राजकमल चौधरी की पुण्यतिथि पर देवशंकर नवीन द्वारा संपादित रचनावली से पांच श्रेष्ठ कविताएं

राजकमल चौधरी की इन कविताओं से गुजरते हुए निस्संदेह पाठक, मनुष्य और उसकी पृथ्वी से जुड़े उन तमाम प्रश्नों से टकराएँगे जो आज भी हल नहीं किए जा सके हैं-

Advertisement
aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 19 June 2019
राजकमल चौधरी की पुण्यतिथि पर देवशंकर नवीन द्वारा संपादित रचनावली से पांच श्रेष्ठ कविताएं देवशंकर नवीन द्वारा संपादित राजकमल चौधरी रचनावली का कवर [ सौजन्यः राजकमल प्रकाशन ]

अकविता के प्रमुख कवि राजकमल चौधरी के लिए कविता अपने विकट समय में जीवन और उसकी जमीन के लिए अभिव्यक्ति का हथियार थी. डॉ देवशंकर नवीन ने बड़े श्रम और वर्षों की मेहनत से आठ खंडों में 'राजकमल चौधरी रचनावली' तैयार की. इस रचनावली के परिचय में लिखा है कि राजकमल चौधरी का रचना-संसार स्वातंत्रयोत्तर भारत के प्रारंभिक दो दशकों के बौद्धिक पाखंड, आर्थिक बदहाली, राजनीतिक दुर्व्यवस्था, सामाजिक धूर्तता, मानव-मूल्य और नीति-मूल्य के ह्रास, रोटी-सेक्स-सुरक्षा के इंतजामों में सारी नैतिकताओं से विमुख बुद्धिजीवियों के आचरण, खंडित अस्तित्व और भग्नमुख आजादी की चादर ओढ़े समाज की तमाम बदसूरती, और उन बदसूरतियों के कारणों का दस्तावेज है! इस दस्तावेज में वह चाहे कविता, कहानी, उपन्यास हो, या निबंध, आलोचना, डायरी उनमें समाज की विकृति का वास्तविक चित्र अंकित हुआ, भयावह यथार्थ का क्रूरतम चेहरा सामने आया, जो आज तक बना हुआ है!

राजकमल चौधरी के रचना-संसार में भाषा, संस्कृति, समाज से निरपेक्ष गिनती के लोग अपना ऐश्वर्य बनाने में जीवन-संग्राम के सिपाहियों के हिस्से की ध्वनि, धूप, पवन, प्रकाश पर काबिज होते जा रहे हैं! गगनचुम्बी अहंकार और तानाशाही वृत्ति से आम नागरिक की शील-सभ्यता के हरे-भरे खेत को कुचल रहे हैं! भाव और भाषा की तमीज से बेफिक्र लोग अर्थ-तंत्र और देह-तंत्र की कुटिल वृति में व्यस्त हैं! सत्ताधारियों की राजनीतिक करतूतों को देखते हुए कहा जा सकता है कि मात्र पन्द्रह वर्ष के अपने गंभीर रचनाकाल में राजकमल चौधरी ने साढ़े तीन हजार पृष्ठों की अपनी श्रेष्ठ रचनाओं में शायद भावी भारत की पूर्वघोषणा ही कर दी थी!

आज राजकमल चौधरी की पुण्यतिथि पर साहित्य आजतक पर पढ़िए देवशंकर नवीन द्वारा संपादित राजकमल चौधरी रचनावली में संकलित कुछ कविताएं. राजकमल चौधरी की इन कविताओं से गुजरते हुए निस्संदेह पाठक, मनुष्य और उसकी पृथ्वी से जुड़े उन तमाम प्रश्नों से टकराएँगे जो आज भी हल नहीं किए जा सके हैं-

1.
दीवार घड़ी के बारे में


इस दीवार घड़ी से मत पूछिए कि
समय की क्या कीमत होगी
क्योंकि कीमत नहीं है

पाँच बजे शाम के बाद ट्राम-बस
टैक्सियों की
भीड़ में आदमी कहाँ होगा

आदमी कब कील की तरह चौरंगी डल-
हौजी के जूतों से बाहर निकला हुआ
अपने ही पाँव में चुभने लगेगा

यह दीवार घड़ी है चौबीस घंटे में केवल
दो बार
बजती है
दस दफा पाँच दफा महायुद्ध
शुरू करने के लिए बजती है
दीवार घड़ी कीमत नहीं बताएगी
चावल की नहीं, और वक़्त की नहीं और
अमेरिकी गेहूं की भी नहीं बताएगी
कीमत
क्योंकि कीमतों का ग्राफ महात्मा गांधी से
शुरू होकर इंदिरा गांधी पर
खत्म हो जाता है हर दफा
इतिहास की किताबों में
योजना-दफ्तर के आंकड़ों में और
अफवाहें बम जीवन बीमा पॉलिसी
एक साथ गढ़ने वाले कारखानों में
मूल्य नहीं रह गए हैं अब किसी वस्तु में
अब केवल यह समय रह गया है
केवल

यह दीवार घड़ी रह गई है दस और
पाँच का समय
बताने के लिए

2.
एक आदत : प्यार


पहली बार हम उसके कमरे में आते हैं.
बेहद शर्मिन्दा-
उसे देख नहीं पाते
उसकी आँखों में खुद को तो और भी नहीं.

इसके बाद,
हर कमरा हर बार हमारे लिए
बेशर्मी का इजहार बन जाता है...

हम वहशत में भीतर घुसते हैं
तोड़ डालते हैं फूलदान
उसकी किताबें चुरा लेते हैं, और
वह शर्म से झुकी हुई.

3.
अकाल का पहला दिन


जब पूरा का पूरा यह शहर

मुजफ्फरपुर
खारे पानी में डूब गया
औरत वह बेमिसाल
मीराजी की गजल में शीशे के बिखरे हुए-
टुकड़ों पर टूटती-बिखरती रह गई
बेनहाई हुई, बगैर सँवारे बाल...

उसके चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं,

हरे, पीले, नीले, सफेद साँप रेंगते हैं
उसके होंठों में शब्द नहीं

शब्द नहीं
मुड़े हुए घुटनों के ऊपर
अँधेरी झाड़ियों में
सिर्फ एक अक्षर
होता है बीज-मंत्र
स्त्री स्त्री स्त्री
स्त्री स्त्री
और
कुछ नहीं होता है अकाल...केवल यही...कि...
पूरा का पूरा यह शहर खारे पानी में डूब जाता है
उस एक बेनजीर औरत के मातम में,
हम एक नया मर्सिया क्यों नहीं लिखें ?

4.
नींद में भटकता हुआ आदमी


नींद की एकान्त सड़कों पर भागते हुए आवारा सपने.
सेकेंड-शो से लौटती हुई बीमार टैक्सियां,
भोजपुरी छुरी जैसी चीखें
बेहोश औरत की ठहरी हुई आँखों की तरह रात.
बिजली के लगातार खम्भे पीछा करते हैं;
साए बहुत दूर छूट जाते हैं
साए टूट जाते हैं.

मैं अकेला हूँ.
मैं टैक्सियों में अकारण खिलखिलाता हूँ,
मैं चुपचाप फुटपाथ पर अँधेरे में अकारण खड़ा हूँ.
भोथरी छुरी जैसी चीखें
और आँधी में टूटते हुए खुले दरवाजों की तरह ठहाके
एक साथ
मेरे कलेजे से उभरते हैं
मैं अँधेरे में हूँ और चुपचाप हूँ .

सतमी के चाँद की नोक मेरी पीठ में धंस जाती है.
मेरे लहू से भीग जाते हैं टैक्सियों के आरामदेह गद्दे
फुटपाथ पर रेंगते रहते हैं सुर्ख-सुर्ख दाग.
किसी भी ऊँचे मकान की खिड़की से
नींद में बोझिल-बोझिल पलकें
नहीं झाँकती हैं.
किसी हरे पौधे की कोमल, नन्ही शाखें,
शाखें और फूल,
फूल और सुगंधियाँ
मेरी आत्मा में नहीं फैलती हैं.

टैक्सी में भी हूँ और फुटपाथ पर खड़ा भी हूँ.
मैं
सोए हुए शहर की नस-नस में
किसी मासूम बच्चे की तरह, जिसकी माँ खो गई है,
भटकता रहता हूँ,
(मेरी नई आजादी और मेरी नई मुसीबत...उफ्!)
चीख और ठहाके
एक साथ मेरे कलेजे से उभरते हैं.

5.
प्रेम का अन्तिम गीत


हम (मैं और तुम) स्वयं को सम्पूर्ण करते हैं
बाँहों के बीच की वह जमीन खोलकर
जिसे जमाने के सामने खोलते हुए डरते हैं

हमारे शरीर की तपन, हमारी ख्वाहिशों का बुखार
तुम्हारे स्तूप; मेरी कब्र के पास खड़े मीनार...
इनसे कभी एक दुनिया बनी थी
शारीरिक जड़ता और जंगलीपन की एक खास स्थिति में

शुरू में शरमाई थीं तुम मॉगते हुए. अन्त में
बिना माँगे ही ले लिया था- क्यों?

दोस्ती बनने या टूटने में
कभी दीवार या हथौड़ा नहीं बना करती है नैतिकता!
हम (मैं और तुम) अनैतिक हैं, क्योंकि
हम दोस्त हैं
मैं आकाश का रक्त-स्राव झेलता हूँ
तुम धरती का गर्भधारण करती हो.

जीवन एक घड़ी है जिसमें मुझे इतना ही करना है.
कि तुममें घुल जाऊँ,
शारीरिक जड़ता और जंगलीपन की एक खास स्थिति में
तुम मुझे पैदा करो
तुम झुको, और तुम टूटो और तुम घायल बिल्ली की तरह
छटपटाओ, और मैं तुम्हें पैदा करूँ
मेरी बच्ची बनकर तुम मुझमें सो जाओ
और जागो नहीं जब तक
मैं दफ्तर से लौट नहीं आऊँ.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay