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स्वदेशी भाषाओं को बचाना जरूरीः भारतीय मैक्सिकाई लेखक सम्मिलन में राजदूत लोत्फ़े

भारत और मैक्सिको की संस्कृतियाँ बेहद प्राचीन हैं और दोनों के संबंध भी हमेशा से रहे हैं. दोनों देश की भाषाओं में परस्पर अनुवाद के जरिए ही हम एक दूसरे के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 13 November 2019
स्वदेशी भाषाओं को बचाना जरूरीः भारतीय मैक्सिकाई लेखक सम्मिलन में राजदूत लोत्फ़े साहित्य अकादेमी में आयोजित भारतीय मैक्सिकाई लेखक सम्मिलन

नई दिल्लीः भारत में मैक्सिको के राजदूत फेदेरिको सालास लोत्फ़े ने बहुमंडलीकरण के दौर में स्थानीय, देशज भाषाओं को बचाने पर बल दिया है. मैक्सिको के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वहाँ चौसठ भाषाएँ हैं और ये सभी स्वदेशी भाषाएँ अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं.

लोत्फ़े साहित्य अकादेमी तथा भारत में मैक्सिको राजदूतावास के सहयोग से आयोजित भारतीय मैक्सिकाई लेखक सम्मिलन के दौरान बोल रहे थे. यूनेस्को द्वारा इस वर्ष को अंतर्राष्ट्रीय स्वदेशी भाषा वर्ष घोषित करने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हमें इन भाषाओं को बचाने के लिए और महत्त्वपूर्ण काम करना है.

राजदूत फेदेरिको सालास लोत्फ़े ने यह भी कहा कि मैं इस कार्यक्रम को सम्मिलन की जगह संवाद कहना चाहूँगा. इस संवाद में हम तय कर पाएँगे कि आने वाले समय में हमें भारत और मैक्सिको के बीच आगे क्या करना है.  

अकादमी सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम के आरंभ में स्वागत भाषण देते हुए साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने कहा कि दोनों देशों की संस्कृतियाँ बेहद प्राचीन है और दोनों के संबंध भी हमेशा से रहे हैं. दोनों देश की भाषाओं में परस्पर अनुवाद के जरिए ही हम एक दूसरे के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं.

उनका कहना था कि भारत और मैक्सिको, दोनों ही देशों का प्राचीन साहित्य और स्वतंत्रता के बाद का साहित्य बेहद समृद्ध है और उसे विभिन्न विधाओं में बखूबी व्यक्त किया गया है. उन्होंने साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित स्पेनिश साहित्य की जानकारी देते हुए बताया कि दोनों देशों के बीच यह आदान-प्रदान लगातार चलता रहेगा.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्पेनिश भाषा केन्द्र के अध्यक्ष रहे एस. पी. गांगुली ने भारत और मैक्सिको के बीच विभिन्न भाषाओं में अनुवाद की प्राचीन परंपरा की जानकारी देते हुए कहा कि भारत में एक हजार से ज्यादा भाषाएं होने के कारण यहां की अनुवाद प्रक्रिया पश्चिमी देशों से बिल्कुल अलग है. उन्होंने बाङ्ला और लैटिन अमेरिकी देशों के बीच अनुवाद की विशेष जानकारी देते हुए कहा कि बाङ्ला कवियों के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नामों में शुमार शंख घोष से लेकर बुद्धदेव दास तक सभी वहाँ से प्रेरणा लेते रहे हैं और अनुवाद में भी सक्रिय रहे हैं. उन्होंने सेसार व्याख्यो की कविताओं के बाङ्ला अनुवादों की चर्चा की, जिसे साहित्य अकादेमी ने प्रकाशित किया है.
   
मैक्सिको से आई कवियत्री नादिया लोपेज़ गार्सिया ने अपनी भाषा को बचाने में आ रही मुश्किलों का जिक्र करते हुए अपनी कुछ कविताएं सुनाईं. कार्यक्रम में मौजूद दूसरे मैक्सिको रचनाकारों में कोस्में आल्वारेज़, गिल्येरमो चावेज़ कोनेख़ो ने भी अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं.
 
प्रख्यात मलयाळी कवि एवं आलोचक के. सच्चिदानंदन ने स्वयं द्वारा अनूदित विश्व कवियों की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद के पंद्रह खंडों की जानकारी देते हुए कहा कि इसमें लैटिन अमेरिकी कविताओं का स्वर सबसे अलग और मुखर है. उन्होंने अपनी कुछ रचनाओं का सस्वर पाठ भी किया.

साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार विजेता कवि शुभ्र बंद्योपाध्याय ने अपनी कविताओं को प्रस्तुत किया तथा उनके स्पेनिश अनुवाद की जानकारी देते हुए कहा कि यह अनुभव स्वयं को बेहद समृद्ध करने वाला था.
 
कार्यक्रम में विभिन्न भारतीय भाषाओं के महत्त्वपूर्ण लेखकों और अनुवादकों की उपस्थिति रही. इनमें सत्यव्रत शास्त्री, सुकृता पॉल कुमार, मंगलेश डबराल, सुरेश ऋतुपर्ण, चंद्रमोहन, सविता सिंह आदि के अतिरिक्त मैक्सिको राजदूतावास के सांस्कृतिक कार्य प्रमुख सेंटिआगो सहित स्पेनिश भाषा के छात्र-छात्राएं भारी संख्या में उपस्थित थीं.

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