Sahitya AajTak

जन्मदिन विशेषः बाबुषा कोहली की 5 कविताएं; जितना दिखता है खिड़की से...

बाबुषा कोहली को साल 2014 में जब भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन सम्मान मिला तो उनके शब्द थे... मेरी कविताओं में महिलाएं मुक्ति के विमर्श नहीं करतीं... बल्कि मुक्त जीवन जीती हैं और खुली हवा में सांस लेती है.

Advertisement
जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 06 February 2019
जन्मदिन विशेषः बाबुषा कोहली की 5 कविताएं; जितना दिखता है खिड़की से... बाबुषा कोहली

बाबुषा कोहली को साल 2014 में जब भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन सम्मान मिला तो उनके शब्द थे, मेरी कविताओं में महिलाएं मुक्ति के विमर्श नहीं करतीं, बल्कि मुक्त जीवन जीती हैं और खुली हवा में सांस लेती है. अपनी अलहदा कविता शैली के बारे में उनका कहना था कि उनकी कई कविताओं में सूफियाना सलीका चुपचाप चला आता है. यह उन्हें अपने परिवार से मिला है. घर में शास्त्रीय संगीत, गजलें, सूफी संगीत का माहौल रहा. सूफी संगीत उन्हें एक अलग दुनिया में ले जाता रहा, इसीलिए उनकी कविताओं में भी यह दिखता है.

बाबुषा कोहली के जन्मदिन पर 'साहित्य आजतक' के पाठकों और उनके प्रशंसकों के लिए उनकी 5 कविताएं:

1.फिर कृष्ण ने कहा...

कि मुझसे मिलना हो तो

मेरे चमत्कारों के पार मिलना

मुझ तक पहुँचने की राहें

सन्नाटों से रौशन हैं.

2. बुद्ध की चाह में

मैं एक प्याला हूँ चाह से भरा

छलकती है चाह

फ़र्श पर चिपचिपाती है

भिन-भिन करते हैं मक्खियों जैसे दुःख

आते हैं पीछे बुद्ध

मारते हैं पोंछा

कितने तो गहरे धब्बे कि छूटते नहीं

3.सुकरात को याद करते हुए

जिस दिन

वो दुनियावी ऐनक

टूट गई थी

तुम सब ने मिलकर

मेरी आँखें फोड़ दी थीं

बस !

उस दिन से ही भीतर

एक ढिबरी जलती है ।

4.प्यार

कि जैसे स्लेट पर लिखना

और हिज्जे ग़लत होने के डर से मिटा देना बार-बार

कि जैसे निकलना घर से

और चौराहे से लौट आना भूला हुआ बटुआ लेने

कि जैसे वक़्त पर स्टेशन पहुँचने की कोशिश करना

और छूट जाना ट्रेन का

प्यार उच्चारित करने के ठीक पहले छींक आ जाना

या काली बिल्ली का रास्ता काट जाना

बस ! आधा 'प' कहने में यार की ज़ुबान लड़खड़ा गई

5. स्वप्न में सुगंध

जितना दिखता है खिड़की से

उतना ही तो नहीं होता आकाश का क्षेत्रफल

उस अकड़े हुए पेड़ का नाम

अहं है शायद

जिसकी लकड़ियों से

बनती हैं छोटी-छोटी खिड़कियाँ

फैली हथेली पर आकाश बरस पड़ता है

उँगलियों के बीच से रिसता हुआ

टप ... टप ... टप

अपरिमित के बीज से उगता हुआ

चेतना का निरन्वय फूल

फैलती हथेली

फैलता आकाश

और फैलती है पृथ्वी पर

बुद्ध की सुगंध

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
पाएं आजतक की ताज़ा खबरें! news लिखकर 52424 पर SMS करें. एयरटेल, वोडाफ़ोन और आइडिया यूज़र्स. शर्तें लागू
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay