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सीमान्त कथा, शर्मिष्ठा, ऑफ़िशियली पतनशील जैसी दर्जनों किताबों का लोकार्पण, परिचर्चा

विश्व पुस्तक मेला में वाणी प्रकाशन की ओर से ही आयोजित कार्यक्रमों की बात करें तो काफी गंभीर किताबों पर बड़े-बड़े लेखक यहां जुटे. कई नई किताबों का लोकार्पण हुआ तो कई चर्चित किताबों पर परिचर्चा हुई.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 16 January 2020
सीमान्त कथा, शर्मिष्ठा, ऑफ़िशियली पतनशील जैसी दर्जनों किताबों का लोकार्पण, परिचर्चा विश्व पुस्तक मेला 2020 में उषाकिरण खान के उपन्यास 'सीमान्त कथा' पर चर्चा

नई दिल्लीः विश्व पुस्तक मेला पाठकों के उत्साह के चलते प्रकाशकों और लेखकों के लिए किसी अवसर से कम नहीं था. यहां वाणी प्रकाशन की ओर से ही आयोजित कार्यक्रमों की बात करें तो काफी गंभीर किताबों पर बड़े-बड़े लेखक यहां जुटे. कई नई किताबों का लोकार्पण हुआ तो कई चर्चित किताबों पर परिचर्चा हुई.

लेखिका उषाकिरण खान के उपन्यास 'सीमान्त कथा' पर आखिरी दिन परिचर्चा आयोजित हुई. 'सीमान्त कथा' केवल एक उपन्यास नहीं बल्कि 1974 के बिहार आन्दोलन के बाद के सबसे नाज़ुक दौर का जीवन्त दस्तावेज़ भी है. विभिन्न जनान्दोलनों, जातीय संघर्षों तथा नरसंहारों की भूमि बिहार से उपजी यह कथा न केवल हमें उद्वेलित करती है बल्कि वामपन्थी राजनीति के खोखलेपन को भी उजागर करती है.

कार्यक्रम में उषाकिरण खान के साथ, गीताश्री, मनीषा कुलश्रेष्ठ, प्रोफ़ेसर अल्पना मिश्र, पर्यावरणविद सोपान जोशी, वाणी प्रकाशन के महानिदेशक अरुण माहेश्वरी, ग्रामीण सम्वेदना के वरिष्ठ लेखक मनीष कटारिया, आराधना प्रधान और पत्रकार शेष नारायण सिंह उपस्थित थे.

वाणी प्रकाशन ग्रुप की प्रबन्ध निदेशक आदिति माहेश्वरी-गोयल ने मंच का संचालन करते हुए सभी अतिथियों और दर्शकों का स्वागत किया और प्रोफ़ेसर अल्पना मिश्र से प्रश्न किया कि इस उपन्यास ने हिन्दी साहित्य जगत में किस प्रकार का योगदान दिया है? अल्पना मिश्र का कहना था कि यह उपन्यास एक प्रकार से लोक के विश्वास, रूप, छवियों के साथ-साथ कमियों को भी सामने रखता है. उनके अनुसार इस उपन्यास में राजनीतिक जटिलताओं को देख समझकर गहराई से पाठकों के सामने रखा गया है. 
पर्यावरणविद सोपान जोशी से प्रश्न किया गया कि इस उपन्यास का समकालीन परिप्रेक्ष्य में किस प्रकार मूल्यांकन किया जाये. उनका जवाब था कि आज वर्तमान समय में छात्र-छात्राओं को सही दिशा दिखाने वाले ज़्यादा लोग नहीं है, और इस समय में उषाकिरण खान जैसी अनुभवी लेखिकाओं की पैंनी दृष्टि छात्रों और छात्राओं के जीवन को समझने में उपयोगी है.

लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने उपन्यास 'सीमान्त कथा' पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस उपन्यास के माध्यम से उषाकिरण खान ने मिथिला की स्त्रियों के लिए खिड़की खोली है. इस उपन्यास में मिथिला की औरतों का दर्द और वे राजनीति संक्रमण को किस प्रकार महसूस करती हैं, इन सबका चित्रण उषाकिरण खान बख़ूबी करती हैं. ये वो औरतें हैं जो घर रसोई तक सीमित नहीं रहतीं, उन्हें वहां से निकल अपनी बात कहनी आती हैं. मनीषा कुलश्रेष्ठ के अनुसार ऊषाकिरण खान की खिड़कियों में बहुत सी सम्भावनाएं हैं.

अदिति माहेश्वरी-गोयल ने वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी से पूछा कि यह उपन्यास आज के कालखण्ड में क्यों आवश्यक है? अरुण माहेश्वरी का जवाब था कि इस उपन्यास में जीवन जीने के दृष्टिकोण में खुलापन है, यह अपने समय से आगे की बात रखता है. मनीष कटारिया ने बताया कि इस उपन्यास में ग्रामीण औरतों के पहनावे से लेकर, व्यवहार, बातचीत तक में आधुनिक दृष्टिकोण मिलता है. यहां स्वाभिमानी सीता के समान स्त्रियों में एक आधुनिक ठसक मिलती है.

उषाकिरण खान ने बताया कि असल में यह राजनीतिक, छात्र आन्दोलन से जुड़ा उपन्यास है, जिसके कथानक के केन्द्र में दो छात्र है. इसके अन्तिम भाग का पाठ करते हुए उन्होंने कहा कि इसके मूल में गाँधी की, उनकी अहिंसा की विचारधारा है. उन्होंने दावा किया कि यह उपन्यास हिंसा के विरुद्ध गाँधी की प्रतिष्ठा करता है. सोपान जोशी के अनुसार ये उपन्यास राजनीतिक बेचैनी के साथ पर्यावरणीय हिंसा को भी समझने में मदद करता है. लेखिका गीताश्री ने मिथिला में सशक्त नारियों की एक पूरी परम्परा को सामने रखते हुए उषाकिरण खान में मैत्रेयी, गार्गी, भामती के सम्मिश्रण की बात कही. उन्होंने कहा कि खान ने सीता के स्वाभिमान के ऊपर सबसे अधिक लिखा.

वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह कहा कि आज जहां सरकार गाँधी के विचारों को पूर्ण रूप से समझने में नाकामयाब रही है, वहीं यह उपन्यास गाँधी की अहिंसात्मक परम्परा को आन्दोलन में प्रतिष्ठित तो करता ही है, उनकी बहुआयामी विचारधारा को पाठकों के सामने रखता है. यही परम्परा आगे जयप्रकाश नारायण में मिलती है. आख़िर में उषाकिरण खान ने 'लोकतन्त्र में हिंसा का स्थान नहीं' कह कर अपनी बात ख़त्म की.

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मेले में ही वाणी के ही स्टॉल पर जो अन्य कार्यक्रम हुए, उनमें युवा रचनाकार अणुशक्ति सिंह के उपन्यास 'शर्मिष्ठा: कुरु वंश की आदि विद्रोहिणी' का लोकार्पण और परिचर्चा की गयी. महाभारत की एक उपेक्षित पात्रा 'शर्मिष्ठा', जो पाण्डवों की पूर्वजा थी, जिसने रानी होते हुए भी, दासी के रूप में अपना जीवन बिताया के संघर्ष का वर्णन अणुशक्ति सिंह ने बेहद मार्मिकता से किया है. कार्यक्रम में अणुशक्ति सिंह के साथ, कवयित्री अनामिका, मनीषा कुलश्रेष्ठ तथा रश्मि भारद्वाज उपस्थित रहीं.

कार्यक्रम का संचालन करते हुए रश्मि भारद्वाज ने कहा कि इस उपन्यास में 'शर्मिष्ठा' आधुनिक स्त्री है, जो ऐतिहासिक होते हुए भी, अपनी विचारधारा में आधुनिक है. शर्मिष्ठा वह स्त्री है जो पुत्रवधू के लिए रोती है, ना कि अपने पुत्र के लिए. इस उपन्यास में दो स्त्रियाँ समानान्तर खड़ी होती दिखती हैं. कवयित्री अनामिका ने कहा कि यह ऐसा उपन्यास है, जैसे इतिहास का मिथक बाल खोले सामने बैठा है और इसकी जटाओं को गांठों के साथ सुलझाने की जो ज़रूरत है, जिसे लेखिका अणुशक्ति सिंह ने पूरा किया है. अणुशक्ति सिंह वह आधुनिक स्त्री हैं, जो अलग-अलग कोणों से इतिहास की दबी गुत्थियों को सुलझाती हैं, जैसे बिना सवाल पूछे बर्फ़ की पट्टी दुखती चोट पर रख दी गयी हो. यह मानवीय दृष्टिकोण के माध्यम से लिखा गया उपन्यास है. जिसमें कोई एक पात्र प्रधान नहीं बल्कि सभी महत्त्वपूर्ण हैं. अणुशक्ति सिंह ने इतिहास के रिक्त स्थानों की पूर्ति की है, ज्ञान को संज्ञान बनाने की कोशिश की है.

मनीषा कुलश्रेष्ठ ने कहा कि लेखिका अणुशक्ति सिंह ने 'शर्मिष्ठा' उपन्यास में कल्पना से भी अधिक सुंदर चित्रण किया है. अणुशक्ति सिंह से जब रश्मि भारद्वाज ने प्रश्न किया कि अपने उपन्यास के लिए उन्होंने 'शर्मिष्ठा' पात्र को ही क्यों चुना? तो उन्होंने बताया कि यह ऐसी पात्रा रही है, जिसके पास अभिव्यक्ति की परिस्थिति न थी. ऐसे में इस पात्र को वाणी देना आवश्यक हो जाता है. 'शर्मिष्ठा' के एकल मां होने ने भी उन्हें उस पर लिखने के लिए उत्साहित किया. परिचर्चा के बाद 'शर्मिष्ठा' उपन्यास का लोकार्पण, श्रोताओं की तालियों के बीच किया गया.

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वाणी द्वारा ही लेखक मंच पर आयोजित एक अन्य कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हृदयनारायण दीक्षित की धर्मशास्त्र पर आधारित वैदिक परिचय ग्रन्थमाला के पहले खण्ड 'ऋग्वेद' का लोकार्पण व परिचर्चा की गयी. इस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव, लेखिका प्रो पुष्पिता अवस्थी एवं अरुण माहेश्वरी उपस्थित थे. भारतीय दर्शन और संस्कृति का आदि स्रोत है ऋग्वेद, जो विश्व मानव का प्राचीनतम ज्ञान अभिलेख भी है, इसे रहस्यात्मक बताकर इसके इतिहास की चर्चा कम की जाती रही है, परन्तु हृदयनारायण दीक्षित के योगदान से पुनः इस ओर ध्यान दिया जा रहा है, इसी उद्देश्य से इस वैदिक परिचय ग्रन्थमाला की शुरुआत की गयी.

हृदयनारायण दीक्षित ने कहा कि भले ही वह अर्थशास्त्र के विद्यार्थी रहे, पर वह वेदों का अध्ययन-मनन करते रहते थे. इसी कारण उनकी रुचि वेदों की तरफ गयी. उन्होंने कहा कि कई लोग वेदों पर यह आक्षेप लगाते हैं कि यह परलोकवादी, भाववादी हैं, परन्तु ऋग्वेद के साढ़े दस हज़ार मंत्रों में परलोकवाद की बात बहुत कम जगह हुई है. जहां विज्ञान की शुरुआत प्रश्नों से होती है, वहीं ऋग्वेदों में भी प्रश्नों की लम्बी परम्परा है. जिसमें राजनीतिक, सामाजिक, निजी जैसे बहुआयामी विषय शामिल हैं.

राहुल देव ने हृदयनारायण दीक्षित को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने साढ़े चार हज़ार लेखों के साथ पच्चीस ग्रंथों की रचना की है. ऋग्वेद की समकालीन भारत में प्रासंगिकता पर चर्चा करते हुए उन्होंने इनका संबंध वर्तमान जीवन से जोड़ा है. इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अपना अनुभव साझा करते हुए राहुल देव ने कहा कि उन्होंने एक हज़ार से अधिक सूक्तियों का प्रयोग किया है, जो नयी पीढ़ी के लिए अति आवश्यक है. भारत की अंतर्निहित चेतना का प्रमाण इनमें मिलता है. राहुल देव के अनुसार हृदयनारायण दीक्षित सच्चे अर्थों में राजर्षि हैं.

इस अवसर पर अरुण माहेश्वरी ने स्वलिखित कविता का वाचन किया. पत्रकार हेमन्त ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के बाद राजनीति के ज्ञाता हृदयनारायण दीक्षित हैं. लेखिका पुष्पिता अवस्थी ने कहा कि यह पुस्तक ऋग्वेद के सन्देश को जनमानस तक पहुंचाने में सहायक है. उन्होंने नयी पीढ़ी से इसे पढ़ने का आग्रह किया, क्योंकि उनका मानना है कि इसके पठन-पाठन से ज्ञानवान हुआ जा सकता है.

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वाणी के ही स्टॉल पर सुप्रसिद्ध लेखक सूर्यनाथ सिंह के कहानी संग्रह 'कोई बात नहीं' का लोकार्पण व परिचर्चा की गई. यह कहानी संग्रह युवाओं के मन को समझता है और उनकी तरफ़ से सवाल उठाता है. कार्यक्रम के दौरान लेखक सूर्यनाथ सिंह के अलावा प्रोफ़ेसर गोपेश्वर सिंह, अभय कुमार दूबे, अरुण माहेश्वरी और  वीरेंद्र यादव भी उपस्थित थे.

सूर्यनाथ सिंह ने इन कहानियों को युवा मन को समझने के प्रयास में लिखी जाने वाली कहानियां कहा. उन्होंने कहा कि उन्हें क़िताबों से अधिक प्रेम है, इसी कारण उन्हें मेला पसंद है. प्रोफ़ेसर गोपेश्वर सिंह ने कहा कि यह कहानी संग्रह गांवो की लुप्त हो गई स्मृतियों को सामने रखता है. वीरेंद्र यादव ने उपन्यास विधा से कहानी की ओर आने के लिए सूर्यनाथ सिंह को धन्यवाद दिया. उन्होंने कहा कि सूर्यनाथ सिंह ने गांवों को पुनर्सर्जित किया है, जिससे यह कहानी संग्रह समाज की मूलभूत संरचनाओं को समझने में मदद करता है. अभय कुमार दूबे के अनुसार ग्राम केंद्रित लेखन अधिक चुनौतियों भरा है. वह मानते हैं कि वर्तमान भारतीय समाज की समस्याओं का हल गांवों में ही है.

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लेखिका शीला डागा किन्नर वर्ग के अस्तित्व को लेकर सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही हैं. उनका मानना है कि आज भी इस ख़ास वर्ग का समाज में कोई सम्मान नहीं है.उनकी पुस्तक ‘किन्नर गाथा' के लोकार्पण एवं परिचर्चा में हरियश राय, अरुण माहेश्वरी, अरविन्द गौड़ और सूर्यनाथ सिंह उपस्थित रहे. अरुण माहेश्वरी ने कहा कि किन्नर हमारे सुख-दुख का अंग हैं. इसीलिए  ‘किन्नर गाथा’ वर्तमान सन्दर्भ में बहुत महत्त्वपूर्ण है. अरविन्द गौड़ ने कहा कि जिन्हें अपना पेट भरने के लिए देह बेचनी पड़ती है. उस समुदाय का आन्दोलन अब एक ख़ास पहचान लिए हुए है. वक्त बदल रहा है, वक्त के साथ समाज भी बदल रहा है.

इसी तरह डॉ राकेश कुमार योगी की पत्रकारिता व राजनीति पर आधारित नयी पुस्तक ‘जनतन्त्र एवं संसदीय संवाद' का लोकार्पण एवं परिचर्चा की गयी. इस कार्यक्रम में डॉ राकेश कुमार योगी के साथ प्रोफ़ेसर सुनील कुमार चौधरी, प्रोफ़ेसर मुकेश कुमार, राणा यशवन्त, डॉ आशीष जोशी, अतुल चौरसिया, श्याम किशोर, राजेश झा और प्रोफ़ेसर लाल बहादुर ओझा उपस्थित थे. अदिति माहेश्वरी गोयल ने मंच संचालन करते हुए राकेश कुमार योगी से पूछा कि इस किताब की आवश्यकता क्यों है?

डॉ योगी ने बताया कि समाज में जिस जनतन्त्र की परिकल्पना की जाती रही है, जिस प्रकार का संवाद होता आ रहा है, वह असल में कैसी होनी चाहिए, उस आदर्शात्मक स्थिति की परिकल्पना इस पुस्तक में की गयी है. संसदीय विवाद से संवाद की यात्रा का चित्रण इस पुस्तक में है. अतुल चौरसिया का कहना था कि राकेश कुमार योगी ने बहुत महत्त्वपूर्ण विषय का चुनाव किया है, जिसमें राजनीतिक समीक्षा की पूर्ति की गयी है. उनके अनुसार इस किताब ने महत्त्वपूर्ण शुरुआत की है.

डॉ आशीष जोशी ने कहा कि इस पुस्तक के लिए साक्षात्कार लेना काफ़ी कठिन था, क्योंकि यह विषय अपने आप में अति महत्त्वपूर्ण है, जिसमें व्यक्ति-से-व्यक्ति का उल्लेख है. उनके अनुसार संवाद का मूल उद्देश्य, सहमति उत्पन्न करना, समाज और राष्ट्र का विकास करना है. वह संसदीय भाषा को भी व्याख्यायित करते हैं. वह संवाद को केवल संवाद रखना, विवाद न बनने का आग्रह करते हैं.

लाल बहादुर ओझा ने कहा कि संवाद स्वयं से शुरू होकर सामाजिक रूप लेता है, जिसमें अन्तरात्मा का संवाद कहीं पीछे छूट गया है. संवाद में स्वीकृति के भाव को आवश्यक मानते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परम्परा संवाद, मध्यमार्ग की परम्परा है, संसद जिसे भूलती जा रही है. श्याम किशोर ने ‘संवाद की बिगड़ती परिस्थिति' पर बात करते हुए संसदीय संवाद को निजी जीवन से अलग माना, और कहा कि यहां विचारधारा, विषमता बीच में नहीं आती.
 
प्रोफ़ेसर सुनील कुमार चौधरी ने संवाद और तर्क बीच संसद को ढूंढ़ते हुए कहा कि इस पुस्तक में तीन प्रकार के अनिवार्य परिवर्तनों को उन्होंने पाया है. पहली पुस्तक में अभाव की बजाय भाव की बात है, दूसरा चिन्ता के स्थान पर चिन्तन और तीसरा विवाद से संवाद की ओर दिशा का वर्णन है. प्रोफ़ेसर मुकेश कुमार ने इस पुस्तक को वर्तमान समय की चिन्ता पर केन्द्रित माना. वहीं जनतन्त्रीय संवाद को वह स्वतन्त्रता संघर्ष की देन मानते हैं, और इसे जवाहरलाल नेहरू, अम्बेडकर, सरदार वल्लभ भाई पटेल की परम्परा से जोड़ते हैं. परिचर्चा के आख़िर में उन्होंने अपनी पुस्तक के बाहरी आवरण पर बनी ख़ाली कुर्सी को उस व्यवस्था का प्रतीक बताया, जिसमें संवाद महत्त्वपूर्ण है.

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इस अवसर पर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार स्वर्ण कमल से सम्मानित फिल्म समीक्षक, आलोचक व वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय की आलोचनात्मक कृति 'मार्क्सवाद का अर्धसत्य' पर भी एक परिचर्चा आयोजित की गयी. इस कार्यक्रम में अनंत विजय के साथ यायावर व युवा लेखक राहुल नील उपस्थित थे. राहुल नील ने अनंत विजय से प्रश्न किया कि फ़िल्मों पर लिखते लिखते, इस सामाजिक विषय पर आने की वजह क्या थी? अनंत विजय ने कहा कि उन्होंने कई ऐसी पुस्तकों का अध्ययन किया और कई तथ्यों का आकलन करते हुए उन्हें विचार आया कि अपनी इस जानकारी को बिना किसी लाग लपेट के, तथ्यात्मक रूप में पाठकों तक पहुंचाना चाहिए. उन्होंने यह माना कि पुस्तकों की रचना के बाद वह अधिक मुखर हुए हैं. उन्हें लगता है कि अपनी बात वह अधिक उचित रूप में पहुंचा पाते हैं.

राहुल नील ने उनसे पूछा कि किस प्रकार अपनी पुस्तक के विषय को वह वर्तमान समाज में विश्वविद्यालयों की समस्या, विचारधाराओं के द्वंद्व से जोड़कर देखते हैं? अनंत विजय का जवाब था कि अपनी इस पुस्तक लेखन की यात्रा के दौरान वह कई तथ्यों से रूबरू हुए, उन्होंने कई तथाकथित मार्क्सवादियों के चेहरों के पीछे छिपे झूठ को पाया, जिसका वर्णन उन्होंने इस पुस्तक में किया है. राहुल नील ने अनंत विजय की पुस्तक 'मार्क्सवाद का अर्धसत्य' की एक पंक्ति 'विचारों का वामपन्थी फ़ासीवाद' के सम्बन्ध में सवाल पूछा, तो अनंत विजय ने चीन के वर्तमान फ़ासीवाद की, निरंकुशताओं की चर्चा करते हुए कहा कि भारत का लोकतन्त्र इतना मजबूत है, कि यहां की जनता कभी भी फ़ासीवाद को अपने पांव पसारने नहीं देगी. स्वयं के गढ़े गए शब्दों जैसे 'छलात्कार' की विवेचना करते हुए उन्होंने 'शौक़त आज़मी' की आत्मकथा के कुछ किस्सों का भी वर्णन किया.

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