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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर साहित्यिक गतिविधियों से गुलजार रही देश की राजधानी दिल्ली

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर देश की राजधानी में महिला केंद्रित गतिविधियों की भरमार रही. कई प्रकाशन समूहों ने महिला साहित्यकार या फिर महिला साहित्य को केंद्र में रखकर आयोजन किए. साहित्य अकादमी ने अखिल भारतीय लेखिका सम्मिलन का आयोजन किया, तो वाणी प्रकाशन ने 'दरियागंज की किताबी शाम' की शुरुआत की.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 09 March 2019
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर साहित्यिक गतिविधियों से गुलजार रही देश की राजधानी दिल्ली साहित्य अकादमी में महिला लेखिका सम्मिलन

नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर देश की राजधानी में महिला केंद्रित गतिविधियों की भरमार रही. कई प्रकाशन समूहों ने महिला साहित्यकार या फिर महिला साहित्य को केंद्र में रखकर आयोजन किए. साहित्य अकादमी ने अखिल भारतीय लेखिका सम्मिलन का आयोजन किया, तो वाणी प्रकाशन ने 'दरियागंज की किताबी शाम' की शुरुआत की.

साहित्य अकादमी के अखिल भारतीय लेखिका सम्मिलन का उद्घाटन प्रख्यात लेखिका मृदुला गर्ग ने किया. अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि सहजीवन अभी स्त्री लेखन में प्रमुखता प्राप्त कर रहा है. स्त्री लेखन में छवि बदलने की प्रक्रिया चल रही है. स्त्री अब धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, ऐतिहासिक और यहां तक कि व्यक्तिगत सभी रूढ़ियों और मान्यताओं के विरुद्ध अधिक प्रतिरोध कर रही है. उत्तर स्त्रीवाद में मातृत्व को एक शक्ति की तरह पहचाना जा रहा है और यह भी बहुत महत्त्वपूर्ण है कि मातृत्व के रूप और रूपक में बड़ा बदलाव आया है.

गर्ग का कहना था कि पुरुष के भीतर जब मातृतत्त्व आ जाता है, तब वह उत्पीड़क नहीं रहता बल्कि मित्र हो जाता है. सहजीवन और एक-दूसरे के साथ खड़े होना स्त्री लेखन और पुरुष लेखन में बढ़ रहा है. यह बहुत अच्छी स्थिति है और यह एक सहजीवी समाज और देश के लिए आवश्यक भी है.

बीज वक्तव्य देते हुए प्रख्यात अंग्रेजी विद्वान सुकृता पॉल कुमार ने वैश्विक परिदृश्य में स्त्री विषयक चिंतन और लेखन के प्रति आश्वस्ति व्यक्त करते हुए कहा कि स्त्रियों ने अपनी भाषा और अपना निजी स्वर स्वयं आविष्कृत किया है. स्त्रियाँ न सिर्फ अपने मुद्दों बल्कि शोषित, पीड़ित और हाशिए के बहिष्कृत समुदायों की समस्याओं को बहुत मानवीय संवेदना के साथ न सिर्फ देख रही हैं, बल्कि अपने लेखन में व्यक्त भी कर रही हैं.

सुकृता पॉल ने स्त्रियों के आत्म-विस्थापन की पीड़ा को रेखांकित  करते हुए कहा कि यह यों ही नहीं है कि स्त्री रचनाकार इनदिनों सीरिया, ईराक और दुनिया के अनेक अस्थिर समाजों के मनुष्यों के बारे में गंभीरता से लिख रही हैं. आज स्त्री रचनाकार उनके हालात में अपनी स्थिति और अनुभूति पा रही हैं. उन्होंने अनेक कहानियों और उनके रचनाकारों का ज़िक्र करते हुए कहा कि स्त्रीवादी लेखन ने अनुभूति की प्रामाणिकता को स्थापित किया है.

कार्यक्रम के प्रारंभ में साहित्य अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने सभी अतिथि लेखिकाओं का स्वागत अंगवस्त्रम् के साथ किया. उन्होंने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि साहित्य अकादमी स्त्री लेखन को बहुत आशा के साथ देख रही है और पर्याप्त सम्मान देने का प्रयास कर रही है. इसी क्रम में साहित्य अकादमी द्वारा देश के विभिन्न हिस्सों में अखिल भारतीय लेखिका सम्मिलनों का आयोजन किया जा रहा है, जिससे कि स्त्री लेखन को बड़ा फलक प्राप्त हो सके. उन्होंने कहा स्त्रियाँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं और यह सिफ कहने की र्बात नहीं है बल्कि स्त्रियों ने इसे साबित करके दिखा दिया है.

उद्घाटन सत्र के बाद पहला सत्र महिला कथाकारों के कहानी-पाठ का था, जिसकी अध्यक्षता शिवशंकरी ने की. इस सत्र में असमिया की अनामिका बोरा, हिंदी की उर्मिला शिरीष, कोंकणी की ज्येति कुंकोलियेकर और मलयाळम् की लतालक्ष्मी मेनन ने अपनी कहानियाँ प्रस्तुत कीं.

द्वितीय सत्र में महिला कवयत्रियों के लिए कवि सम्मिलन आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता ओड़िया लेखिका यशोधारा मिश्र ने की. इस सत्र में बाङ्ला की राका दासगुप्ता, डोगरी की सुषमा रानी, गुजराती की लता हिरानी, मैथिली की कल्पना झा, मणिपुरी की सरिता सिन्हा, पंजाबी की अमिया कुँवर, संस्कृत की उमा रानी त्रिपाठी, तेलुगु की सी. भवानी देवी और उर्दू की तरन्नुम रियाज़ ने अपनी कविताएं प्रस्तुत कीं.

तृतीय सत्र भी कविता-पाठ का था, जिसकी अध्यक्षता लेखिका लक्ष्मी कण्णन ने किया. इस सत्र में बोडो की बिनिता गोयारी, कश्मीरी की रेहाना कौसर, मराठी की योगिनी सातरकर, नेपाली की पवित्र लामा, ओड़िया की रीता रानी नायक, राजस्थानी की सुमन बिस्सा और संताली की यशोदा मुर्मु ने अपनी कविताएं सुनाईं. रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का कुछ अंश अपनी मूल भाषा में पढ़ा और उसके बाद उनका हिंदी या अंग्रेजी अनुवाद प्रस्तुत किया.

दूसरा कार्यक्रम वाणी प्रकाशन की ओर से डॉ प्रेमचंद 'महेश' सभागार में 'दरियागंज की किताबी शाम' नाम से हुआ. कार्यक्रम की शुरुआत में वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने कहा कि दक्षिण एशिया के सबसे बड़े और पुराने किताबी गढ़ 'दरियागंज' का विस्मृत साहित्यिक कलेवर जिसमें जयशंकर प्रसाद, नागार्जुन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, राजेन्द्र यादव, ममता कालिया, अनामिका, चित्रा मुद्गल जैसे साहित्यिक हस्ताक्षर दर्ज हैं, फिर से एक बार विचारों की ऊष्मा से स्पंदित करने के लिए तैयार किया जा रहा है.

पहला कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हो रहा है, जिसमें 'जेंडर लेंस, उत्तर आधुनिक समय और उसके प्रश्न' विषय पर विचार रख रहे हैं.  इस विषय पर बोलते हुए

प्रवीण कुमार ने कहा कि स्त्री विमर्श उत्तर आधुनिकता का छत्तीस का आंकड़ा है.  उत्तर आधुनिकता अपने बहुआयामी विमर्श में महिलाओं का महिलाओं पर ही टिप्पणी करना स्त्री विमर्श नहीं मानता.  उत्तर आधुनिकता नये ढंग से स्त्री -विमर्श को परिभाषित करता है और बाकी विमर्शों को स्पेस देने की बात करता है.

लेखक उमाशंकर चौधरी ने कहा कि वह बड़े-बड़े 'वादों' यानी विचारधाराओं को बहकाने की बातें मानते हैं. सूक्ष्म स्तर पर भारतीय परिवारों में भेदभाव है, जिसमें स्त्री को पुरुष जितने मौके नहीं मिलते. बावजूद इसके पुरुष बदल रहा है और स्त्री की खुशी में अपनी खुशी ढूंढ रहा है. यही प्रेम की नींव भी है. मेरी पत्नी पूछती है कि प्याज है घर में और हम लोग मुस्कुराते हुए एन्जॉय करते हैं.

रजत रानी 'मीनू' ने कहा दलित तो आधुनिक ही नहीं हुआ. वह अभी अन्तिम पायदान पर है. डॉ. अम्बेडकर का कहना था स्त्री शिक्षा से ही स्वावलंबी बनेगी. श्रमिक महिलाएं आज भी उसी पिछड़ी स्थिति में हैं. दलित वर्ग की मध्यम वर्गीय महिलाओं को भी यह पता नहीं कि 8 मार्च या महिला दिवस क्या है.  हिन्दू कोड बिल आज भी लागू नहीं. उत्तर आधुनिकता कहां है जब स्त्री अब भी अस्तित्व में ही नहीं है, आधुनिक ही नहीं है.

नीलिमा चौहान का कहना था कि फेमिनिज्म़ शब्द को नकार कर हमारे विमर्श भटक सकते हैं. डिस्कोर्स से बच रहे लेखक परिपक्व नहीं हैं. सुदीप सेन ने मी-टू आंदोलन के एक तरफ़ा होने पर अपनी राय रखी. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशिया सेंटर के अध्यक्ष संजय सिंह ने कहा कि गाँव, देहात में स्त्रियों ने एकजुट होकर बड़े आंदोलन सार्थक किए हैं. इस अवसर पर श्यौराज सिंह बेचैन, गीताश्री, अजय सिंह, विजय श्री तनवीर, अरूण माहेश्वरी, अदिति माहेश्वरी-गोयल आदि भी उपस्थित थे.

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