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अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष पर साहित्य अकादमी का 'अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव'

संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित इंटरनेशनल इयर ऑफ इंडीजेनस लैंग्वेजेज़ का मान करते हुए साहित्य अकादमी ने भारत की लगभग 60 आदिवासी भाषाओं के लेखकों को आमंत्रित कर दो दिवसीय 'अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव' का आयोजन किया है.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 09 August 2019
अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष पर साहित्य अकादमी का 'अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव' साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव

नई दिल्लीः वर्ष 2019 को संयुक्त राष्ट्र ने 'इंटरनेशनल इयर ऑफ इंडीजेनस लैंग्वेजेज़ घोषित कर रखा है. इस मौके को जश्न का रूप देते हुए साहित्य अकादमी ने अपने इतिहास में पहली बार, भारत की लगभग 60 आदिवासी भाषाओं और उनके लेखकों को आमंत्रित कर एक वृहद 'अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव' का आयोजन 9-10 अगस्त को साहित्य अकादमी परिसर में किया है.
 
अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव के मुताबिक अकादमी का उद्देश्य है कि देश के एक क्षेत्र के लेखकों और उनके साहित्य को शेष भारत तक पहुंचाया जाए. इसके लिए लेखक सम्मिलनों के माध्यम से जहां स्थानीय साहित्यप्रेमियों को देश के अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय भाषाओं और उनके साहित्य तथा संस्कृति को और बेहतर तरीके से जानने में सुविधा होती है, वहीं एक क्षेत्र के लेखकों और कवियों को सीधे तौर पर दूसरे क्षेत्र के साहित्यिक और सांस्कृतिक अवदान को जानने का मौका मिलता है.

साहित्य अकादमी इस कार्यक्रम के माध्यम से संपूर्ण भारत की आदिवासी भाषाओं और उनके लेखकों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के द्वारा एक वृहत्तर एकात्म को प्रदर्शित करने का प्रयास कर रही है. इस सम्मिलन में अलग-अलग क्षेत्रों के लेखकों के विविध अनुभवों, संवेदनाओं और रचनात्मक गहराई का आभास मिल सकेगा.
 
उनके मुताबिक अकादमी का अनुभव है कि ऐसे लेखक सम्मिलन सृजनात्मक लेखन और अनुवाद कला को प्रोत्साहित करने में भी सहायक साबित हुए हैं. सृजनात्मकता, बंधुता और समानता के आधार पर देश की एकता प्रस्तुत करने के लिए अकादमी रचनात्मक रूप से सांस्कृतिक अंतराल को भरने का प्रयास कर रही है.

उनका दावा है कि अब तक के अपने काम से अकादमी यह अनुभव भी कर रही है कि इस प्रयोग के द्वारा देश भर में सामाजिक और सांस्कृतिक अखंडता स्थापित करने और एक पवित्र साहित्यिक माहौल बनाने में काफी हद तक सफल रही है. वास्तव में यह भाषायी विविधता के बावजूद देश रचनात्मक एकता को प्रदर्शित करने का महोत्सव है.

याद रहे कि साहित्य और साहित्यकारों के साथ ही भारतीय भाषाओं और पुस्तकों को समर्पित राष्ट्रीय संस्था साहित्य अकादमी देश भर की सांस्कृतिक विविधता और उसके सांस्कृतिक एकीकरण को बढ़ावा देने के साथ ही सभी क्षेत्रों की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करने तथा सभी भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधित्व के द्वारा उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाने के कार्य में लगी हुई है.

साहित्य अकादमी पिछले 65 वर्षों से पूरे देश में बौद्धिक एकता के लिए एक सेतु बनाने के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में कर रही है. इस दिशा में अकादमी ने पिछले कई वर्षों से अपने वार्षिक आयोजन 'साहित्योत्सव' में विशेष रूप से 'आदिवासी लेखक सम्मिलन' कार्यक्रम को शामिल कर रखा है. इसके अलावा भी वह देश के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे आयोजन समय-समय पर आयोजित करती रही है. इसके साथ ही अकादमी ने आदिवासी तथा वाचिक और मौखिक साहित्य के संरक्षण और प्रोत्साहन के उद्देश्य से पुस्तक के रूप में उनका प्रकाशन कार्य भी जारी रखा है, और यह कार्य प्रगति पर है.

अकादमी मानती है कि भारत अनेक भाषाओं का देश है. भाषा, बोली और उनके साहित्य की दृष्टि से जितना संपन्न भारत है, विश्व का कोई भी देश इतना संपन्न नहीं है. साहित्य अकादमी भारत की इस भाषिक समृद्धि के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए पिछले कई वर्षों से विशिष्ट कार्यक्रम आयोजित कर आदिवासी भाषाओं तथा वाचिक और मौखिक साहित्य को एक प्रतिष्ठित मंच प्रदान करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ प्रयासरत है.

साहित्य अकादमी इस दिशा में 24 मान्यताप्राप्त भाषाओं में विविध सामग्री प्रकाशित तो करती ही है, अकादमी एक क्षेत्र और समुदाय की भाषा के सर्वश्रेष्ठ साहित्य को बाकी 23 भाषाओं, परंपराओं और समुदायों के बीच ले जाती है, जिससे कि लोग, उनके साहित्य और उनकी विविध संस्कृतियां और पास आ सकें. इससे 'अन्य' के बारे में जागरूकता बढ़ जाती है. 'अन्य' के प्रति बढ़ती जागरूकता से देश में आपसी समझ, स्वीकृति, सहिष्णुता, सहयोग और शांति को बढ़ावा मिलता है.

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