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कुछ शब्द जो मुझे कहने हैं तुमसे, और साथ ही 'साहित्य आजतक' की पूरी टीम से...: डॉ प्रकाश मनु

'साहित्य आजतक' की एक आत्मीय छवि मेरे मन में बनती जा रही है, जो आज की आपाधापी और भब्भड़ वाली दुनिया में थोड़ा सुकून देती है...डॉ प्रकाश मनु की प्रतिक्रिया 

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 20 June 2019
कुछ शब्द जो मुझे कहने हैं तुमसे, और साथ ही 'साहित्य आजतक' की पूरी टीम से...: डॉ प्रकाश मनु साहित्यकार डॉ प्रकाश मनु [ फाइल फोटो ]

अभी मैं नहीं मरूंगा
अभी करने हैं बहुत काम
अभी लिखनी हैं कविताएं
और उनमें उगाने हैं हरे-भरे खुशमिजाज पेड़
झील दरिया और गुनगुनाता हुआ जंगल...

उनकी एक कविता कि ये चंद पंक्तियां यह बताने के लिए काफी हैं कि हमारे दौर को अपने प्रचुर लेखन से प्रभावित करने वाले साहित्यकार प्रकाश मनु के लिए साहित्य क्या है. साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित प्रकाश मनु बच्चों के जाने-माने लेखक हैं. वह लगभग पच्चीस वर्षों तक बच्चों की लोकप्रिय पत्रिका 'नंदन' से जुड़े रहे और हमेशा लीक से अलग हटकर काम किया. एक अन्य कविता में उन्होंने लिखा था.

प्रकाश मनु कौन है
कौन है प्रकाश मनु
वे बोले
जब मैं बोलकर उतरा मंच से.
वे थे कई
चेहरे पत्थर आंखें कई
वे थे सहज सुखासीन
मन्द-मन्द हंसते फुरफुराते...

वाकई मनु जी को समझना उनके महान गुरुजनों को समझने की तरह ही मुश्किल है. कविताएं, कहानियां, उपन्यास, नाटक, महान युगनायकों को जीवनियाँ, साक्षात्कार, शोध, निबंध, इतिहास और दिलचस्प ज्ञान-विज्ञान साहित्य लिखकर डॉ प्रकाश मनु ने हिंदी साहित्य को न केवल बेतरह समृद्ध किया बल्कि इसमें बहुत कुछ नया और मूल्यवान जोड़ा.

'साहित्य आजतक' ने कल ही सौ से भी अधिक पुस्तकों के लेखक प्रकाश मनु की आत्मकथा 'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ' के पहले खंड का एक अंश छापा था. पुस्तक से इतर किसी भी प्रकाशन माध्यम पर इस आत्मकथा के अंश पहली बार प्रकाशित हुए थे, और उसके बाद डॉ मनु ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, वह यों है शब्दशः. 

****

बहुत सुंदर ढंग से मेरी आत्मकथा आप लोगों ने दी. 'साहित्य आजतक' की एक आत्मीय छवि मेरे मन में बनती जा रही है, जो आज की आपाधापी और भब्भड़ वाली दुनिया में थोड़ा सुकून देती है....यों भी मेरे लिए ये बहुत भावुक कर देने वाले क्षण हैं, जब मेरी चिर-प्रतीक्षित आत्मकथा देश-दुनिया में फैले मेरे सहृदय पाठकों तक पहुँच रही है.

इन क्षणों में बहुत-बहुत याद आ रहे हैं साहित्य की दुनिया में हिम्मत और हौसला देने और राह सुझाने वाले मेरे साहित्यिक गुरुओं- देवेंद्र सत्यार्थी, रामविलास शर्मा, शैलेश मटियानी, विष्णु खरे और रामदरश मिश्र जी की...! इनमें रामदरश जी से तो अभी थोड़ी देर पहले ही बात हुई और मेरी आत्मकथा के प्रकाशन की बात सुनते ही, उन्होंने जिस तरह गरमजोशी से बधाई दी, उससे मेरी आँखें भीग गईं...! सत्यार्थी जी, रामविलास जी, शैलेश मटियानी और विष्णु खरे आज नहीं हैं....हालाँकि मेरे दिल में उनकी जो जीवंत छवियाँ हैं, वे तो मेरे मरते दम तक कभी न जाएँगी....

आज अपने इन स्नेहिल साहित्यिक गुरुओं की याद आ रही है, जिन्होंने हर हाल में हिम्मत से जीने और मुश्किलों के बावजूद सिर उठाकर जीने का मंत्र दिया....याद आती हैं माँ, पिता...मेरे बहुत-बहुत प्यारे दोस्त, जिन्होंने मुझे जीने के मानी दिए....वे सब न होते तो न आज मैं होता और न यह आत्मकथा ही सामने आ पाती.

अलबत्ता, इन भावुक क्षणों में 'साहित्य आजतक' की उत्साही टीम के साथ-साथ मैं उन सभी कृपालु मित्रों और साहित्यिकों का धन्यवाद करता हूँ, जिनका साथ मेरे अंदर उत्साह की लहर भरता रहा, और निरंतर लिखवाता रहा....अपनी आत्मकथा के बाकी दो खंडों को फाइनल टच दे रहा हूँ. उम्मीद है, वे भी इस बरस आ जाएँगे....और फिर आगे का मुकाम...आगे की यात्राएँ...!! शायद फिर यहीं कहीं मुलाकात हो आप सबसे...

बहुत-बहुत स्नेह पूर्वक,
आप सभी का, प्रकाश मनु

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