हर दो हफ़्ते में धरती से लुप्त हो रही एक भाषाः अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव में वक्ता

साहित्य अकादमी में 'अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष' के अवसर पर 'अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव' का शुभारंभ हुआ. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात ओड़िया कवि एवं विद्वान डॉ सीताकांत महापात्र व विशिष्ट अतिथि प्रख्यात कवि और लोक कथाकार हलधर नाग थे.

Advertisement
aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 12 August 2019
हर दो हफ़्ते में धरती से लुप्त हो रही एक भाषाः अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव में वक्ता साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव शुरू

नई दिल्लीः साहित्य अकादमी में आज 'अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष' के अवसर पर आज 'अखिल भारतीय आदिवासी लेखक उत्सव' का शुभारंभ हुआ. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात ओड़िया कवि एवं विद्वान डॉ सीताकांत महापात्र व विशिष्ट अतिथि प्रख्यात कवि और लोक कथाकार हलधर नाग थे.

कार्यक्रम का बीज वक्तव्य प्रख्यात विद्वान एवं भाषाविद् डॉ उदय नारायण सिंह ने दिया और कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादेमी के संताली भाषा परामर्श मंडल के संयोजक मदन मोहन सोरेन ने की. कार्यक्रम का आरंभ संताली लोकगीत से हुआ.

अपने स्वागत भाषण में अकादेमी के सचिव के श्रीनिवासराव ने संयुक्त राष्ट्रसंघ का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ ने वर्ष 2019 को अंतरराष्ट्रीय स्वदेशी भाषा वर्ष या अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष घोषित किया है. एक अनुमान के अनुसार इस समय दुनिया की 6700 बोली जाने वाली भाषाओं में से 40 प्रतिशत भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं. जबकि इन भाषाओं में उस समाज की संस्कृति और उसका हज़ारों वर्षों का ज्ञान संरक्षित है.

यदि हम भारत की बात करें तो भारत एक बहुभाषी विविधता वाला देश है और यहां लगभग 19,569 मातृभाषाएं बोली जाती हैं. यह अलग बात है कि इनमें से केवल 121 भाषाएं ही ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले 10,000 से अधिक हैं. People's Lingustic Survey of India (PSLI)  ने एक सर्वेक्षण किया था. इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट बहुत चिंताजनक है.

रिपोर्ट के अनुसार अगले 50 सालों में भारत में 1.3 बिलियन लोगों द्वारा बोली जा रही भाषाओं में आधे से अधिक भाषाएँ लुप्त हो जाएंगी. उन्होंने साहित्य अकादेमी द्वारा आदिवासी वाचिक और मौखिक साहित्य तथा भाषाओं के संरक्षण के लिए किए जा रहे कार्यों की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की.
 
अपने आरंभिक वक्तव्य में संताली भाषा के संयोजक, मदन मोहन सोरेन ने कहा कि भाषाओं के लिहाज से भारत दुनिया का दूसरा सबसे समृद्ध राष्ट्र है, लेकिन विकास की आधुनिक दौड़ ने भाषाओं को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाया है और आज यह स्थिति है कि हर दो हफ़्ते में एक भाषा पृथ्वी से लुप्त हो रही है.

उन्होंने कहा कि हमारे देश में भी हो, मुंडारी, कुडुख़ आदि कई भाषाएं लुप्त होने के कगार पर हैं. उन्होंने भारत सरकार से अपील की कि वह तुरंत ही इस चिंताजनक स्थिति पर ध्यान दे और इन स्वदेशी भाषाओं को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए.

अपने उद्घाटन वक्तव्य में प्रख्यात ओड़िया कवि एवं विद्वान डॉ सीताकांत महापात्र ने साहित्य अकादेमी को इस आयोजन के लिए बधाई देते हुए कहा कि सभी आदिवासी भाषाएं अपनी ज़मीन और पर्यावरण से जुड़ी हुई होती हैं और उनमें ज्ञान की अनगिनत बातें छुपी हुई होती हैं.

उनका कहना था कि हमने विकास की अंधाधुंध दौड़ में जंगलों का जो सफाया किया है उससे इन आदिवासी लोगों को अपना जीवन यापन करना दूभर होता जा रहा है. साथ ही इन लोगों का जंगलों से बना हजारों वर्षों का संबंध भी संकट में है. उन्होंने कई आदिवासी भाषाओं में निहित ज्ञान की विशिष्टता का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें समय रहते उचित कदम उठाने होंगे.
 
विशिष्ट अतिथि हलधर नाग ने संबलपुरी कोशली के कई लोकगीत प्रस्तुत किए और सभी लोगों से अपील की कि हमारे देश की भाषायी विविधता को बचाना बेहद आवश्यक है.

अपने बीज वक्तव्य में प्रख्यात विद्वान एवं भाषाविद् डॉ. उदय नारायण सिंह ने दक्षिण एशियाई भाषाओं के संरक्षण हेतु यूनेस्को के साथ अपने कार्य को याद करते हुए कहा कि कई भारतीय भाषाओं के विलुप्त होने का ख़तरा सबसे ज़्यादा है. उन्होंने विभिन्न संस्थाओं द्वारा भाषा संरक्षण के कार्यों की जानकारी देते हुए कहा कि इनमें साहित्य अकादेमी का भी काम बेहद महत्त्वपूर्ण है. उन्होंने आठ केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भारतीय भाषाओं के संरक्षण के लिए स्थापित केंद्रों की भी जानकारी दी.
 
कार्यक्रम का प्रथम सत्र 'भारत की आदिवासी भाषाएं: विशिष्टता, मुद्दे, वर्तमान स्थिति एवं चुनौतियां' विषय पर केंद्रित था. कार्यक्रम की अध्यक्षता मिमि केविचुसा इजुङ ने की और शांता नाइक (बंजारा), महादेव टोप्पो (कुडुख़), सत्य नारायण मुंडा (मुंडारी), पूर्णचंद्र हेम्ब्रम (संताली), चंद्रमोहन हेब्रू (हो) ने आलेख-पाठ किए.
 
कार्यक्रम का दूसरा सत्र कहानी-पाठ पर केंद्रित था. कार्यक्रम की अध्यक्षता केशरी लाल वर्मा ने की और प्रदीप कन्हर (कुई), के. सानी एलेक्ज़ेंडर (माओ), बीरबल सिंह (मुंडारी), शोभानाथ बेसरा (संताली) ने अपनी कहानियाँ प्रस्तुत कीं.
 
आज का अंतिम सत्र कविता-पाठ को समर्पित था जिसकी अध्यक्षता बादल हेम्ब्रम ने की और कालिङ बोराङ (आदि), अंगम ज़तुंग चिरू (चिरू), पद्मिनि नाइक (हो), किशोर कोरा (कोरा), कलाचंद्र महाली (महाली), अशोक कुमार पुजाहारी (संबलपुरी-कोशाली), गागरिन शबर (शबर) ने अपनी कविताएँ प्रस्तुत कीं.

कार्यक्रम के अंत में हलधर नाग ने राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत एक देशगीत प्रस्तुत कर श्रोताओं में उत्साह भर दिया. इस अवसर पर अकादेमी द्वारा प्रकाशित आदिवासी, वाचिक एवं मौखिक साहित्य की पुस्तकों की एक विशेष प्रदर्शनी भी आयोजित की गई.

ज्ञात हो कि दो दिवसीय इस आदिवासी लेखक उत्सव में देश की 60 आदिवासी भाषाओं के लेखक एवं विद्वान भाग ले रहे हैं. कल का चौथा सत्र ‘भारत की आदिवासी भाषाएँ संरक्षण एवं पुनरोद्धार’ विषय पर केंद्रित होगा और बाकी तीन सत्रों में कहानी एवं कविता-पाठ के सत्र होंगे.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay