सुमन केसरी के जन्मदिन पर काव्य-संग्रह 'पिरामिडों की तहों में' से चुनी हुई कविताएं

चर्चित कवयित्री, शिक्षाविद, प्रशासनिक सलाहकार व जागरुक आंदोलनकारी सुमन केसरी के जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़ें, उनकी चुनी हुई कविताएं

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Aajtak.inनई दिल्ली, 15 July 2019
सुमन केसरी के जन्मदिन पर काव्य-संग्रह 'पिरामिडों की तहों में' से चुनी हुई कविताएं सुमन केसरी के काव्य-संग्रह 'पिरामिडों की तहों में' का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

चर्चित कवयित्री, शिक्षाविद, प्रशासनिक सलाहकार व जागरुक आंदोलनकारी सुमन केसरी का आज जन्मदिन है. 15 जुलाई, 1958 को बिहार के मुजफ्फरपुर पैदा हुई सुमन केसरी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से सूरदास पर शोघ किया है तथा यूनिवर्सिटी ऑफ़ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया पर्थ से एमबीए किया. वह भारत सरकार के प्रशासन संबंधी और कालांतर में अकादमिक कार्यों से जुड़ी रहीं. उन्होंने 'जेएनयू में नामवर सिंह' नामक पुस्तक का संपादन किया.

'याज्ञवल्क्य से बहस', 'मोनालिसा की आँखे', 'शब्द और सपने' और 'पिरामिडों की तहों में' नामक काव्य संग्रह से उन्होंने साहित्य जगत में खासी पहचान बनाई है. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित 'पिरामिडों की तहों में' नामक काव्य-संग्रह के परिचय में अशोक कुमार पाण्डेय ने लिखा है कि सुमन केशरी का काव्य संसार विस्तृत बेहद है. यह विस्तार क्षैतिज भी है और उर्ध्वाधर भी. वे गम-ए-दौराँ तक भी जाती हैं और ग़म-ए-जाना तक भी. वह भौतिक संसार के चराचर दुखों की शिनाख्त के लिए मिथकों से स्वप्नों तक भटकती हैं, तो आत्मा के आयतन के विस्तार के लिए रोज़-ब-रोज की जद्दोजेहद में भी मुब्तिला होती हैं.

"लगभग तीन दशकों के अपने सक्रिय जीवन में सुमन केसरी ने लगातार अपने समय और समाज की हलचलों को उनकी जटिल बिडम्बनाओं के साथ दर्ज करने का प्रयास तो किया ही है, साथ ही एक स्त्री के लिए, जो साझा और अलग अभिधार्थ हो सकते हैं, उन्हें बहुत स्पष्ट तौर पर अभिलक्षित भी किया हैं.

"पिरामिड की तहों के घुप्प अँधेरों में ‘जहॉ नहीं हैं एक बूँद जल भी तपंण को’ रोशनी के कतरे तलाश कर मनुष्यता के लिए जीवन रस संचित करने की अपनी इस कोशिश में परम्परा के साथ उनका सम्बन्ध द्वंद्वात्मक हैं. एक ओर गहरा अनुराग तो दूसरी ओर एक सतत असंतोष. 'शब्द और सपने’ जैसी कविता में सुमन केशरी की चिंताओं का सबसे सघनित रूप दृष्टिगत होता है. छोटे-छोटे नौ खंडों में बँटी यह लम्बी कविता अपने पूरे वितान में पाठक के मन में भय ही नहीं पैदा करती बल्कि समकालीन वर्तमान का एक ऐसा दृश्य निर्मित करती हैं, जहॉ इसके शिल्प में अंतर्विन्यस्त बेचैनी पाठक की आत्मा तक उतरकर मुक्ति की चाह और उसके लिए मनुष्यता के आखिरी बचे चिन्हों को बचा लेने का अदम्य संकल्प भी भरती है.

"सुमन केसरी के काव्य ज़गत का अभिन्न हिस्सा 'स्त्री' है. ‘माँ की आँखों के जल में तिरने' की कामना के साथ, अपने जीवन में मुक्ति और संघर्ष करती स्वप्नों से यथार्थ के बीच निरन्तर आवाजाही करती ‘किरणों का सिरा थाम लेने’ का स्वप्न देखती वह यह भी जानती है कि 'चोंच के स्पर्श बिना घर नहीं बनता’ और यह भी कि 'औरत ही घर बनाती है/पर जब भी बात होती है घर की/तो वह हमेशा मर्द का ही होता है.'

"इस स्त्री के संवेदना जगत में मनुष्यों के साथ-साथ प्रकृति भी है तो मातृहीन बिलौटे और अजन्मे बच्चे भी. जीवन के हर सफे पर लिखे 'असंभव' से टकराती और ‘घर की तरह घर में रहने' ही नहीं ‘संगीनों के साए तले प्रेम करने की अदम्य जीजिविषा से भरी सुमन केशरी की ये कविताएं समकालीन कविता के रुक्ष वातावरण में मिथक, लोक और स्वप्न का एक भव्य वातायन ही सृजित नहीं करतीं अपितु प्रेम, करूणा और औदार्य के मानवीय जीव्मुल्यों पर आधारित एक समन्वयवादी वितान भी रचती हैं जिसमें भविष्य के स्वप्न देखे जा सकें."

साहित्य आजतक पर सुमन केसरी के जन्मदिन पर पढ़िए 'पिरामिडों की तहों में' नामक उनके काव्य संग्रह से चुनी हुई कविताएं:

1.
ये दिन पिरामिडों की तहों में गुजरते दिन हैं


ये दिन पिरामिडों की तहों में गुजरते दिन हैं
घुप्प अँधेरों में बसी है.
दमघोंटू जहरीली हवा
पत्थर बन गई हड्डियों पर बिछी
भुरभुरी मिट्टी
पाँवों के नीचे साँपिन-सी सरकती है
भय केवल भय

आत्माएँ जाग रही हैं
जीवन के अहसास भर से
वे पहचानती नहीं मुझे
स्तब्ध आत्मग्रस्त संशयी निगाहों से टटोलती हैं
मेरा वजूद
भय केवल भय
यहाँ से वहाँ तक
मैंने भी कहाँ देखा
यूँ आत्माओं को जागते कभी

यह पिरामिडों की मेरी तीसरी यात्रा थी.
तीन बार पुकारने पर प्रेत जागते हैं.
ऐसा ही कहा था गुरु ने
मैंने गुरु को पुकारा तीन तीन बार
आत्माएँ मेरा अनुगमन कर

पुकारने लगीं गुरु को
पिरामिड में गूंज रही थी कातर पुकारें
गुरु कहीं नहीं थे
पुकार अब चिर रुदन में बदल गई थी
गुरु कहीं नहीं थे
और मैं?

2.
कैसे बताए वह?


यदि वह कहता
आसमान से उस रात आग बरसी
तो कोई उस पर विश्वास न करता
क्योंकि
दूर दूर तक उस रात न कहीं बिजली चमकी थी
न कहीं पानी बरसा था
बादल तक नहीं थे उस रात आकाश में
चाँद-तारों भरी वो सुन्दर रात थी
ठीक परियों की कहानियों की तरह...

यदि वह कहता कि डूब गया वह गहरे समंदर में
तो कोई विश्वास न करता उसके कहे पर
क्योंकि वह जीता-जागता खड़ा था
ऐन सामने

यदि वह कहता कि
इतने धमाकों इतनी चीखों से उसके कान के पर्दे फट गए
तो सब हँस पड़ेंगे उस नासमझ पर
कि वह हमारा कहा सब सुन रहा था

हां, बस देखता जाता था बेचैन
कि कैसे बताए वह
उस रात के बारे में

जब उसने अपने ही पड़ोसियों को बाल्टी उठा
पेट्रोल फेंकते देखा था घरों पर

कैसे बताए कि
आया था उड़ता एक गोला और
आग बरसने लगी थी चारों ओर
कैसे बताए उस रात अंधेरे की गोद गरम थी
बावजूद थर-थर कांपते जिस्मों के

कैसे बताए तब से अब तक
कितनी बार धँसा है वो समंदर में
आग बुझाने.
कोई नहीं मानता उसकी बात
कोई नहीं जानता समंदर की थाह.

3.
आत्महत्या


उसने आत्महत्या की थी
इसीलिए
बरी था देश
नेता बरी थे
बरी था बाजार
खरीददार बरी थे
बरी थे माँ-बाप
भले ही कोसा था उन्होंने
उसकी नासमझी को बारम्बार
कि उसने इंजीनियरी छोड़
साहित्य पढ़ा था
सो भी किसी बोली का
इससे तो भला था
कि वह
खेत में हल चलाता
दुकान खोल लेता
या यूँ ही वक्त गंवाता
कम से कम पढ़ाई का खर्च ही बचता
भाग्य को कोस लेते
पर बची तो रहती कुछ इज्जत
न पढ़ने से कुछ तो हासिल होता

बरी थी प्रेमिका
हार कर जिसने
माँ- बाप का कहा माना था
भाई बरी था
बावजूद इसके कि फटकारा था
बच्चों को उससे बात करने पर
बरजा था पत्नी को
नाश्ता-खाना पूछने पर
बहन बरी थी
उसने न जाने कितने बरसों से राखी तक न भेजी थी उसे

बरी थे दोस्त
परिचित बरी थे
आखिर कब तक समझाते
उस नासमझ को
कि न कुछ से भला है
किसी होटल में दरबान हो जाना
या फिर सिक्योरिटी गार्ड की
वर्दी पहन लेना
आखिर न इंजीनियरी पढ़ा था वो
न ही मैनेजमेंट
भला तो यह भी था कि
किस्से-कहानी सुना
या यूँ ही कुछ गाने बजा
भीख ही माँग लेता
कुछ तो पेट भरता

तो
आखिर पुलिस ने मान लिया
कि आत्महत्या हुई
उन्हीं किताबों के चलते
जिनमें कल्पनाएँ थीं और थे सपने
डरावनी आशंकाएँ थीं
भ्रम थे अपने
सो उसकी लाश के साथ किताबें भी जला दी गई

अब घर
सपनों अपनों और कल्पनाओं से मुक्त था
अपने में मगन
जमीन में पैबस्त...!

4.
लड़कियाँ


लड़कियाँ जिद नहीं करतीं चन्द खिलौने की
वे चन्दा को आरे- पारे नदिया किनारे बुलाने की भी जिद नहीं करतीं
कभी नहीं माँगतीं सोने के कटोरे में दूध-भात
वे तो भैया-बाबू की थाली की जूठन से चुपचाप पेट भरती हैं

लड़कियाँ जन्मते ही जान लेती हैं
गूलर के फूल नहीं होते
वे जानती हैं लड़कियाँ पेड़ पर नहीं चढ़तीं
डाल पकड़ नहीं लटकती
वे तो नीचे गिरे फलों से पतिंगे निकाल
इधर-उधर देख
धीरे से
एक साफ टुकड़ा मुँह में धर लेती हैं
चुभलाती हैं उसे डरते-डरते
उबकाई पर काबू करते

लड़कियाँ जानती हैं
उनकी किताब के हर पन्ने पर
एक ही शब्द लिखा है-
असंभव

कैसा कलयुग आया है आज
कि इस लड़की को तो देखो-

गूलर के फूल माँग रही है!
***
पुस्तकः पिरामिडों की तहों में
रचनाकारः सुमन केसरी
विधाः कविता
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
मूल्यः 395/ रुपए
पृष्ठ संख्याः 111

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