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साहित्य अकादमी द्वारा 'गांधी दृष्टि और पर्यावरण विमर्श' विषयक परिसंवाद संपन्न

साहित्य अकादमी ने महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर एक दिवसीय परिसंवाद गांधी दृष्टि और पर्यावरण विमर्श आयोजित किया. कार्यक्रम का उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात संस्कृत विद्वान एवं साहित्य अकादमी के महत्तर सदस्य सत्यव्रत शास्त्री ने दिया.

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aajtak.in नई दिल्ली, 03 October 2019
साहित्य अकादमी द्वारा 'गांधी दृष्टि और पर्यावरण विमर्श' विषयक परिसंवाद संपन्न महात्मा गांधी की जयंती पर गांधी दृष्टि और पर्यावरण विमर्श परिसंवाद

नई दिल्ली: साहित्य अकादमी ने महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर एक दिवसीय परिसंवाद गांधी दृष्टि और पर्यावरण विमर्श आयोजित किया. कार्यक्रम का उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात संस्कृत विद्वान एवं साहित्य अकादमी के महत्तर सदस्य सत्यव्रत शास्त्री ने दिया. प्रख्यात समाजसेवी एवं लेखक आबिद सुरती विशिष्ट अतिथि के रूप उपस्थित थे. कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने की. कार्यक्रम के प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत साहित्य अकादमी के सचिव के श्रीनिवासराव द्वारा गांधी माला और पुस्तकें भेंट करके किया गया.
उन्होंने अपने स्वागत भाषण में कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति विशेष आदर भाव रहा है. उन्होंने महात्मा गांधी के 150वें जन्म वर्ष के दौरान विभिन्न भारतीय भाषाओं में साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की विस्तृत जानकारी दी. अपने उद्घाटन वक्तव्य में महाभारत, रामायण और संस्कृत के विभिन्न कालजयी ग्रंथों से उदाहरण देते हुए सत्यव्रत शास्त्री ने कहा कि हमारे सारे आदि ग्रंथ पर्यावरण संरक्षण पर बहुत गहनता और सूक्ष्मता से विचार-विमर्श करते रहे हैं. हमारे यहां पृथ्वी को माता और वृक्षों को देवता के रूप में पूजा जाता है, पंचतत्त्वों के साथ ही हमारे पशु-पक्षियों को पूरे मान-सम्मान के साथ सामाजिक व्यवहार में शामिल किया जाता रहा है. उन्होंने बताया कि ‘स्वच्छता’ शब्द संस्कृत से बना है जिसका अर्थ ‘बहुत अच्छा’ है. उन्होंने गांधी की पर्यावरण दृष्टि को भी भारतीय संस्कृति से प्रेरित बताया.
विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारे प्रख्यात लेखक एवं समाजसेवी आबिद सुरती ने उन व्यावहारिक मुश्किलों का जिक्र किया जिसके चलते गांधी का पर्यावरण आदि के प्रति महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण अब भी सही रूप में आम जनता तक नहीं पहुंच सका है. आबिद सुरती ने कहा कि हम गांधी जी को केवल आजादी दिलाने वाले महापुरुष के रूप में हम ही याद करते रहे जबकि गांधी जी ने आजादी के अनेक स्तरों पर कार्य किया था जिससे हम अभी भी अंजान हैं. आबिद सुरती ने स्वयं द्वारा जल संरक्षण के लिए किए जा रहे कार्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें कई बार अपनी बात आम जनता तक पहुंचाने के लिए लोगों की धार्मिक आस्थाओं को छूना पड़ता है.
सत्र के अध्यक्ष माधव कौशिक ने कहा कि गांधी का जीवन ही संदेश था. उनकी कथनी और करनी में अंतर न होने के कारण उनके विचार पूरे विश्व में प्रचारित हुए. गांधी जी जीवन को समग्रता में देखते थे और वे हर प्रदूषित चीज, चाहे वे विचार ही क्यों न हों, उनको शुद्ध करने पर बल देते थे. वे बाहरी सफाई के साथ-साथ आंतरिक स्वच्छता को महत्त्वपूर्ण मानते थे.
परिसंवाद की दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रख्यात पत्रकार बनवारी ने की और सुशील त्रिवेदी, उषा उपाध्याय, शंभु जोशी और अरुण तिवारी ने अपने-अपने आलेख प्रस्तुत किए. उषा उपाध्याय ने अपने आलेख में पर्यावरण की वर्तमान समस्या का इतिहास प्रस्तुत करते हुए कहा कि गांधी जी प्रकृति के साथ स्वावलंबन का रिश्ता रखना चाहते थे न कि दोहन का. वे सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण की स्वच्छता पर उतना ही विश्वास करते थे जितना कि बाहरी स्वच्छता पर. शंभु जोशी ने कहा कि वर्तमान में हम आंतरिक उपनिवेशवाद के शिकार हैं और शहरीकरण हमें विनाश के कगार पर ले जा रहा है. अरुण तिवारी ने विभिन्न उदाहरणों से कहा कि गांधी वर्तमान विकास की दौड़ में कभी भी शामिल नहीं होते और उनका नज़रिया हमेशा ग्राम विकास को प्राथमिकता देता.
उन्होंने कहा कि हमें लालच और जरूरत के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचनी होगी. सुशील त्रिवेदी ने वर्तमान पर्यावरण संकट के उदाहरण देते हुए कहा कि जब तक हम गांधी जी की सादगी और संयम के विचारों के अनुगामी नहीं होंगे तब तक हमारे पर्यावरण का बच पाना मुश्किल है. सत्र के अध्यक्ष बनवारी जी ने कहा कि गांधी जी का पूरा पर्यावरण चिंतन उनकी व्यावहारिक सोच से जुड़ा हुआ है. वे जीवन के सभी अनुशासनों में स्वच्छता लाना चाहते थे. चाहे वो विचारों की स्वच्छता हो, नैतिक स्वच्छता हो या फिर सामाजिक स्वच्छता. उन्होंने उनकी पुस्तक हिंद स्वराज का हवाला देते हुए कहा कि गांधी जी ने मशीनी सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहा था. वे जानते थे कि नैतिकता से मुक्त विज्ञान समाज को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा.
उन्होंने आगे कहा कि मनुष्य के स्वभाव के विपरीत कोई भी विकास मर्यादित नहीं होगा. अगले सत्र की अध्यक्षता सुपर्णा गुप्तू ने की और अज़ीज़ हाजिनी और कन्हैया त्रिपाठी ने अपने विचार व्यक्त किए. अज़ीज हाजिनी और कन्हैया त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में गांधी जी के व्यक्तित्व और कार्यों के अनेक आयाम उद्घाटित किए. सुपर्णा गुप्तू ने कहा कि गांधी जी 20वीं शताब्दी की अनेक वैश्विक परिस्थितियों की ‘विशिष्ट उपज’ थे जिन्होंने अनेक समस्याओं का सम्यक समाधान प्रस्तुत किया था.
कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादेमी के संपादक अनुपम तिवारी ने किया. कार्यक्रम में भारी संख्या में लेखक, छात्र एवं पत्रकार उपस्थित थे.

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