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जयंती विशेषः श्रीकांत वर्मा की शहरों पर लिखीं श्रेष्ठ कविताएं

श्रीकांत वर्मा की जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़िए देश और दुनिया की प्राचीनतम परंपराओं, ऐतिहासिक नगरों, उनके नायकों और जीवनशैली पर लिखी उनकी ये चुनिंदा अप्रतिम कविताएं

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 18 September 2019
जयंती विशेषः श्रीकांत वर्मा की शहरों पर लिखीं श्रेष्ठ कविताएं सौजन्यः GettyImages [इनसेट में श्रीकांत वर्मा]

श्रीकांत वर्मा, लेखक, पत्रकार और कवि. जन्म 18 सितंबर, 1931 को मध्य प्रदेश के बिलासपुर में हुआ. साल 1956 में नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया और संपादन से जुड़ गए. इसके बाद भविष्य की खोज में दिल्ली क्या आए उनकी दृष्टि ही बदल गई. कई पत्र- पत्रिकाओं से जुड़े, पत्रकारिता, साहित्य के अलावा राजनीति में भी सक्रिय हुए. डॉक्टर राममनोहर लोहिया के समाजवाद व इंदिरा गांधी की कांग्रेसी राजनीति को न केवल नजदीक से देखा बल्कि सक्रिय भागीदारी भी की. न केवल राज्यसभा के सदस्य बने बल्कि कांग्रेस के प्रधान महासचिव और प्रवक्ता भी रहे. फरवरी 86 में कैंसर के इलाज के लिए अमेरिका गए और वहीं 25 मई, 1986 को उनका निधन हुआ.

लेखन के लिए 'उत्सव-73', तुलसी सम्मान, शिखर सम्मान, कुमार आशान, यूनाइटेड नेशंस इंडियन कौंसिल आफ यूथ एवार्ड, नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार और इंदिरा प्रियदर्शिनी सम्मान से नवाजे गए. आधुनिक हिंदी कविता के क्षेत्र में श्रीकांत वर्मा ने एक अलग मुकाम हासिल किया. वह एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने शहरों के अतीत से उनके वर्तमान को जोड़ एक बेहद चुटीली शैली विकसित की. सियासत और समाज से उनका मोह टूट चुका था, जिसकी पीड़ा उनके आखिरी काव्य-संग्रह 'मगध' की कविताओं में साफ झलकती है. इस संकलन की प्रकाशकीय टिप्पणी कुछ यों थी.

यह सच है कि मगध की कविताएं इतिहास नहीं हैं मगर इसमें इतिहास के सम्मोहन और उसके भाषालोक की अद्भुत छटा है. ध्वस्त नगर एवं गणराज्य अतीत की कहानियां लिए हमारी स्मृतियों में कौंध जाते हैं अपने नायक और नायिकाओं के साथ! श्रीकांत वर्मा की लेखनी का ऐसा चमत्कार ‘मगध’ में उभरता है कि ‘मगध’, ‘अवन्ती’, ‘कोशल’, ‘काशी’, ‘श्रावस्ती’, ‘चम्पा’, ‘मिथिला’ ‘कोसाम्बी’...मानो धूल में आकार लेते हैं और धूल में ही निराकार हो जाते हैं. कहते हैं कि मनुष्य की समग्र गाथा में महाकाव्य होता है. ‘मगध’ की कविताएं उसी समग्रता और उसी महाकाव्य को प्रस्तुत करने का एक उपक्रम हैं.

सच यही है कि श्रीकांत वर्मा की कविताएं काल की एक झांकी के साथ ही महाकाल की स्तुति भी हैं. ये कविताएं अतीत का स्मरण हैं, वर्तमान से मुठभेड़ और भविष्य की झलक भी. तो साहित्य आजतक पर पढ़िए श्रीकांत वर्मा की जयंती पर देश और दुनिया की प्राचीनतम परंपराओं, ऐतिहासिक नगरों, उनके नायकों और जीवनशैली पर लिखी उनकी ये चुनिंदा अप्रतिम कविताएं-

1.
काशी में शव


तुमने देखी है काशी?
जहाँ, जिस रास्ते
जाता है शव -
उसी रास्ते
आता है शव!

शवों का क्या
शव आएँगे,
शव जाएँगे -

पूछो तो, किसका है यह शव?
रोहिताश्व का?
नहीं, नहीं,
हर शव रोहिताश्व नहीं हो सकता

जो होगा
दूर से पहचाना जाएगा
दूर से नहीं, तो
पास से -
और अगर पास से भी नहीं,
तो वह
रोहिताश्व नहीं हो सकता
और अगर हो भी तो
क्या फर्क पड़ेगा?

मित्रो,
तुमने तो देखी है काशी,
जहाँ, जिस रास्ते
जाता है शव
उसी रास्ते
आता है शव!
तुमने सिर्फ यही तो किया
रास्ता दिया
और पूछा -
किसका है यह शव?

जिस किसी का था,
और किसका नहीं था,
कोई फर्क पड़ा ?

2.
हस्तिनापुर का रिवाज


मैं फिर कहता हूँ
धर्म नहीं रहेगा, तो कुछ नहीं रहेगा -
मगर मेरी
कोई नहीं सुनता!
हस्तिनापुर में सुनने का रिवाज नहीं -

जो सुनते हैं
बहरे हैं या
अनसुनी करने के लिए
नियुक्त किए गए हैं

मैं फिर कहता हूँ
धर्म नहीं रहेगा, तो कुछ नहीं रहेगा -
मगर मेरी
कोई नहीं सुनता
तब सुनो या मत सुनो
हस्तिनापुर के निवासियो! होशियार!
हस्तिनापुर में
तुम्हारा एक शत्रु पल रहा है, विचार -
और याद रखो
आजकल महामारी की तरह फैल जाता है
विचार।

3.
कोसल में विचारों की कमी है


महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो!
युद्ध नहीं हुआ-
लौट गये शत्रु ।

वैसे हमारी तैयारी पूरी थी !
चार अक्षौहिणी थीं सेनाएं
दस सहस्र अश्व
लगभग इतने ही हाथी ।

कोई कसर न थी ।
युद्ध होता भी तो
नतीजा यही होता ।

न उनके पास अस्त्र थे
न अश्व
न हाथी
युद्ध हो भी कैसे सकता था !
निहत्थे थे वे ।

उनमें से हरेक अकेला था
और हरेक यह कहता था
प्रत्येक अकेला होता है !
जो भी हो
जय यह आपकी है ।
बधाई हो !

राजसूय पूरा हुआ
आप चक्रवर्ती हुए-

वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं
जैसे कि यह-
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है ।

4.
मगध


सुनो भई घुड़सवार, मगध किधर है
मगध से
आया हूँ
मगध
मुझे जाना है

किधर मुड़ूँ
उत्तर के दक्षिण
या पूर्व के पश्चिम
में?

लो, वह दिखाई पड़ा मगध,
लो, वह अदृश्य -

कल ही तो मगध मैंने
छोड़ा था
कल ही तो कहा था
मगधवासियों ने
मगध मत छोड़ो
मैंने दिया था वचन -
सूर्योदय के पहले
लौट आऊँगा

न मगध है, न मगध
तुम भी तो मगध को ढूँढ़ रहे हो
बंधुओ,
यह वह मगध नहीं
तुमने जिसे पढ़ा है
किताबों में,
यह वह मगध है
जिसे तुम
मेरी तरह गँवा
चुके हो।

5.
ट्राय का घोड़ा


पहला बड़ी तेज़ी से गुज़रता है,
दूसरा बगटूट भागता है--
उसे दम मारने की
फुर्सत नहीं,
तीसरा बिजली की तरह गुज़र जाता है,
चौथा
सुपरसौनिक स्पीड से !

कहाँ जा रहे हैं, वे ?
क्यों भाग रहे हैं ?
क्या कोई उनका पीछा कर रहा है ?
क्या उनकी ट्रेन छूट रही है ?
मैं अपने बगल के व्यक्ति से पूछता हूँ !

'कहीं नहीं जा रहे हैं, वे',
मेरे पास खड़ा व्यक्ति कहता है,
'वे भाग भी नहीं रहे हैं,
कोई उनका पीछा नहीं कर रहा है
उनकी ट्रेन बहुत पहले छूट चुकी है।'

'फिर वे क्यों इस तरह गुज़र रहे हैं ?'
'क्योंकि उन्हे इसी तरह गुज़रना है !'
'कौन हैं, वे ?'
'घोड़े हैं !'
'घोड़े ?'

'हाँ, वे घुड़दौड़ में शामिल हैं ।
पहला दस हजार वर्षों में
यहाँ तक पहुँचा है ।
दूसरा
एथेंस से चला था,
उसे वॉल स्ट्रीट तक पहुँचना है ।
तीसरा
नेपोलियन का घोड़ा है,
एल्प्स पर चढ़ता, फिर
एल्प्स से उतरता है ।
चौथा बाज़ारू है, जो भी चाहे,
उस पर दाँव लगा सकता है ।'

यह कहकर मेरे पास खड़ा व्यक्ति
घोड़ की तरह हिनहिनाता है,
अपने दो हाथों को
अगले दो पैरों की तरह उठा
हवा में थिरकता
फिर सड़क पर सरपट भागता है ।

चकित में दूसरे व्यक्ति से कहता हूँ,
'पागल है !'
'नहीं, वह घोड़ा है।' तमाशबीन कहता है ।
'वह कहाँ जा रहा है ?'
'उसे पता नहीं'
'वह क्यों भाग रहा है ?'
'उसे पता नहीं'
वह क्या चाहता है ?'
'उसे पता नहीं' ।

इतना कह हमसफ़र
अपने थैले से ज़ीन निकाल
मेरी पीठ पर कसता है !
चीखता हूँ मैं,
जूझता हूँ मैं,
गुत्थम गुत्थ, हाँफता हूँ मैं !

मेरी पीठ पर बैठा सवार
हवा में चाबुक उछाल, मुझसे कहता है--
'इसके पहले कि तुम्हें
शामिल कर दिया जाय दौड़ में,
मैं चाहता हूँ,
तुम ख़ुद से पूछो, तुम कौन हो ?'
'मैं दावे से कह सकता हूँ, मनुष्य हूँ ।'
'नहीं, तुम काठ हो !
तुम्हारे अंदर दस हज़ार घोड़े हैं,
सौ हजार सैनिक हैं,
तुम छद्म हो ।

जितनी बार पैदा हुए हो तुम,
उतनी बार मारे गये हो !
तुम अमर नहीं,
इच्छा अमर है, संक्रामक है ।
बोलो, क्या चाहते हो ?' मुझसे
पूछता है, सवार ।

अपने दो हाथों को अगले दो पैरों की तरह
उठा,
पूँछ का गुच्छा हिलाता,
कहे जाता हूँ मै,
'मैं दस हजार वर्षों तक चलना
चाहता हूँ,
मैं एथेंस से चलकर
वॉल स्ट्रीट तक पहुँचना चाहता हूँ,
मैं एल्प्स पर चढ़ना
फिर एल्प्स से उतरना चाहता हूँ,
मैं, जो चाहे, उसके,
दाँव पर लगना चाहता हूँ।'

उमंग में भरा हूआ मैं, यह भी नहीं पूछता,
अगला पड़ाव
कितनी दूर है ?
हैं भी, या नहीं हैं ?

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