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जयंती विशेषः सुमित्रानंदन पंत के काव्य संकलन 'कला और बूढ़ा चाँद' से कुछ कविताएं

‘कला और बूढ़ा चाँद’ सुविख्यात कवि सुमित्रानन्दन पंत की साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त काव्यकृति है. इसमें उनकी सन् 1958 में लिखी गई कविताएँ हैं. पंत की जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़ें राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उनके काव्य संकलन 'कला और बूढ़ा चाँद' की कुछ कविताएं

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aajtak.in नई दिल्ली, 20 May 2019
जयंती विशेषः सुमित्रानंदन पंत के काव्य संकलन 'कला और बूढ़ा चाँद' से कुछ कविताएं सुमित्रानन्दन पंत की पुस्तक 'कला और बूढ़ा चाँद' का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत की आज जयंती है. उनका मूल नाम गुसाईं दत्त था. वह  20 मई 1900 को पैदा हुए और 28 दिसंबर, 1977 को उनका प्रयाण हुआ. 1919 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर अपनी शिक्षा अधूरी छोड़ दी और स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय हो गए. बाद में हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी और बंगला का स्वाध्याय किया और खूब पढ़ा व लिखा. वह एक प्रख्यात प्रकृति-प्रेमी थे और बचपन से ही सुन्दर रचनाएँ लिखा करते थे.

उनकी प्रमुख कृतियों में- उच्छ्वास, पल्लव, वीणा, ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, युगांतर, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, सत्यकाम, मुक्ति यज्ञ, तारापथ, मानसी, युगवाणी, उत्तरा, रजतशिखर, शिल्पी, सौवर्ण, अतिमा, युगपथ, पतझड़, अवगुंठित, ज्योत्सना, मेघनाद वध शामिल है. इसके अलावा हरिवंशराय बच्चन के साथ खादी के फूल संयुक्त संग्रह है. उमर ख़ैयाम की रुबाइयों का फारसी से हिंदी अनुवाद मधुज्वाल नाम से प्रकाशित हुआ. 'चिदम्बरा' के लिए वह भारतीय ज्ञानपीठ, 'कला और बूढ़ा चाँद’ के लिए साहित्य अकादमी और 'लोकायतन' के लिए सोवियत नेहरू शांति पुरस्कार से सम्मानित किए गए. हिंदी साहित्य की अनवरत सेवा के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से भी नवाजा था.

आज पंत की जयंती पर साहित्य आजतक पर हम राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उनके काव्य संकलन ‘कला और बूढ़ा चाँद’ से कुछ कविताएं आपके लिए प्रस्तुत कर रहे. इस किताब के बारे में फ्लैप पर लिखा है- ‘कला और बूढ़ा चाँद’ सुविख्यात कवि सुमित्रानन्दन पंत की साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त काव्यकृति है. इसमें उनकी सन् 1958 में लिखी गई कविताएँ हैं. शैली और विषय-वस्तु दोनों ही दृष्टियों में कवि की परवर्ती रचनाओं में इनका विशिष्ट स्थान है. अरविन्द- दर्शन और भारतीय मनोविज्ञान के जो प्रभाव उनकी रचनाओं में कुछ समय से दृष्टिगोचर हो रहे थे, उनका पूर्ण परिपाक प्रस्तुत संग्रह में हुआ है. कवि ने उन तमाम प्रभावों को आत्मसात कर जिस अतींद्रिय भावमंडल का आख्यान यहाँ किया है, वह सर्वथा उसका अपना है, आत्मानुभूत है. चेतन-अवचेतन के स्तरों का भेदन करते हुए अतिचेतन का अवलोकन इन कविताओं की विषय-वस्तु है, जिसे कवि ने दार्शनिक और तात्त्विक प्रतीकों के माध्यम से अभिव्यक्त करने का प्रयत्न किया है."

याद रहे कि मुक्त छंद का प्रयोग पंत जी बहुत प्रारम्भ से ही करते रहे हैं, किन्तु छंद-भंग की वास्तविक स्थिति ‘वाणी’ से प्रारम्भ हुई और उसका पूर्ण विकास ‘कला और बूढ़ा चाँद’ में हुआ है. इन कविताओं में कवि ‘छंदों की पायलें उतार’ देता है, शब्दों को तोड़कर उनमें नई अर्थवत्ता का संचार करता है और इस प्रकार अपनी अभिव्यक्ति के उपकरणों को उसने इतना समर्थ बना लिया है कि उनके द्वारा ‘अविगत गति’ का प्रकाशन किया जा सके. वस्तुतः पंत जी के चेतनाशील काव्य के अध्येताओं के लिए यह एक अपरिहार्य कृति है.

पढ़िए साहित्य आजतक पर ‘कला और बूढ़ा चाँद’ की कुछ कविताएं:

1.
वर्जनाएँ


तुम स्वर्ण हरित अंधकार में
लपेट कर

कई रेंगने वाली
इच्छाएं ले आते हो,
जिन की रीढ़
उठ नहीं सकती !

इनका क्या होगा
मैं नहीं जानता !
पिटारी खोलते ही
टेढ़े मेढ़े साँपों सी
ये
धरती भर में
फैल जाती है !

कौन शक्ति इन्हें बाँधेगी
कौन कला समझाएगा,
कौन शोभा अलंकृत करेगी ?
ये मधु-तिक्त ज्वलित-शीत
वर्जनाएँ हैं !-
जो अब मुक्त हो रही हैं !

तुम्हारी सुनहली अलकों की
ये फूल माल बनेंगी,
इनकी मादन गंध पीकर
मृत्यु जी उठेगी ।

तुम स्वर्ण हरित अंधकार में
लपेट कर
अमृत के स्रोत
ले आये थे,

जो हृदय शिराएँ बन
समस्त अस्तित्व में
नवीन रक्त
संचार कर रही हैं !

2.
विकास


नीली नीहारीकाएँ
शिखरों की हैं,
हरीतिमाएँ
घाटियों की !

जिनके आर पार
रश्मि छाया सेतु बाँध
तुम आती जाती हो !

अंतः सौरभ से खिंच
भौरों की भीड़
तुम्हें घेरे
गूंजती रहती है !

और

ये सदियों के खंडहर हैं !
जहाँ देह मन प्राण
बासी अंधकार की सड़ांध में
दिवांधों-से
औंधे मुंह लटके हैं !

झिल्लियों की सेना
अंतर पुकार को रौंद
चीत्कार भरती हैं ।

एक दिन में
मीनारें मेहराबें
कैसे उग आएँगी ?
कि रश्मि रेखाओं से
दीपित की जा सके !
हैं ऐसे विद्युतदीप
मन का अंधकार
मिटा सके ?

जो विज्ञान,
देह भले ही
वायुयान में उड़े,
मन अभी
ठेले, बैलगाड़ी पर ही
धक्के खाता है !

हाय री, रूढ़िप्रिय
जड़ते,
तेरी पशुओं की सी
साशंक, त्रस्त चितवन देख
दया आती है !

3.
प्रेम


मैंने
गुलाब की
मौन शोभा को देखा !

उससे विनती की
तुम अपनी
अनिमेष सुषमा को
शुभ्र गहराइयों का रहस्य
मेरे मन की आंखों में
खोलो !

मैं अवाक् रह गया !
वह सजीव प्रेम था !

मैंने सूंघा,
वह उन्मुक्त प्रेम था !
मेरा हृदय
असीम माधुर्य से भर गया !

मैंने
गुलाब को
ओंठों से लगाया !
उसका सौकुमार्य
शुभ्र अशरीरी प्रेम था !

मैं गुलाब की
अक्षय शोभा को
निहारता रह गया !

****

पुस्तकः कला और बूढ़ा चाँद
लेखकः  सुमित्रानंदन पन्त
विधा: कविता
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
मूल्यः रुपए 695/-
पृष्ठ संख्याः 208

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