहे

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 03 March 2020
सृजन व संवाद में डूबा साहित्योत्सव 2020 आयोजन की गुणवत्ता के चलते रखा जाएगा याद साहित्योत्सव में एनबीटी के अध्यक्ष गोविंद प्रसाद शर्मा व अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव

नई दिल्लीः पुस्तकों को आम जन जीवन से जोड़ने की चुनौती आज प्रमुख है. इसके लिए लेखकों को भी आगे आकर पाठकों को खोजना होगा. यह विचार भारत में प्रकाशन की स्थिति पर आयोजित परिचर्चा के उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के अध्यक्ष गोविंद प्रसाद शर्मा ने व्यक्त किए. साहित्य अकादमी के वार्षिक मेले साहित्योत्सव के दौरान आयोजित चर्चा के उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने पुस्तकों के मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए. उन्होंने प्रकाशकों से अनुरोध किया कि वे पुस्तक प्रकाशन को समाज कल्याण की दृष्टि से देखें.

साहित्यिक पुस्तकों की घटती बिक्री पर चिंता व्यक्त करते हुए शर्मा ने कहा कि ऐसा कई कारणों से हो रहा है, लेकिन प्रमुख कारण है कि हम विद्यालय स्तर पर बच्चों में साहित्य पढ़ने की रुचि विकसित नहीं कर पा रहे हैं. सत्र के आरंभ में साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने उनका स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी लगभग 200 नई पुस्तकें प्रतिवर्ष प्रकाशित करती है और लगभग 300 पुस्तकों का पुनर्मुद्रण करती है, लेकिन हम भी पुस्तकों की बिक्री में लगातार गिरावट देख रहे हैं. हमें इस चुनौती से मिलकर लड़ना होगा.

याद रहे कि केंद्रीय साहित्य अकादमी का यह सालाना जलसा 'साहित्योत्सव' अपनी सृजनात्मकता के लिए लंबे समय तक याद रखा जाएगा. पूरे सप्ताह विचार, सम्मान, संस्मरण, सृजन, अनुवाद और ज्ञानवर्धन के सत्र आयोजित होते रहे. न केवल देश भर के विभिन्न भाषाओं के नामीगिरामी साहित्यकार बल्कि बच्चों एवं युवा लेखकों को भी इस दौरान अवसर दिया गया. बच्चों के लिए विभिन्न साहित्यिक गतिविधियां आयोजित हुईं, जिसमें कविता-कहानी लेखन प्रतियोगिता, चित्रकला प्रतियोगिता के साथ ही बाल साहित्यकारों के लिए बाल कहानियां सुनाने जैसे कई आयोजन किए गए.

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बच्चों के लिए आयोजित कहानी एवं कविता प्रतियोगिता का विषय पर्यावरण पर केंद्रित था, जिसे जूनियर और सीनियर वर्गों में बांटा गया था. प्रतियोगिता में विभिन्न विद्यालयों से आए लगभग 150 विद्यार्थियों ने भाग लिया. प्रतियोगिता अंग्रेज़ी एवं हिंदी भाषा में आयोजित की गई थी. प्रत्येक वर्ग में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार बच्चों को दिए गए. बच्चों को दीपा अग्रवाल एवं मधु पंत ने अंग्रेज़ी एवं हिंदी में रोचक कहानियां भी सुनाईं. बच्चों ने चित्रकला प्रतियोगिता में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

अगला सत्र 'कथा साहित्य की वर्तमान प्रकाशन स्थिति' पर आधारित था, जिसकी अध्यक्षता निर्मल कांति भट्टाचार्जी ने की. इस सत्र में कार्तिका वी.के., अदिति माहेश्वरी गोयल, प्रीति शिनॉय और पारमिता सत्पथी ने भाग लिया. कार्तिका वी.के. ने कहा कि युवा पीढ़ी की प्राथमिकता अब किताब नहीं है. हमें नए लेखकों के साथ-साथ नए पाठकों की भी जरूरत है और इसके लिए दोनों के बीच एक संवाद जरूरी है.

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उन्होंने अनुवाद की बढ़ती संख्या पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा कि अब यह केवल अंग्रेज़ी से नहीं बल्कि कई क्षे़त्रीय भाषाओं से किया जा रहा है. उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि इधर के वर्षों में अच्छा साहित्य विभिन्न भाषाभाषी क्षेत्रों से आया है. वाणी प्रकाशन का प्रतिनिधित्व कर रही अदिति माहेश्वरी गोयल ने कहा कि दूसरे देशों की तरह हमारे देश में भी इस क्षेत्र में सरकारी सहयोग की आवश्यकता है. जीएसटी के चलते प्रकाशन उद्योग प्रभावित हुआ है. प्रीति शिनॉय ने कहा कि लेखकों को भी पाठकों की वर्तमान रुचि का ध्यान रखते हुए कार्य करना चाहिए.

ओड़िआ लेखिका पारमिता सत्पथी ने कहा कि ओड़िआ लेखक, अनुवादक को रॉयल्टी देते वक्त भी प्रकाशक को जीएसटी देना पड़ता है, जिसका प्रभाव प्रकाशन पर भी पड़ा है. अपने अध्यक्षीय भाषण में निर्मलकांति भट्टाचार्जी ने कहा कि पाठ्य पुस्तकों के प्रकाशन में भी यदि साहित्यिक प्रकाशकों से सहयोग लिया जाए तो इस क्षेत्र में आ रही गिरावट को रोका जा सकता है. उन्होंने भारतीय भाषाओं के अनुवाद को ज्यादा प्रकाशित करने की अपील की.

प्रख्यात कवि अरुण कमल की अध्यक्षता में संपन्न सत्र कविता प्रकाशन की वर्तमान स्थिति पर था, जिसमें आलोक श्रीवास्तव एवं अरुंधति सुब्रमण्यम ने बातचीत की. आलोक श्रीवास्तव ने कविता के महत्त्व पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कविता जीवन की जरूरत है और वह हमेशा बनी रहेगी. कविता पुस्तकों की निरंतर मांग यह प्रदर्शित करती है कि हमारा समाज अभी जीवित है. अरुंधति सुब्रमण्यम ने कहा कि सोशल मीडिया के प्रति बढ़ती रुचि के कारण लेखकों, कवियों ने दूसरों की रचनाएं पढ़ना बंद कर दिया है, जो कि चिंताजनक है.

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सत्र के अध्यक्ष अरुण कमल ने कहा कि कविता हाल के वर्षों में ज्यादा लोकतांत्रिक हुई. कोई भी समाज तभी तक जीवित रहेगा जब तक उसके लोग कविता लिखते और पढ़ते रहेंगे. उन्होंने मलयाळम्, मराठी एवं बाङ्ला में कविता की अच्छी बिक्री का उल्लेख करते हुए कहा कि पंजाबी, उर्दू एवं ओड़िआ में कविता की बिक्री कम हुई है. श्रोताओं द्वारा पूछे गए कई सवालों का जवाब भी प्रतिभागियों द्वारा दिया गया.

साहित्योत्सव में नई फ़सल शीर्षक से अखिल भारतीय युवा लेखक सम्मिलन भी आयोजित हुआ, जिसका उद्घाटन प्रख्यात कन्नड लेखक सिद्धलिंगैया ने किया. इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि असमिया के प्रख्यात लेखक ध्रुव ज्योति बोरा थे.

इस आखिरी दिन आयोजित अन्य सत्रों में विभिन्न भारतीय भाषाओं युवा लेखकों के साथ के.पी. रामनुन्नी की अध्यक्षता में ‘मैं क्यों लिखता/लिखती हूं ?’, गौरहरि दास की अध्यक्षता में ‘लेखन: जुनून या व्यवसाय ?’ तथा रामकुमार मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में ‘मैं और मेरी पीढ़ी का साहित्य’ विषयों पर चर्चा हुई. प्रकाश भातंब्रेकर एवं शीन काफ़ निज़ाम की अध्यक्षता में कहानी एवं कविता-पाठ का भी आयोजन हुआ.

इसके पहले दिन, 'अनुवाद कला: सांस्कृतिक दायित्व' और 'मीडिया और साहित्य: सूचना एवं संवेदना' शीर्षक से दो परिचर्चाएं आयोजित की गईं तथा शाम को महमूद फ़ारूक़ी द्वारा दास्तानगोई प्रस्तुत किया गया. पहले से ही जारी प्रादेशिकता, पर्यावरण और साहित्य विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी भी संपन्न हुई.

इस दिन 'अनुवाद कला: सांस्कृतिक दायित्व' विषयक संगोष्ठी का उद्घाटन प्रख्यात मराठी कवि एवं अनुवादक चंद्रकांत पाटील ने किया. अपने उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने कहा कि अनुवाद केवल शब्दों का अनुवाद नहीं बल्कि शब्दों के साथ जुड़ी एक पूरी संस्कृति का अनुवाद होता है. केवल सृजनात्मक रचनाओं के अनुवाद को ही हम अनुवाद की श्रेणी में रख सकते हैं और यह काम सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण होता है. दूसरे शब्दों में कहे तो जिस भाषा से हम अनुवाद कर रहे हैं उस भाषा की संस्कृति की जितनी ज्यादा जानकारी अनुवादक को होगी, अनुवाद उतना ही सुंदर हो सकेगा.

शरतचंद्र, प्रेमचंद, मंटो से लेकर अमृता प्रीतम तक का लेखन, जो हमारे देश की साहित्यिक धरोहर हैं अनुवाद के कारण ही संभव हैं. जैसे पृथ्वी पर वही चीजें ज्यादा समय तक जीवित रहती हैं जो जैविक विविधता से परिपूर्ण होती है. उसी तरह वही अनुवाद लंबे समय तक जीवित रहेगा, जो देश की भाषाई विविधता को अपने में समेटेगा.

इस परिचर्चा का अध्यक्षीय वक्तव्य अकादमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने दिया. उन्होंने कहा कि अनुवाद की प्राचीन परंपरा के कारण ही भारत आज एक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है. उन्होंने अनुवाद के लिए अंग्रेज़ी पर निर्भरता की बजाए भारतीय भाषाओं में परस्पर अनुवाद पर जोर दिया. सत्र के अंत में साहित्य अकादमी द्वारा अनुवाद पर अवधेश कुमार सिंह के संपादन में प्रकाशित की गई महत्त्वपूर्ण पुस्तक हिंदी अनुवाद विमर्श (दो खंड) का विमोचन भी किया गया.

अगले सत्र में सुकृता पॉल कुमार की अध्यक्षता में गुजराती के आलोक गुप्त, उर्दू के जानकी प्रसाद शर्मा, ओड़िआ की प्रवासिनी महाकुड, हिंदी की रेखा सेठी ने अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद के समय सांस्कृतिक विविधता के कारण आनेवाली परेशानियों का जिक्र किया.

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सुकृता पॉल कुमार ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि वर्तमान में अनुवादों का चयन बाजार के दवाब में हो रहा है, जो कि स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है. अनुवाद की पूरी प्रक्रिया रस्सी पर संतुलन के समान है जहां जरा सी भी नजर चूकने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है.

'मीडिया और साहित्य: सूचना एवं संवेदना' विषयक दूसरी परिचर्चा के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रख्यात पत्रकार एवं राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत के पूर्व अध्यक्ष बल्देव भाई शर्मा थे. अपने उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने कहा कि बिना संवेदनशीलता के की गई पत्रकारिता मानवता के लिए बेहद हानिकारक है. पत्रकारिता में संवेदना लाना इसलिए आवश्यक है कि वर्तमान में मीडिया की पहुंच बहुत व्यापक है और उसका तत्कालिक प्रभाव भी बहुत तेजी से सामने आता है.

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हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के कई उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में पत्रकारिता साहित्य से ही परिष्कृत होकर निकली है, अतः वह हमेशा संवेदना से पूर्ण रही है. संयुक्ता दासगुप्ता की अध्यक्षता में अगले सत्र में अकु श्रीवास्तव, बलदेवराज गुप्ता, डी. उमापति एवं मधु आचार्य ने अपने विचार व्यक्त किए.

अकु श्रीवास्तव ने पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारा पूरा नजरिया उदारवाद आने के बाद बदल गया है. हम केवल निंदा कर रहे हैं लेकिन कोई समाधान नहीं ढूंढ़ रहे हैं. समाचारों को तुरंत कहने की जल्दी में हम तथ्यों की जांच भलीभांति नहीं कर रहे हैं और यही विवाद का कारण है. बलदेवराज गुप्ता ने समाचार पत्रों की बिगड़ती भाषा पर गहरी चिंता जताई. मधु आचार्य ने समाज और सत्ता के ढाँचे में आए बदलाव की तरफ इशारा करते हुए कहा कि इस कारण पूरे समाज की संवेदनाएं नष्ट हुई हैं.

प्रख्यात दास्तानगो महमूद फ़ारूक़ी ने 'दास्तान-ए कर्ण अज़ महाभारत' प्रस्तुत किया. महाभारत के पात्र कर्ण के जीवन पर आधारित यह दास्तान मूल संस्कृत महाभारत, जो फ़ैज़ी और अब्दुर्रहीम ख़ान-ए ख़ाना की देखरेख में सम्राट अकबर द्वारा कराए गए फ़ारसी अनुवाद 'रम्ज़नामा' के नाम से मशहूर है, को आधार बना कर प्रस्तुत की गई. कुल मिलाकर साहित्योत्सव अपने आयोजन की गुणवत्ता के चलते लंबे समय तक याद रखा जाएगा.

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