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कोरोना का भय व शहरी हृदयहीनता पर संजय कुंदन की कविताः जा रहे हम

मानव सरोकारों के कवि संजय कुंदन ने कोरोना के भय से शहरों से पलायन कर रहे कामगार लोगों की पीड़ा को अपनी कविता 'जा रहे हम' में अभिव्यक्ति दी.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 30 March 2020
कोरोना का भय व शहरी हृदयहीनता पर संजय कुंदन की कविताः जा रहे हम प्रतीकात्मक इमेज

हमारे नीति-निर्माता जब भी कोई फैसला ले रहे होते हैं तो उनके सामने सिर्फ शहरी उच्च और मध्यम वर्ग होता है. उन्होंने सोच लिया कि लॉकडाउन करना कौन मुश्किल काम है. सारी कॉलोनियों, सोसाइटियों के गेट बंद कर दिए जाएंगे. लोग इंटरनेट पर घर में बैठकर काम करेंगे और जरूरी सामान आनलाइन मंगवा लेंगे, और कोरोना के खिलाफ सामाजिक अलगाव का अभियान पूरा हो जाएगा. पर हमारे शासक-प्रशासक भूल जाते हैं कि आज भी देश के एक बड़े हिस्से के पास घर नाम की चीज ही नहीं है. जमीन ही उनका बिछावन है और आकाश ही उनकी छत. फिर यह देश तो आंतरिक विस्थापितों का है. लाखों लोग रोजी-रोटी और शिक्षा के लिए अपना घर-बार छोड़ कहीं और रहते हैं.

एक अजनबी शहर में अचानक रोजी-रोटी की आस खत्म हो जाए और उनकी मौजूदगी को शक की नजर से देखा जाए तो उनके पास अपना घर लौटने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता. सरकार के पास पर्याप्त समय था, वह इन सब पर होमवर्क कर सकती थी, उसी समय से, जब केरल में कुछ केस आए थे. प्रगतिशील और मानव सरोकारों के कवि संजय कुंदन ने कोरोना के भय से भारी संख्या में शहरों से पलायन कर रहे गांव की तरफ लौट रहे लोगों की पीड़ा को अपनी इस कविता 'जा रहे हम' में अभिव्यक्ति दी.

जा रहे हम


जैसे आए थे वैसे ही जा रहे हम

यही दो-चार पोटलियां साथ थीं तब भी
आज भी हैं
और यह देह
लेकिन अब आत्मा पर खरोंचें कितनी बढ़ गई हैं
कौन देखता है

कोई रोकता तो रुक भी जाते
बस दिखलाता आंख में थोड़ा पानी
इतना ही कहता
- यह शहर तुम्हारा भी तो है

उन्होंने देखा भी नहीं पलटकर
जिनके घरों की दीवारें हमने चमकाईं
उन्होंने भी कुछ नहीं कहा
जिनकी चूड़ियां हमने 1300 डिग्री तापमान में
कांच पिघलाकर बनाईं

किसी ने नहीं देखा कि एक ब्रश, एक पेचकस,
एक रिंच और हथौड़े के पीछे एक हाथ भी है
जिसमें खून दौड़ता है
जिसे किसी और हाथ की ऊष्मा चाहिए

हम जा रहे हैं
हो सकता है
कुछ देर बाद
हमारे पैर लड़खड़ा जाएं
हम गिर जाएं
खून की उल्टियां करते हुए

हो सकता है हम न पहुंच पाएं
वैसे भी आज तक हम पहुंचे कहां हैं
हमें कहीं पहुंचने भी कहां दिया जाता है

हम किताबों तक पहुंचते-पहुंचते रह गए
न्याय की सीढ़ियों से पहले ही रोक दिए गए
नहीं पहुंच पाईं हमारी अर्जियां कहीं भी
हम अन्याय का घूंट पीते रह गए

जा रहे हम
यह सोचकर कि हमारा एक घर था कभी
अब वह न भी हो
तब भी उसी दिशा में जा रहे हम
कुछ तो कहीं बचा होगा उस ओर
जो अपना जैसा लगेगा. -संजय कुंदन

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