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पुण्यतिथि विशेषः निदा फ़ाज़ली की वे ग़ज़लें, जो आज भी मौजूं हैं

साहित्य आजतक के पाठकों के लिए निदा फ़ाज़ली की 5 चुनिंदा ग़ज़लें, जो हमेशा मौजूं रहेंगी. जिन्हें समय और सदियां दोनों के लिए भुलाना मुमकिन नहीं.  

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 08 February 2019
पुण्यतिथि विशेषः निदा फ़ाज़ली की वे ग़ज़लें, जो आज भी मौजूं हैं निदा फ़ाज़ली

हमारे दौर के उम्दा शायरों में शुमार निदा फ़ाज़ली की आज पुण्यतिथि है. साहित्य आजतक के पाठकों के लिए उनकी 5 चुनिंदा ग़ज़लें, जो हमेशा मौजूं रहेंगी. जिन्हें समय और सदियां दोनों के लिए भुलाना मुमकिन नहीं.

ग़ज़ल

1.

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है

अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिटी का सफ़र सदियों से

किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब

सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं

हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार

अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं

गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम

हर क़लमकार की बे-नाम ख़बर के हम हैं

***

2.

उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा

वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा

इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे

रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा

प्यास जिस नहर से टकराई वो बंजर निकली

जिस को पीछे कहीं छोड़ आए वो दरिया होगा

मिरे बारे में कोई राय तो होगी उस की

उस ने मुझ को भी कभी तोड़ के देखा होगा

एक महफ़िल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक

जिस को भी पास से देखोगे अकेला होगा

***

3.

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो

जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें

छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं

ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता

चराग़ जलते हैं बीनाई बुझने लगती है

ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

***

4.

अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए

घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए

जिन चराग़ों को हवाओं का कोई ख़ौफ़ नहीं

उन चराग़ों को हवाओं से बचाया जाए

ख़ुद-कुशी करने की हिम्मत नहीं होती सब में

और कुछ दिन अभी औरों को सताया जाए

बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं

किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए

क्या हुआ शहर को कुछ भी तो दिखाई दे कहीं

यूँ किया जाए कभी ख़ुद को रुलाया जाए

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए

***

5.

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है

मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है

अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम

हर वक़्त का रोना तो बे-कार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने

किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है

हर गाम पे पहरा है फिर भी इसे खोना है

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं

फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

आवारा-मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को

आकाश की चादर है धरती का बिछौना है  (स्रोतः रेख़्ता)

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