नेमिचंद्र जैन ने रचनाकारों को एक नई दृष्टि दी: साहित्य अकादमी का जन्मशतवार्षिकी परिसंवाद

साहित्य अकादमी ने नेमिचंद्र जैन जन्मशतवार्षिकी पर एक परिसंवाद का आयोजन किया. इस परिसंवाद में उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात कवि, नाटककार एवं आलोचक नंदकिशोर आचार्य ने प्रस्तुत किया. तो वहीं विशिष्ट अतिथि के तौर पर प्रख्यात निर्देशक, नृत्यांगना एवं विदुषी रश्मि वाजपेयी थी.

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aajtak.in नई दिल्ली, 04 September 2019
नेमिचंद्र जैन ने रचनाकारों को एक नई दृष्टि दी: साहित्य अकादमी का जन्मशतवार्षिकी परिसंवाद साहित्य अकादमी का नेमिचंद्र जैन जन्मशतवार्षिकी परिसंवाद

नई दिल्ली: साहित्य अकादमी ने नेमिचंद्र जैन जन्मशतवार्षिकी पर एक परिसंवाद का आयोजन किया. इस परिसंवाद में उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात कवि, नाटककार एवं आलोचक नंदकिशोर आचार्य ने प्रस्तुत किया. तो वहीं विशिष्ट अतिथि के तौर पर प्रख्यात निर्देशक, नृत्यांगना एवं विदुषी रश्मि वाजपेयी थी. बीज वक्तव्य प्रख्यात आलोचक ज्योतिष जोशी ने दिया और अध्यक्षीय वक्तव्य साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने दिया.

स्वागत वक्तव्य देते हुए साहित्य अकादेमी के सचिव के श्रीनिवासराव ने कहा कि रचनाकार सिर्फ़ अपनी रचनाओं से ही बड़ा नहीं बनता है, बल्कि उसने साहित्य में कितने नए रचनाकारों को स्थान दिया, उन्हें प्रभावित किया और आगे बढ़ाया, इससे भी वह पहचाना और याद किया जाता है. आदरणीय नेमिचंद्र जैन जी ऐसे ही रचनाकार थे. जैन ने बहुत सारे नए रचनाकारों को एक नई दृष्टि दी और उन्हें संस्कारित किया.  

अपने उद्घाटन वक्तव्य में नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि नेमिचंद्र जैन ने परंपरा को आलोचनात्मक दृष्टि से देखा है और नए सत्य का उद्घाटन किया है. वे हमेशा ऐसी नवीनता की तलाश में रहे जो मनुष्य में नैतिकता का बोध लाती है. वे एक तरीके से निसंग आलोचक थे. हिंदी आलोचना ने उनके साहित्य-चिंतन और व्यावहारिक आलोचना पर ठीक तरह से ध्यान नहीं दिया है. और ये उनकी प्रतिभा की अनदेखी है. उनकी कविताओं को लेकर और काम किए जाने की जरूरत है. विशिष्ट अतिथि के रूप में पधारी रश्मि वाजपेयी ने उनके पूरे जीवन को याद करते हुए उनकी उदारता के कई उदाहरण देते हुए कहा कि वे एक पति और एक पिता के रूप में स्त्रियों की स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे.

उन्होंने विवाह के बाद न केवल अपनी पत्नी को शिक्षित किया बल्कि विभिन्न कला माध्यमों में कार्य करने की छूट भी दी. ऐसा ही उन्होंने हम बहनों के लिए भी किया. उन्होंने युवाओं में विशेष रुचि का जिक्र करते हुए कहा कि वे सांस्कृतिक समझ को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहते थे.

बीज वक्तव्य देते हुए प्रख्यात आलोचक ज्योतिष जोशी ने कहा कि नेमिचंद्र जैन सभी अर्थों में विरले व्यक्ति थे. हिंदी साहित्य के सभी क्षेत्रों में उनका काम स्मरणीय रहेगा. जोशी जी ने कविता को उनके व्यक्तित्व की कुंजी बताते हुए कहा कि इसी के सहारे हम उनको बेहतर तरीके से समझ सकते हैं. उनके कार्यां की सम्यक विवेचना करना आवश्यक है.

एक आलोचक के रूप में वे ‘सभ्यता समीक्षक’ हैं जो संस्कृति का कोई भी पहलू अनछुआ नहीं छोड़ते हैं. वे भारतीय रंगकर्म को अभिनय केंद्रित बनाना चाहते थे जो कि मुख्यता निर्देशक केन्द्रित है. उन्होंने हिंदी आलोचकों पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्होंने नेमिचंद्र जैन के साथ बेहद संकीर्णता दिखाई है. आगे उन्होंने कहा कि नेमिचंद्र जैन की कविता को सतर्कता के साथ देखने की जरूरत है. उन्होंने कहानी, उपन्यास की समीक्षा के प्रतिमानीकरण का बड़ा काम किया था. उनके कार्यों की विवेचना करना बहुत ज़रूरी है. अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में माधव कौशिक ने कहा साहित्यिक संकीर्णता के चलते हमने नेमिचंद्र का मूल्यांकन उचित तरीके से नहीं किया है जिसकी आज बेहद ज़रूरत है.

प्रथम सत्र जो नाट्यलोचन और संस्कृति विमर्श पर था की अध्यक्षता देवेंद्रराज अंकुर ने की और हृषीकेश सुलभ, कीर्ति जैन एवं सुमन कुमार ने अपने आलेख प्रस्तुत किए. सर्वप्रथम कीर्ति जैन ने नेमिचंद्र जैन की नाट्य आलोचना के संदर्भ में कहा कि हिंदी रंगमंच के विकास में वे हिंदी प्रदेश की सामंतवादी सोच को ज़िम्मेदार ठहराते थे. उनका मानना था कि रंगमंच कोई शास्त्रीय विधा नहीं है जिसमें कि बदलाव न किए जा सके. रंगमंच को निरंतर अपने दर्शकों के साथ संवाद करते रहना चाहिए. नेमिचंद्र जैन नाट्य आलोचकों से यह उम्मीद कर रहे थे कि वे नाटक के ज़रूरी और गैर ज़रूरी तत्त्वों की तरफ गंभीरता से ध्यान दें.

हृषिकेश सुलभ ने कहा कि वे सांस्कृतिक विमर्श का राजनीति से प्रेरित हो जाने पर चिंतित थे. वे इस बात पर विश्वास करते थे कि नाटक केवल डिजाइन नहीं बल्कि सभी कलाओं का मिश्रण हैं. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नेमिचंद्र जैन ने ही नाट्य आलोचना की सहज भाषा को तैयार किया. वे हिंदी रंगमंच की बौद्धिक क्षमता को बढ़ाना चाहते थे. सुमन कुमार ने कहा कि नेमिचंद्र जैन ने युवा रंगकर्मियों को वह विवेक दिया जिससे वे नाटकों की विभिन्न शैलियों को देख और परख सके. सत्र के अध्यक्ष देवेंद्रराज अंकुर ने कहा कि नाट्य आलोचना की स्थिति अभी भी बहुत गंभीर है और उसे जांचने परखने के लिए हम अभी भी कोई समग्र दृष्टि विकसित नहीं कर पाए हैं. उन्होंने ने कहा कि नेमिचंद्र जैन हमेशा इस बात पर जोर देते कि नाटक की समीक्षा में केवल किसी एक पक्ष की श्रेष्ठता का आकलन नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी क्षेत्रों को सम्यक दृष्टि से देखना चाहिए.

अगला सत्र उनके काव्यावदान और काव्यचिंतन पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता नंदकिशोर आचार्य ने की और धु्रव शुक्ल एवं ओम निश्चल ने अपने आलेख प्रस्तुत किए. ओम निश्चल ने नेमिचंद्र जैन के काव्य-संसार को चिह्नित करते हुए कहा कि उनका एकांत ‘पलायनवादी एकांत’ नहीं था बल्कि उसमें निज के साथ समाज को देखने की दृष्टि थी.

नेमिचंद्र जैन की आंतरिकता ही उनका वैश्ष्ट्यि है. नेमिचंद्र जैन का कवि संकोची और काव्य-संयम का अद्भुत मिश्रण है. धु्रव शुक्ल ने उनकी कविता के बारे में कहा कि कविता में उनकी सादगी अलग से पहचानी जा सकती है. वे अपने समकालीन कवियों से प्रेरणा लेते हुए उनके साथ खड़े दिखते है और सहचर और सहधर्मी की एक नई मिसाल प्रस्तुत करते हैं. सत्र के अध्यक्ष नंदकिशोर आचार्य ने कविता को उनकी सबसे प्रिय विधा मानते हुए कहा कि उन्होंने कविता में अहम का विलयन और उसका सामाजीकरण बहुत संतुलित रूप में किया. हमें उनकी कविता को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझने की ज़रूरत है.

अंतिम सत्र कथालोचन और साक्षात्कार का था जिसकी अध्यक्षता रोहिणी अग्रवाल ने की और सत्यदेव त्रिपाठी, प्रभात रंजन एवं पल्लव ने अपने आलेख प्रस्तुत किए. पल्लव ने अपने आलेख में कहा कि नेमिचंद्र जैन अपनी पुस्तक ‘अधूरे साक्षात्कार’ में आलोचक का सच्चा धर्म निभाते हुए कभी भी किसी उपन्यासकार या उपन्यास से अभिभूत नहीं होते बल्कि उसकी आलोचना समग्र रूप से करते हैं. वह उपन्यास को परखने के लिए प्रामाणिकता, सूक्ष्मता और गहराई का जो सूत्र देते हैं वह आज भी कालजयी है.

प्रभात रंजन ने कहा कि वे अपनी इस पुस्तक में आलोचना के ऐसे सूत्र देते हैं जो आने वाली पीढ़ी को उपन्यास पढ़ने की नई दृष्टि देते हैं. सत्यदेव त्रिपाठी ने कहा कि इनकी आलोचना की यह विशिष्टता है कि वह कथा समीक्षा में अपने नाटक के समीक्षक को नहीं आने देते हैं. वे हमेशा कृति के माध्यम से समीक्षा करते हैं और ‘मैला आंचल’ की समीक्षा में यह उद्घाटित करते हैं कि पहले हमारा समाज आध्यामिकता और धार्मिकता से संचालित होता था. वो अब राजनीति से संचालित होने लगा है. रोहिणी अग्रवाल ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि वह अपनी आलोचना में लेखक को दरकिनार कर रचना से संवाद करते हैं और उसके तल में छिपी हुई साधारण से साधारण चीज़ों को जांच-परखकर ऊपर लाते हैं.

कार्यक्रम का संचालन साहित्य अकादेमी के संपादक अनुपम तिवारी ने किया. कार्यक्रम स्थल पर नेमिचंद्र जैन के व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रदर्शित करती एक चित्र-प्रदर्शनी भी लगाई गई थी. कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य और नाट्य प्रेमी उपस्थित थे.

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