ये आत्मा की अभिव्यक्ति हैं: साहित्य अकादमी की 'ललित निबंध: स्वरूप एवं परंपरा' विषयक संगोष्ठी

साहित्य अकादमी ने ‘ललित निबंध: स्वरूप एवं परंपरा’ विषय पर एक द्वि-दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया. जिसके उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने की और आरंभिक वक्तव्य हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक चित्तरंजन मिश्र ने दिया.

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aajtak.in नई दिल्ली, 28 August 2019
ये आत्मा की अभिव्यक्ति हैं: साहित्य अकादमी की 'ललित निबंध: स्वरूप एवं परंपरा' विषयक संगोष्ठी साहित्य अकादमी सभागार में 'ललित निबंध: स्वरूप एवं परंपरा' विषयक संगोष्ठी

नई दिल्लीः साहित्य अकादमी ने ‘ललित निबंध: स्वरूप एवं परंपरा’ विषय पर एक द्वि-दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया. जिसके उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने की और आरंभिक वक्तव्य हिंदी परामर्श मंडल के संयोजक चित्तरंजन मिश्र ने दिया. उद्घाटन वक्तव्य श्याम सुंदर दुबे का था और बीज वक्तव्य श्रीराम परिहार द्वारा प्रस्तुत किया गया.

स्वागत भाषण में साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने ललित निबंध की विशेषताओं को बताते हुए कहा कि ललित निबंध के लिए शब्दों और भावों का उचित संयोजन ज़रूरी है. इसके लिए ख़ास तरह की एकाग्रता और निपुणता की आवश्यकता होती है. इसीलिए यह हिंदी साहित्य की सबसे कठिन विधाओं में से एक है.

प्रख्यात समालोचक चित्तरंजन मिश्र ने कहा कि ललित निबंध आत्मा की अभिव्यक्ति है. इसे यों भी कह सकते हैं कि अपनी आत्मा की आवाज़ को दूसरे तक पहुँचाने की कोशिश ही ललित निबंध है. ललित निबंध आत्मा की खबर है. अतः इसे आत्मव्यंजक निबंध भी कहा जाता है. ललित निबंध की उत्कृष्टता, ज्ञान और अनुभव के सामंजस्य पर निर्भर करती है. मिश्र ने कहा कि लोक तत्त्व में सभी बातें समाहित होती हैं, वैसे ही ललित निबंध में साहित्य के सभी तत्त्व शामिल होते हैं. अर्थात् ललित निबंध साहित्य में लोक तत्त्व का सबसे बड़ा आश्रयदाता है.

प्रख्यात हिंदी लेखक श्यामसुंदर दुबे ने उद्घाटन वक्तव्य में ललित निबंध के सामने खड़ी चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी साहित्य की किसी भी विधा ने इतनी बाधाओं का सामना नहीं किया होगा. उन्होंने ललित निबंध की लोकप्रियता के संदर्भ में सामर्थ्यशाली पाठकों की चर्चा की. आगे उन्होंने कहा कि इतने प्रश्नों, संदेहों के बावजूद भी अगर ललित निबंध का विकास हो रहा है तो यह उसकी जीवटता और सामर्थ्यवान होने का ही सबूत है. लोक और शास्त्र की जुगलबंदी ही अच्छे ललित निबंध की पृष्ठभूमि होती है और ललित निबंध पाठकों को भाषायी दृष्टि से समृद्ध बनाने की प्रक्रिया है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सनातन स्मृतियों से जोड़ने की सामर्थ्य केवल ललित निबंध में है.

प्रख्यात हिंदी लेखक श्रीराम परिहार ने अपने बीज वक्तव्य में ललित निबंध की विस्तृत परिभाषा देते हुए कहा कि शास्त्र और सृजन के बीच विकसित विधा ही ललित निबंध है. ललित निबंध काल की चक्रीय स्थिति का अनुसरण करता है और उनमें जीवन की व्यापकता होती है. अर्थात् भाव और विचार के उद्वेग को रम्य भाषा में प्रकट करने वाली विधा ही ललित निबंध है.

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि आज के दुविधाग्रस्त समाज में हमारी सांस्कृतिक गरिमा को प्रस्तुत करने का काम ललित निबंध कर रहे हैं. ललित निबंध ने साहित्य को पठनीय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
 
संगोष्ठी का प्रथम सत्र ‘निबंध के परिसर में ललित निबंध का रहवास’ विषय पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता अनंत मिश्र ने की और कृष्ण कुमार सिंह एवं कलाधर आर्य ने अपने आलेख प्रस्तुत किए. कृष्ण कुमार सिंह ने अपने आलेख में कहा कि लोक और पांडित्य में सामंजस्य ज़रूरी है तभी ललित निबंध ग्राह्य होंगे.

कलाधर आर्य ने ललित निबंध की शैली पर विमर्श करते हुए गुजराती में इस परंपरा के लेखकों- उमाशंकर जोशी, काका कालेकर आदि के योगदान का उल्लेख करते हुए बताया कि इन निबंधों में भाव तत्त्व की अनिवार्यता रही है. सत्र के अध्यक्ष अनंत मिश्र ने कहा कि हमारी दृष्टि का क्षरण होता जा रहा है और इसीलिए ललित निबंध लेखन कम होता जा रहा है. बाजारवादी, उपभोक्तावादी, विरोधाभासी समय ने हमारी संवेदनशीलता को प्रभावित किया है और इसके कारण हम ललित निबंध को समग्रता में समय नहीं दे पा रहे हैं.
 
इस कार्यक्रम का द्वितीय सत्र ‘ललित निबंध का सांस्कृतिक परिसर’ पर केंद्रित था, जिसकी अध्यक्षता चित्तरंजन मिश्र ने की और इंदुशेखर तत्पुरुष एवं श्रीराम परिहार ने आलेख-पाठ किया. इंदुशेखर तत्पुरुष ने संस्कृति के विभिन्न पक्षों और उनके राजनैतिक विमर्शों की चर्चा विस्तार से की. उन्होंने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और नामवर सिंह के लिखित निबंधों से कई उदाहरण प्रस्तुत किए.

श्रीराम परिहार ने ललित निबंध को पूर्णतया भारतीय विधा मानते हुए कहा कि इसके संदर्भ हमारे बहुत पुराने संस्कृत साहित्य में उपलब्ध हैं. भारतीय संस्कृति के पाँच तत्त्वों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय ललित निबंध ने विभिन्न सभ्यताओं और परंपराओं को अपने साथ लिया है और एक अपनी समग्र सांस्कृतिक दृष्टि विकसित की है.

सत्र के अध्यक्ष चित्तरंजन मिश्र ने कहा कि ललित निबंध संस्कृति के स्वरूप पर पुनर्विचार करता है और संस्कृति में आई गिरावट को भी दर्ज करता है. उन्होंने शास्त्र और लोक की तुलना करते हुए कहा कि दोनों में द्वंद्व होना चाहिए तभी स्वस्थ संस्कृतियों का विकास होता है. कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादमी के संपादक अनुपम तिवारी ने किया. कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे. अगले दिन ‘ललित निबंध परंपरा: पूर्वरंग’ एवं ‘ललित निबंध परंपरा: उत्तर रंग’ विषयक सत्र आयोजित हैं.

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