तो नेहरू के लिए लिखा था गीतकार शैलेंद्र ने, तुम्हारी मुस्कुराहट के असंख्य गुलाब

फिल्मों के लिए लिखकर और कई बार फिल्म फेयर अवार्ड पाकर भी गीतकार शैलेंद्र का दिल हमेशा हिंदी साहित्य और कविता की ओर लगा रहा.  उन की जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनकी दो चुनी हुईं कविताएं. जिनमें से एक उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए लिखी थी.

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aajtak.in नई दिल्ली, 30 August 2019
तो नेहरू के लिए लिखा था गीतकार शैलेंद्र ने, तुम्हारी मुस्कुराहट के असंख्य गुलाब शैलेंद्र (इनसेट में) व नेहरू का चित्र Art by Neha [स्रोतः Artists' Forum NITK]

गीतकार शैलेंद्र के फिल्मी गानों का क्या कहना. एक से बढ़कर एक गीत. पर हिंदी साहित्य में उनको वह मुकाम क्यों नहीं मिला जिसके वे हकदार थे? शायद शैलेंद्र इसे जानते थे, इसीलिए वह शुरू में फिल्मों में नहीं लिखना चाहते थे. आज यह लगता है कि अगर शैलेंद्र ने फिल्मों के लिए गीत न लिखे होते, तो हमारा संगीत जगत कितने समुधुर गीतों से वंचित रह जाता. शंकरदास केसरीलाल उनका मूल नाम था.

शैलेन्द्र ने 18 जनवरी, 1957 को अपने मित्र विश्वेश्वर को लिखे एक ख़त में अपना आत्मपरिचय यों लिखा था. 30 अगस्त, 1923 में रावलपिंडी में पैदा हुआ. पिताजी फ़ौज में थे. रहने वाले हैं बिहार के. पिता के रिटायर होने पर मथुरा में रहे, वहीं शिक्षा पायी. हमारे घर में भी उर्दू और फ़ारसी का रिवाज था लेकिन मेरी रुचि घर से कुछ भिन्न ही रही. हाईस्कूल से ही राष्ट्रीय ख़याल थे. सन 1942 में बंबई रेलवे में इंजीनियरिंग सीखने आया. अगस्त आंदोलन में जेल गया. कविता का शौक़ बना रहा.

अगस्त सन् 1947 में श्री राज कपूर एक कवि सम्मेलन में मुझे पढ़ते देखकर प्रभावित हुए. मुझे फ़िल्म 'आग' में लिखने के लिए कहा, किन्तु मुझे फ़िल्मी लोगों से घृणा थी. सन् 1948 में शादी के बाद कम आमदनी से घर चलाना मुश्किल हो गया. इसलिए श्री राज कपूर के पास गया. उन्होंने तुरन्त अपने चित्र 'बरसात' में लिखने का अवसर दिया. गीत चले, फिर क्या था, तबसे अभी तक आप लोगों की कृपा से बराबर व्यस्त हूँ. मेरा विचार है कि इससे ज़्यादा लिखूँ तो परिचय संक्षिप्त न रहकर दीर्घ हो जायेगा.

जाहिर है, फिल्मों के लिए लिखकर और कई बार फिल्म फेयर अवार्ड पाकर भी शैलेंद्र का दिल हमेशा हिंदी साहित्य और कविता की ओर लगा रहा. तो शैलेंद्र की जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनकी दो चुनी हुईं कविताएं. जिनमें से एक उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए लिखी थी.  

कविताः

1.
तुम्हारी मुस्कुराहट के असंख्य गुलाब

महामानव
मेरे देश की धरती पर
तुम लम्बे और मज़बूत डग भरते हुए आए
और अचानक चले भी गए !

लगभग एक सदी पलक मारते गुज़र गई
जिधर से भी तुम गुज़रे
अपनी मुस्कुराहट के असंख्य गुलाब खिला गए,
जिनकी भीनी सुगन्ध
हमेशा के लिए वातावरण में बिखर गई है !

तुम्हारी मुस्कान के ये अनगिनत फूल
कभी नहीं मुरझाएँगे !
कभी नहीं सूखेंगे !

जिधर से भी तुम गुज़रे
अपने दोनों हाथों से लुटाते चले गए
वह प्यार,
जो प्यार से अधिक पवित्र है !
वह ममता,
जो माँ की ममता से अधिक आर्द्र है !
वह सहानुभूति,
जो तमाम समुद्रों की गहराइयों से अधिक गहरी है !
वह समझ,
जिसने बुद्धि को अन्तरिक्ष पार करने वाली
नई सीमाएँ दी हैं !

अच्छाई और बुराई से बहुत ऊपर
तुम्हारे हृदय ने पात्र-कुपात्र नहीं देखा
पर इतना कुछ दिया है इस दुनिया को
कि सदियाँ बीत जाएँगी
इसका हिसाब लगाने में !
इसका लेखा-जोखा करने में !

तुमने अपने आपको साधारण इनसान से
ऊपर या अधिक कभी नहीं माना ।
पर यह किसे नहीं मालूम
कि तुम्हारे सामने
देवताओं की महानता भी शरमाती है !
और अत्यन्त आदर से सर झुकाती है !

आनेवाली पीढ़ियाँ
जब गर्व से दोहराएँगी कि हम इनसान हैं
तो उन्हें उँगलियों पर गिने जाने वाले
वे थोड़े से नाम याद आएँगे
जिनमें तुम्हारा नाम बोलते हुए अक्षरों में
लिखा हुआ है !

पूज्य पिता,
सहृदय भाई,
विश्वस्त साथी, प्यारे जवाहर,
तुम उनमें से हो
जिनकी बदौलत
इनसानियत अब तक साँस ले रही है !
- 1964

2.
पूछ रहे हो क्या अभाव है


पूछ रहे हो क्या अभाव है
तन है केवल प्राण कहाँ है ?

डूबा-डूबा सा अन्तर है
यह बिखरी-सी भाव लहर है ,
अस्फुट मेरे स्वर हैं लेकिन
मेरे जीवन के गान कहाँ हैं ?

मेरी अभिलाषाएँ अनगिन
पूरी होंगी ? यही है कठिन
जो ख़ुद ही पूरी हो जाएँ
ऐसे ये अरमान कहाँ हैं ?

लाख परायों से परिचित है
मेल-मोहब्बत का अभिनय है,
जिनके बिन जग सूना सूना
मन के वे मेहमान कहाँ हैं ?

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