जन्मदिन विशेषः व्योमेश शुक्ल के काव्य-संकलन 'फिर भी कुछ लोग' से 5 चुनिंदा कविताएं

साहित्य आजतक पर पढ़िए व्योमेश शुक्ल के जन्मदिन पर उनके संकलन 'फिर भी कुछ लोग' से चुनी हुईं 5 कविताएं

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aajtak.in नई दिल्ली, 02 July 2019
जन्मदिन विशेषः व्योमेश शुक्ल के काव्य-संकलन 'फिर भी कुछ लोग' से 5 चुनिंदा कविताएं व्योमेश शुक्ल के काव्य-संकलन 'फिर भी कुछ लोग' का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

व्योमेश शुक्ल युवा कवि और उभरते हुए रंगकर्मी हैं. अपनी बहुमुखी प्रतिभा से उन्होंने रंगमंच और लेखन जगत का ध्यान तेजी से अपनी ओर खींचा है. हिंदी की कालजयी काव्य कृतियों पर नृत्य नाटिकाओं की प्रस्तुति से उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई. 25 जून, 1980 को वाराणसी में उनका जन्म हुआ. उन्होंने कविता, समीक्षा और आलोचना के क्षेत्र में खूब नाम कमाया और ढेर सारा अनुवाद किया. यहां प्रस्तुत कविताएं राजकमल से प्रकाशित व्योमेश शुक्ल की कविताओं के संकलन 'फिर भी कुछ लोग' से ली गई हैं. इस संकलन व व्योमेश शुक्ल की कविताओं के बारे में चर्चित कवि विष्णु खरे ने अपना मंतव्य दिया था.

विष्णु खरे का कहना था कि व्योमेश शुक्ल की कविता 'बूथ पर लड़ना' शायद हिंदी की पहली कविता है जो इतने ईमानदार कार्यकर्ताओं की बात करती है जिनसे खुद उनकी 'सेकुलर' पार्टियों के नेता आजिज आ जाते हैं, फिर भी वे हैं कि अपनी लड़ाई लड़ते रहने की तरकीबें सोचते रहते हैं. व्योमेश की ऐसी राजनीतिक कविताएँ लगातार भूलने के खिलाफ खड़ी हुई हैं और वे एक भागीदार सक्रियतावादी और चश्मदीद गवाह की रचनाएँ हैं, जिनमें त्रासद प्रतिबद्धता, आशा और एक करुणापूर्ण संकल्प हमेशा मौजूद हैं....

यहाँ यह संकेत भी दे दिया जाना चाहिए कि व्योमेश शुक्ल की धोखादेह ढंग से अलग चलने वाली कविताओं में राजनीति कैसे और कब आ जाएगी, या बिल्कुल मासूम और असम्बद्ध दिखने वाली रचना में पूरा एक भूमिगत राजनीतिक पाठ पैठा हुआ है, यह बतलाना आसान नहीं है....ये वे कविताएँ हैं जो 'एजेंडा', 'पोलेमिक' और कला की तिहरी शर्तो पर खरी उतरती हैं.   

साहित्य आजतक पर पढ़िए व्योमेश शुक्ल के जन्मदिन पर उनके संकलन 'फिर भी कुछ लोग' से चुनी हुईं 5 कविताएं

1.
जानना


एक दिन कीड़ा कागज़ पर बैठा
लेकिन इस बैठने से कुछ समझ पाना असम्भव था
इस तरह हल्का असम्भव एक बार छोड़कर चला गया वह मेरे लिए
हमें पतंग उड़ाना तैरना या हारमोनियम बजाना नहीं जानता हूं
वैसे ही इस कुछ या बहुत कुछ को समझना या सोचना भी शायद नहीं जानता
हूँगा मैंने खुद से कहा
एक जोड़ा आँसू के डब डब को तब समझ नहीं पाया था
ख़ुशी में रोने को समझता हूँ थोड़ा बहुत
अक्सर ख़ुशी को ही नहीं समझ पाता हूँ
रोना जानता हूँ
प्यार करना और पढ़ना दुनिया के सबसे कोमल और पवित्र काम हैं
निर्दोष हँसना अब शायद कोई नहीं जानता
तमाम काम यह एक बड़ा सच है कि तमाम लोग नहीं जानते
जानना हमेशा एक मुश्किल काम रहा

2.
हमेशा या कभी कभी


कुछ चीजें साथ साथ होती है
हमेशा या कभी कभी
मैं एक स्विच बन्द करता हूँ तो पड़ोसी का बल्ब बुझ जाता है
दूर सिनेमा का गाना बजता है हम अपनी सड़क पर
कभी कभी उसी गाने की ताल पर चलते पाए जाते हैं
वैसे हम किसी न किसी गाने की ताल पर हमेशा चलते रहते हैं
बचपन में कितनी बार पलक झपकती थी
उतनी बार बत्ती चली जाती थी पलक झपकते ही आ जाती थी
जब मैं दरोगा की अभद्र डाँट खा रहा होता हूँ
ठीक उन्ही क्षणों में थाने के वायरलेस के मुताबिक़
एक आदमी की मोटरसाइकिल चोरी चली जाती है
एक वाक्य में असफल होकर एक कमज़ोर नींद में डूबता हूँ
तो अमर सिंह की पार्टी का गुंडा धमकाने के लिए दरवाज़ा खटखटाता है

3.
यही है


जैसे हर क्षण कुछ घट रहा है
हो रहा सब कुछ घटना है
ऐसा कुछ नहीं हो रहा है जो लग रहा था कि होगा
अनिश्चित इसे कहते हैं
पूरा नहीं होता हुआ ताल बज रहा है
उसका आवर्तन अनन्त जितना लम्बा जिसमें
पूरा भूगोल समय का
जंगली भालू है उसमें कुछ बाँसुरियाँ हैं।
झीनी आवाज़ है नदी और माँ में से आती हुई
सब कुछ एक साथ यथार्थ हैं रहस्य है
यही है

4.
आज


जब घर के लोग काम पर या कहीं चले जाते हैं
वे दिनचर्या के तट पर जाकर हँसने लगती हैं लेकिन
आज वे अपनी जिम्मेदारियों की छत पर खड़ी
पतंग उड़ा रही है
आसमान में उन्होंने अपनी पतंगें
इतनी दूर तक बढ़ा दी है.
कि ओझल हो गई हैं
उन्हें वापस लाने में समय लग जाएगा
आज दूसरे कामों का नुक़सान होगा
खाना देर में बनेगा कपड़ा देर से धुलेगा
नीचे फ़ोन की घंटी देर तक बजती रहेगी कोई नहीं उठाएगा.
एक व्यक्ति दरवाजा खटखटाकर लौट जाएगा
कोई किसी को कुछ देने या किसी से कुछ कहने आएगा तो
यह नहीं हो पाएगा
वे छत पर हैं

5.
बूथ पर लड़ाई


पोलिंग बूथ पर कई चीज़ों का मतलब बिल्कुल साफ़
जैसे साम्प्रदायिकता माने कमल का फूल
और साम्प्रदायिकता-विरोध यानी संघी कार्यकर्ताओं को फर्जी वोट डालने से रोकना
भाजपा का प्रत्याशी
सभी चुनाव कर्मचारियों
और दूसरी पार्टी के पोलिंग एजेंटों को भी, मान लीजिए कि आर्थिक विकास के
तौर पर
एक समृद्ध नाश्ता कराता है
इस तरह बूथ का पूरा परिवेश आगामी अन्याय के प्रति भी कृतज्ञ
ऐसे में, प्रतिबद्धता के मायने हैं नाश्ता लेने से मना करना

हालांकि कुछ ख़ब्ती प्रतिबद्ध चुनाव पहले की सरगर्मी में
घर-घर पर्चियां बांटते हुए हाथ में वोटर लिस्ट लिए
सम्भावित फर्जी वोट ताड़ते हुए भी देखे जाते हैं
एक परफ़ेक्ट होमवर्क करके आए ये पहरुए
संदिग्ध नामों पर वोट डालने आए हुओं पर शक करते हैं

संसार के हर कोने में इन निर्भीकों की जान को खतरा है
इनसे चिढ़ते हैं दूसरी पार्टियों के लोग
अंततः अपनी पार्टी वाले भी इनसे चिढ़ने लगते हैं
ये पिछले कई चुनावों से यही काम कर रहे होते हैं
और आगामी चुनावों तक करते रहते हैं
ऐसे सभी प्रतिबद्ध बूढ़े होते हुए हैं.

और इनका आने वाला वक़्त ख़ासा मुश्किल है.
अब साम्प्रदायिक बीस-बीस के जत्थों में बूथ पर पहुँचने लगे है

और खुलेआम सैफुनिया सईदा फुन्नन मियाँ जुम्मन शेख अमीना और हामिद के
नाम पर वोट डालते हैं
इन्हें मना करना कठिन समझाना असम्भव रोकने पर पिटना तय
इनके चलने पर हमेशा धूल उड़ती है
ये हमेशा जवान होते हैं कुचलते हुए आते हैं।
गालियाँ वाक्य विन्यास तय करती हैं चेहरे पर विजय की विकृति
सृष्टि में कहीं भी इनके होने के एहसास से प्रत्येक को डर लगता है

एक चुनाव से दूसरे चुनाव के बीच के अन्तराल में
आजकल
फिर भी कुछ लोग इनसे लड़ने की तरकीबें सोच रहे हैं.

****
पुस्तकः फिर भी कुछ लोग
रचनाकारः व्योमेश शुक्ल
विधा: कविता
प्रकाशनः राजकमल प्रकाशन
कीमतः रुपए 150/- हार्डबाउंड
पृष्ठ संख्या: 124

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