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'साहित्योत्सव' का पांचवां दिनः मीडिया, साहित्य, नाट्य लेखन का परिदृश्य और गांधी पर गोष्ठी के नाम

वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन आनंद का कहना था कि हिंदी साहित्य और पत्रकारिता का जो शुरुआती इतिहास है, उसमें पत्रकारिता और साहित्य के बीच कोई अलगाव नहीं था. अच्छे लेखक ही पत्रकार थे या कहें कि अच्छे पत्रकार ही लेखक थे.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 03 February 2019
'साहित्योत्सव' का पांचवां दिनः मीडिया, साहित्य, नाट्य लेखन का परिदृश्य और गांधी पर गोष्ठी के नाम साहित्योत्सव का पांचवा दिन (फोटो: आजतक)

साहित्य अकादेमी द्वारा आयोजित 'साहित्योत्सव' का पांचवां दिन परिचर्चाओं के नाम रहा. पहली परिचर्चा 'मीडिया और साहित्य' पर थी, तो दूसरी परिचर्चा  'नाट्य लेखन का वर्तमान परिदृश्य' पर हुई. भारतीय साहित्य में गाँधी विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आज दूसरा दिन था. इसके तहत जो सत्र हुए उनमें 'गांधी और भारतीय कथासाहित्य', 'विश्व-दृष्टि में गांधी', 'आत्मकथाओं में गांधी' और 'गांधी और भक्ति साहित्य' शामिल है.

'मीडिया और साहित्य' पर परिचर्चा का स्वागत वक्तव्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने किया. इस सत्र की अध्यक्षता प्रख्यात तमिऴ लेखिका एवं पत्रकार वासंती ने की. जिन लेखकों, विचारकों ने अपने विचार व्यक्त किए उनमें ए. कृष्णाराव, अनंत विजय, अवनिजेश अवस्थी, मधुसूदन आनंद, रवींद्र त्रिपाठी एवं संजय कुंदन शामिल थे. वक्ताओं का परिचय साहित्य अकादमी के संपादक अनुपम तिवारी ने दिया.

परिचर्चा के पहले वक्ता के तौर पर समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने कहा कि अगर मैं लेखक या पत्रकार में से यह चुनाव करूं कि किसको अभिव्यक्ति की ज्यादा स्वतंत्रता है तो मेरा उत्तर लेखक होगा. क्योंकि पत्रकारों को विभिन्न अंकुशों के बीच काम करना होता है.  उन्होंने आगे कहा कि प्रिंट पत्रकारिता में साहित्य का स्थान जरूर कम हुआ है लेकिन उसके स्थान पर सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों में हम साहित्य को विभिन्न रूपों में देख सकते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार मधुसूदन आनंद का कहना था कि हिंदी साहित्य और पत्रकारिता का जो शुरुआती इतिहास है, उसमें पत्रकारिता और साहित्य के बीच कोई अलगाव नहीं था. अच्छे लेखक ही पत्रकार थे या कहें कि अच्छे पत्रकार ही लेखक थे. उन्होंने आगे यह प्रश्न भी उठाया कि क्या हमारे पास साहित्य के पाठक हैं. अगर साहित्य के पाठक होते तो मीडिया पर उसको प्रकाशित, प्रसारित करने का दबाव जरूर होता. उन्होंने इस दूरी को पाटने के लिए पुस्तक संस्कृति की जरूरत पर बल दिया.

अवनिजेश अवस्थी ने कहा कि मीडिया बाजार के दवाब में है और उसे साहित्य और संस्कृति विषयों में बहुत ज्यादा रुचि नहीं है. उनका तर्क था कि एक समय साहित्य समाज के आगे चलता था लेकिन अब वह उसके पीछे चल रहा है. यह परिस्थितियां बदलनी होगी तभी साहित्य मशाल का काम कर पाएगा और तभी उसे अन्य माध्यमों में अपेक्षित स्थान मिल पाएगा.

आलोचक, पत्रकार अनंत विजय ने अपने पूर्ववर्ती वक्ताओं से इतर आज के साहित्य पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि आजकल जो कहानी और रचनाएं लिखी जा रही हैं, क्या वो सच में साहित्य के दायरे में आती हैं? उन्होंने कहा कि जब घटिया साहित्य लिखा जाएगा तो उसे छापेगा कौन ? उन्होंने यह भी कहा कि साहित्य अब छपने के लिए ही नहीं बल्कि सिनेमा और टेलीविजन के द्वारा भी लिखा जा सकता है. उनका सुझाव था कि हमें यह विलाप बंद करके कि साहित्य छापा नहीं जा रहा के स्थान पर अच्छा लेखन कर उसे प्रकाशन के लिए विवश करना होगा.

इस परिचर्चा में अंतिम वक्ता के तौर पर संजय कुंदन ने कहा कि आजकल हर अखबार ब्राडिंग के दवाब में या कहें कि बाजार के दवाब में अपना कंटेंट चुन रहा है. वह यह भी जान रहा है कि साहित्य में भी ब्राडिंग बनने का माद्दा है. इसीलिए अचानक से साहित्य के उत्सवों की बाढ़ आ गयी है और हर प्रकाशन में साहित्य मुख्यधारा में आ गया है. यह पाठक की ताकत है. उन्होंने कहा कि पत्रकारिता बाजार के साथ हो सकती है, लेकिन साहित्य बाजार का हमेशा विरोध करेगा.

इस सत्र की अध्यक्षता कर रही वासंती ने कहा कि मीडिया और साहित्य का रिश्ता एक दूसरे के लिए पूरक का काम कर सकता है, अतः हमें दोनों के बीच कुछ जरूरी और समाज को संदेश देने वाले तथ्यों में एकरूपता लानी होगी. इस सत्र में साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार भी मौजूद थे.

आज की दूसरी परिचर्चा 'नाट्य लेखन का वर्तमान परिदृश्य' पर केंद्रित थी, जिसका उद्घाटन वक्तव्य रामगोपाल बजाज ने दिया. इस परिचर्चा कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वर्तमान अध्यक्ष अर्जुनदेव चारण थे. कार्यक्रम का अध्यक्षीय वक्तव्य चंद्रशेखर कंबार ने दिया. परिचर्चा सत्र की अध्यक्षता प्रयाग शुक्ल ने की जिसमें आतमजीत, अजित राय, बलवंत ठाकुर, धर्मकीर्ति यशवंत सुमन तथा एन. एहन्जाव मेतेई ने अपने-अपने विचार व्यक्त किए.

प्रख्यात रंग-कर्मी रामगोपाल बजाज ने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि जो भी कलाएं हमें बृहत्तर नहीं बनाती वे व्यर्थ हैं. नाटक अपने में कई विधाओं को समेटे हुए है तथा उसका लेखन दलगत राजनीति आदि से ऊपर उठकर होना चाहिए, अन्यथा वह स्थाई नहीं रहेगा और जल्द ही परिदृश्य से गायब हो जाएगा, उन्होंने नाटक को सरकारी नीतियों में शामिल करने का आह्वान करते हुए कहा कि हम अपनी श्रेष्ठ नाट्य परंपरा तभी बचा पाएंगे.

अर्जुनदेव चारण ने कहा कि नाटककार हमेशा वर्तमान को लेकर बातचीत करता है लेकिन उसमें अतीत या भविष्य के ऐसे संकेत जरूर होते हैं, जिन्हें कोई भी निर्देशक पकड़ सकता है. उन्होंने कहा कि नाट्य निर्देशकों को भी साहित्य को एक शास्त्र के रूप में पढ़ना और समझना होगा, तभी वे उसके रूपांतरण और निर्देशन करते समय उसके साथ न्याय कर पाएंगे. उनका कहना था कि अब केवल यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ा नहीं जा सकता कि हिंदी में अच्छे नाटक नहीं हैं.

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में चंद्रशेखर कंबार ने युवा निर्देशकों द्वारा उपन्यास या कहानी का निर्देशन स्वयं करने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बहुत गलत प्रक्रिया है और इसे रोका जाना चाहिए. क्योंकि ऐसा करके वे अपनी प्रस्तुतियों को 'विज्युली' तो प्रभावी बना लेते हैं लेकिन उसमें संवाद या नाट्य तथ्य गायब हो जाते हैं. उन्होंने थियेटर को पीपुल के लिए तथा ड्रामा को राइटर से जोड़कर देखने की अपील की.

इन परिचर्चाओं से इतर भारतीय साहित्य में गांधी विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का प्रथम सत्र जो 'गांधी और भारतीय कथा साहित्य' पर केंद्रित था की अध्यक्षता एस. एल. भैरप्पा ने की और श्रीभगवान सिंह, मालन वी. नारायणन, प्रबोध पारिख़ तथा जसवंती डिमरी ने अपने आलेख प्रस्तुत किए. दूसरा सत्र 'विश्व-दृष्टि में गांधी' की अध्यक्षता सितांशु यशश्चंद्र ने की और चिन्मय गुहा, सीमा शर्मा, जैंसी जेम्स, सी.एन. श्रीनाथ ने अपने आलेख पढ़े. तृतीय सत्र 'आत्मकथाओं में गांधी' की अध्यक्षता गिरिराज किशोर ने की और उदयनारायण सिंह, बद्रीनारायण, जतिंद्र कुमार नायक तथा मधु सिंह ने अपने आलेख पढ़े. चतुर्थ सत्र 'गांधी और भक्ति साहित्य' की अध्यक्षता हरिश त्रिवेदी ने की और एस.आर. भट्ट तथा मोहम्मद आज़म ने अपने आलेख पढ़े.

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