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रिफ्यूजी कैंप: कश्मीर का वह चेहरा, जिसे आप जानते ही नहीं

'साहित्य आजतक' ने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सहयोग से प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेला 2019 में लेखक मंच पर अपने लिए निर्धारित समय पर अलग-अलग सत्रों में इतने तरह के विषयों पर चर्चा की कि दर्शक मंच के आसपास हर सत्र में जमे रहे.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 09 January 2019
रिफ्यूजी कैंप: कश्मीर का वह चेहरा, जिसे आप जानते ही नहीं प्रतीकात्मक फोटो

'साहित्य आजतक' ने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के सहयोग से प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेला 2019 में लेखक मंच पर अपने लिए निर्धारित समय पर अलग-अलग सत्रों में इतने तरह के विषयों पर चर्चा की कि दर्शक मंच के आसपास हर सत्र में जमे रहे. संचालक सईद अंसारी ने इस दौरान स्थापित, दिग्गज, युवा और नए लेखकों से उनकी रचनाओं पर बात की. लेखक मंच पर अगला सत्र कश्मीर के विस्थापित पंडितों पर हाल ही में छपी बेहद चर्चित किताब 'रिफ्यूजी कैंप' के लेखक आशीष कौल से चर्चा का रहा.

हर शाम हिन्दू घरों पर पत्थरबाजी, रोज़ रात लाउड स्पीकर्स से गूंजती धमकियां ‘रलिव, सलिव या गलिव' यानी या तो धर्म तो बदलो, या भाग जाओ या दर्दनाक मौत के लिए तैयार हो जाओ. या फिर इस से भी विभत्स नारा ‘अस्य गस्चि आसून पाकिस्तान, बटव रॉस, बटिन्याव सान' यानी हमें चाहिए पाकिस्तान. हिन्दू आदमियों के बिना और हिन्दू औरतों के साथ. अफगान काल में कैसे डल झील हिंदुओं की क़बरगाह बनी और कैसे उनके अमूल्य और दुर्लभ ग्रंथ झील में दफना दिए गए, ऐसी ही कई दर्दनाक यादें और कश्मीर के वो काले 48 घंटे दिल्ली स्थित प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में पुनर्जीवित हो गए.

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मुंबई में रहने वाले आशीष कौल कॉरपोरेट जगत का बड़ा नाम रहे हैं. बिजनेस लीडर, कम्यूनिकेशंस एक्सपर्ट के साथ ही मीडिया, स्पोर्ट्स और एंटरटेनमेंट की दुनिया में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई है. पर 'रिफ्यूजी कैंप' उनकी एक अलग ही कहानी कहती है. इस किताब से वह एक संवेदनशील लेखक के रूप में भी उभरे हैं. उनकी इस किताब को देश की कई फिल्मी, सियासी और सैन्य हस्तियों ने तो सराहा ही है पाकिस्तान के बौद्धिक जगत ने भी हाथोंहाथ लिया है.

सईद ने जब अपने ही घर, अपने ही देश में पराया होने के दर्द का जिक्र छेड़ते हुए धरती के स्वर्ग कश्मीर का जिक्र किया और कहा कि इस दर्द को ज़ुबान देने के लिए लेखक आशीष कौल ने अपनी मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ी और 'रिफ्यूजी कैंप' लिखी. आखिर 'रिफ्यूजी कैंप' की कहानी क्या है? जवाब में जैसे आशीष कौल का सारा दर्द छलछला आया. उन्होंने कहा कि आज ही के दिन कश्मीर का सबसे बड़ा फेस्टिवल होता है, जिसे कुबेर अमावस कहते हैं. इस दिन सदियों से कश्मीरी पंडित कुबेर की पूजा करते हैं, पर हम बाहर हैं.

यह बात कम लोग जानते हैं कि कश्मीर का इतिहास 5800 साल पुराना है. 'रिफ्यूजी कैंप' मेरी जिंदगी का हिस्सा जरूर है, पर यह कहानी साढ़े छ लाख लोगों की कहानी है. हमारा देश, जिसे दुनिया की सबसे सशक्त डेमोक्रेसी कहा जाता है, पर यह काला धब्बा है. इसे पिछले तीस सालों से दबाने की कोशिश हो रही है. मैं कहानीकार नहीं हूं. पर इस कहानी का जन्म साढ़े छ साल की एक बच्ची के उस सवाल से शुरू होता है, जब आठ-नौ साल पहले हमारा जहाज जब कश्मीर के ऊपर से उड़ रहा था और उसने हमसे एक सवाल किया था. उस बच्ची ने हमसे सवाल किया था कि ‘जब भी कश्मीर का जिक्र होता है, आपलोग इतने इमोशनल हो जाते हो, और कश्मीर इतना खूबसूरत भी है, तो आखिर क्या बात है कि हम उस कश्मीर में नहीं रह सकते हैं?’

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उस बच्ची के सवाल से मुझे सत्रह साल का वह लड़का याद आ गया, जिसे रातोंरात अपना घर छोड़ निकलना पड़ा था. आर्मी ने हमें रेस्क्यू किया था. हम सिर्फ दो बैग लेकर निकले थे और मेरी मां को इलाज की जरूरत थी. जब तक हम जम्मू पहुंचते हमारा घर जला दिया गया था. मैंने सोचा कि इस छ साल की बच्ची को मैं क्या जवाब दूं. क्या यह कहूं कि कुछ लोग बंदूक लेकर आए और हमें घर छोड़ने को कहा गया. हमें मारा, डराया गया, हमारे घरों पर रात में पत्थर फेंके जाते थे, हमारे बिजली के तार काट दिए जाते थे, हमारा सामाजिक बहिष्कार किया जाता था? तब मुझे लगा कि यह छ साल का बच्ची अकेला नहीं है. कश्मीर के उन साढ़े छः लाख परिवारों में ऐसे लाखों बच्चे होंगे, जो 88 के बाद पैदा हुए होंगे और जिन्हें कश्मीर की सच्चाई नहीं पता है. चैनल्स पर जो खबरें आ रही हैं, वह कश्मीर की अलग ही तस्वीर रख रही हैं.

यह पूछे जाने पर कि जब उन्हें इस देश ने अपना लिया, और सत्रह साल का वह बच्चा प्रौढ़ हो चुका और जीवन में इतना सफल भी है तो फिर उन्हें ऐसा क्यों नहीं लगता कि वह अपने देश में ही जी रहे हैं? कौल का जवाब था कि हमने कभी इसे इस तरह से नहीं स्वीकारा. हम एक ऐसी जीवंत सभ्यता का हिस्सा रहे हैं जिसका इतिहास हजारों साल पुराना है. जिसका गिनीज वर्ल्ड बुक में केवल इसलिए नाम रहा है कि इस समाज के शतप्रतिशत लोग पढ़ेलिखे रहे. हमारा इतिहास सबसे पुराना रहा, हमारी एक अपनी विरासत रही जो बेहद अनोखी और शानदार रही है, पर जिसे पिछले हजारों सालों एक-एक करके धीरे-धीरे तोड़ा गया. हर आक्रमणकारी ने उसे अपने हिसाब से प्रभावित किया और तोड़ा.   

कश्मीर में जो भी आक्रांता आया, हर आक्रमणकारी ने उसे अपने हिसाब से लिखा. जैसे जो इतिहास मेरे दादा ने अपने पिता से या मेरे पिता ने मेरे दादा से सुना वह चेंज हो रहा था. जैसे डल लेक की ही मैं बात करूं तो यह दुनिया की सबसे अच्छी झीलों में गिनी जाती है और दुनियाभर के लोग उसे देखने आते हैं, लेकिन कोई यह नहीं जानता कि वही डल लेक हिंदुओं का दुनिया में सबसे बड़ा श्मशान थी. आज से नौ सौ-आठ सौ साल पहले आक्रांताओं का हर दिन का मैंडेट था कि कश्मीर के इतिहास को तोड़ा जाए. यह काम इतने करीने से किया गया कि कश्मीर का पूरा इतिहास ही झूठ हो गया.

एक बात और है कि कश्मीरियों ने कभी कश्मीरियों पर जुल्म नहीं किया. कश्मीर एक जमाने में हिंदु बहुल राज्य था, जिसे मुस्लिम बनाया गया. वोतल बुज की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि अगर कोई धर्म परिवर्तन नहीं करता तो उसके साथ वोतल बुज खेल खेलते थे, जिसके तहत चटाई में लपेट कर फरमान न मानने वाले को डल झील में फेंक दिया जाता था, और लोग नारे लगाते थे...तो इस तरह वहां बदलाव किया गया. धीरेधीरे हम लोग इतने कम हो गए कि पूछिए मत.

अपने किशोरवय का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब मैं सोलह साल का था तो हर दिन मस्जिद में नमाज के बाद एक टेप बजता था. जिसमें कहा जाता था, हम क्या चाहते हैं आजादी. उसके बाद वही तीन ‘रलिव, सलिव या गलिव' शब्द यूज होते थे, रलिव यानी इस्लाम में कन्वर्ट हो जाओ, सलिव यानी कन्वर्ट नहीं हो सकते तो भाग जाओ चौबीस घंटे हैं. गलिव, यानी मरने के लिए तैयार हो जाओ. इसका अर्थ था किसी को पिघला कर मार देना. एक ऐसी दर्दनाक मौत जिसकी कल्पना भी डरा देती है. इसके बाद कहा जाता था आप अपनी मां बहनों को, अपनी औरतों को छोड़ जाओ. मेरी बारह साल की बहन थी. हम क्या करते. यह कश्मीर की सच्चाई है.

'साहित्य आजतक' के मंच पर बेहद साफगोई से उन्होंने कहा कि 'रिफ्यूजी कैंप' में एक चैप्टर है 48 घंटे. हम यहूदियों की बात करते हैं, नाजी की बात करते हैं, पर उन 48 घंटों में  सड़कों पर जो जुल्म हुआ, जो मानवता का नंगा नाच हुआ. वह मीडिया का वह युग नहीं था. न तो टीवी था, न फेसबुक, न कैमरा...जो अमानवीय घटनाएं उस दौर में कश्मीर में हुईं वह भुला दी गईं. यह किताब इसीलिए लिखी गई.

सरकारी स्तर पर भेदभाव के संस्थागत हो जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, जम्मू-कश्मीर में एक जम्मू-कश्मीर कंपीटिटिव अथॉरिटी थी, जो सलेक्शन करती थी. यह नियम सरकार ने बनाए थे कि उससे केवल मुसलमानों को नौकरी मिलती थी. उन्होंने दुख जाहिर करते हुए कहा कि हमने घर इसलिए छोड़ा कि हम असुरक्षित थे. पर भारत ने, जिसे हम अपना चुके थे, जो हमारा देश बन चुका था, यहां क्या मिला? जब हम जम्मू में आए और दिल्ली में आए तो स्कूलों में एडमिशन नहीं मिला. बाद में हमें असामान्य बच्चा घोषित कर दिया गया. और असामान्य बच्चों के लिए बनी कक्षाओं में प्रवेश दिया गया. आज लोगों को जम्मू-कश्मीर का इतिहास पता ही नहीं.

हमारी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने एक बार कहा था कि कश्मीर की आबोहवा अभी ऐसी नहीं कि कश्मीरी पंडितों को वापस ले सके. कश्मीर के जमींदारी ऐक्ट ने कश्मीरी पंडितों को और भी अपाहिज बना दिया. कहने को हम जागीरदार थे, पर हमारे पास कुछ न बचा था. आज न तो जातियां बची हैं. न शिक्षा बची है. न सरकारी स्कूलों में एडमीशन था, न सरकारी नौकरी थी. अभी का आलम है यह है कि कश्मीर के प्रशासनिक क्षेत्र में, बैंकिंग क्षेत्र में जो लोग नौकरियां कर रहे हैं, वे योग्य नहीं हैं.

जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक, राजनीतिक भिन्नताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस इलाके के चार हिस्से एकदूसरे से इतने अलग हैं कि दूसरों के लिए उसे समझना ही मुश्किल. जम्मू की आबोहवा, जुबान, खानपान, तहजीब कश्मीर से नहीं मिलती, कश्मीर की आबोहवा, जुबान, खानपान, तहजीब लद्दाख से नहीं मिलती और लद्दाख की आबोहवा, जुबान, खानपान, तहजीब पीरपंजाब से नहीं मिलती. तीस साल से हमारी जो समस्या है, उसे दिल्ली समझना ही नहीं चाहता.

उन्होंने दावा किया कि दिल्ली को कश्मीर की समझ ही नहीं है. इस सच के अलावा कश्मीर का एक और सच था. वहसच यह था कि एक सईद और एक आशीष वहां भी था. जो एकदूसरे के साथ एकदूसरे की थाली में खाना खाता था. एक दूसरे के साथ उनके मंदिर - मस्जिदों में जाता था. पर सब कुछ नष्ट हो गया. कश्मीर आज दुनिया का सबसे बड़ा मीलिटरी जोन है. पर तथ्य यही है कि कश्मीर समस्या का समाधान सेना नहीं ढूंढ सकती, क्योंकि शांति, हमको आपको चाहिए. सेना को नहीं. यह दुनिया की पहली किताब है, जिसे पाकिस्तान से भी समर्थन मिला.

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