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बच्चों और ट्रांसजेंडर कवियों के नाम रहा साहित्योत्सव का आखिरी दिन

'साहित्योत्सव' के दौरान ही दिल्ली में पहली बार ट्रांसजेंडर कवि सम्मिलन का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम का उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात साहित्यकार एवं विदुषी मानबी बंद्योपाध्याय ने दिया, जो स्वयं ट्रांसजेंडर हैं. साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित किए जा रहे साहित्योत्सव का छठा एवं अंतिम दिन बच्चों एवं ट्रांसजेंडर कवि सम्मिलन के नाम रहा.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 03 February 2019
बच्चों और ट्रांसजेंडर कवियों के नाम रहा साहित्योत्सव का आखिरी दिन साहित्योत्सव (फोटो: आजतक)

साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित किए जा रहे साहित्योत्सव का छठा एवं अंतिम दिन बच्चों एवं ट्रांसजेंडर कवि सम्मेलन के नाम रहा. बच्चों के लिए आयोजित बाल गतिविधियों के अंतर्गत कविता, कहानी लेखन प्रतियोगिता, कार्टून बनाने का सत्र, बाल साहित्यकारों के साथ बातचीत और बाल कहानियां सुनाने तथा बहादुर बच्चे के साथ संवाद जैसे कई आयोजन किए गए. बच्चों के लिए कहानी और कविता प्रतियोगिता जूनियर और सीनियर वर्गों में आयोजित की गई, जिसमें विभिन्न विद्यालयों से आए 300 से ज्यादा बच्चों ने भाग लिया. बच्चों को कार्टून बनाने का सत्र प्रख्यात कार्टूनिस्ट उदय शंकर के साथ किया गया तथा प्रख्यात बाल लेखक दिविक रमेश और रंजनीकांत शुक्ल ने बच्चों से बातचीत की. ज़ैबुन्निसा 'हया' ने बाल कहानी सुनाई.

'साहित्योत्सव' के दौरान ही दिल्ली में पहली बार ट्रांसजेंडर कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम का उद्घाटन वक्तव्य प्रख्यात साहित्यकार एवं विदुषी मानबी बंद्योपाध्याय ने दिया, जो स्वयं ट्रांसजेंडर हैं और एक स्कूल की प्रधानाचार्य हैं. वे काफी लंबे समय ट्रांसजेंडर समाज को एक सम्मानित आवाज देने का प्रयास कर रही हैं. उन्होंने ट्रांसजेंडर  कवियों को मंच प्रदान करने के लिए साहित्य अकादेमी प्रशंसा करते हुए कहा कि यह अवसर हम सबके लिए स्मरणीय है और इससे हम सबके लिए सम्मान के नए रास्ते खुलेंगे. इस अवसर पर 12 ट्रांसजेंडर कवियों ने अपनी कविता प्रस्तुत कीं. ये ट्रांसजेंडर कवि पश्चिम बंगाल, बिहार एवं छत्तीसगढ़ से आए हुए थे. इनमें से कुछ प्रोफ़ेसर, अध्यापक, सिविल इंजीनियर आदि तक थे.

सभी ट्रांसजेंडर कवियों की कविताओं में लगभग एक ही मुख्य दर्द था और वो था अपनी पहचान को लेकर. सभी ने कहा वे पैदा तो मर्द के रूप में होते हैं लेकिन उनका मन स्त्री का होता है. सभी के मन में उनके घरवालों द्वारा उनकी उपेक्षा करना तथा समाज द्वारा उन्हें स्वीकार ना करने का दर्द था. सभी ने कहा कि सब लोग हमारे तन को छूना चाहते हैं लेकिन मन को कोई नहीं. रेशमा जो बिहार से आई थीं ने कहा कि अब जो थोड़ा बहुत सम्मान उन्हें मिल रहा है वह कानूनों की वजह से है ना कि समाज द्वारा दिया जा रहा है. अपनी कविता प्रस्तुत करने वाली ट्रांसजेंडर कवयित्रियां थीं, देवज्योति भट्टाचार्जी, रानी मजुमदार, शिवानी आचार्य, रेशमा प्रसाद, देवदत्त विश्वास, अहोना चक्रवर्ती, प्रस्फुटिता सुगंधा, विकशिता डे, कल्पना नस्कर, अंजलि मंडल, रवीना बारिहा एवं अरुणाभ नाथ.

इस समारोह के तहत ही 'भारत में प्रकाशन की स्थिति' विषय पर एक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया, जिसका बीज वक्तव्य निदेशक, ग्लोबल एकेडेमिक पब्लिशिंग, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के सुगता घोष ने दिया. रमेश कुमार मित्तल, अशोक माहेश्वरी, बालेंदु शर्मा दाधीच, भास्कर दत्ता बरुआ, रामकुमार मुखोपाध्याय ने अपने आलेख प्रस्तुत किए. सभी कहना था कि प्रकाशन की स्थिति क्षेत्रीय भाषाओं में जरूर चिंताजनक है लेकिन उसे परस्पर अनुवादों की संख्या बढ़ाकर नियंत्रित किया जा सकता है. सभी ने क्षेत्रीय भाषाओं के स्तरीय साहित्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्हें केवल क्षेत्रीय कहकर प्रकाशित ना किया जाना इन भाषाओं के समृद्ध साहित्य से पाठकों को वंचित करना है.

'भारतीय साहित्य में गांधी' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन 4 सत्र आयोजित हुए, जिनमें 'भारतीय काव्य, नाटकों पर गांधी का प्रभाव', 'लोकप्रिय संस्कृति में गांधी', 'गांधी पर समकालीन साहित्यिक विमर्श' एवं 'गांधी के प्रभाव' पर चर्चा हुई, और इस तरह 'साहित्योत्सव' संपन्न हुआ.

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