अब तुझे मैं याद आना चाहता हूं, क़तील शिफाई की पुण्यतिथि पर उनकी 5 चुनिंदा ग़ज़लें

शायरी की दुनिया में क़तील शिफाई का एक खासा मुकाम है. आज उनकी पुण्यतिथि पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनकी पांच उम्दा ग़ज़लें

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aajtak.in नई दिल्ली, 11 September 2019
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूं, क़तील शिफाई की पुण्यतिथि पर उनकी 5 चुनिंदा ग़ज़लें अजीम शायर क़तील शिफाई [फाइल फोटो]

मुझे आई ना जग से लाज
मैं इतना ज़ोर से नाची आज,
के घुंघरू टूट गए

कितने फनकारों ने इस गीत को अपनी आवाज दी होगी, कहना मुश्किल है. पर इसके लेखक क़तील शिफाई को उनकी पुण्यतिथि पर याद करना जरूरी है. कतील 24 दिसंबर, 1919 को हरीपुर हज़ारा में पैदा हुए. उनका असली नाम था औरंगज़ेब ख़ान था और 'क़तील' था उनका तख़ल्‍लुस. क़तील यानी जिसका क़त्‍ल हो चुका है. अपने उस्‍ताद हकीम मुहम्‍मद शिफ़ा के सम्‍मान में उन्होंने अपने नाम के साथ शिफ़ाई शब्‍द जोड़ लिया था. कतील प्यार के सच्चे शायर थे.

थक गया मैं करते करते याद तुझ को
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ...
***
हमें भी नींद आ जाएगी हम भी सो ही जाएँगे
अभी कुछ बे-क़रारी है सितारो तुम तो सो जाओ...

कतील ने न जाने क्या कुछ लिखा. कितना खूब लिखा. उनके नगमे, ग़ज़ल व शायरी आज भी गुनगुनाई जाती हैं. शायरी की दुनिया में उनका एक खासा मुकाम है. कहते हैं पिता के असमय निधन की वजह से पढ़ाई बीच में ही छोड़कर क़तील को खेल के सामान की अपनी दुकान शुरू करनी पड़ी. इस धंधे में बुरी तरह नाकाम रहने के बाद क़तील रावलपिंडी चले गए, और एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में साठ रुपए महीने की तनख्‍वाह पर काम करना शुरू कर दिया. क़तील की पहली ग़ज़ल लाहौर से निकलने वाले साप्‍ताहिक अख़बार ‘स्‍टार’ में छपी, जिसके संपादक थे क़मर जलालाबादी. एक बार लिखना क्या शुरू किया, कतील ने कितने शानदार नगमें लिखे.

जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ
जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं
***
तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं
एक ज़रा सा दिल टूटा है और तो कोई बात नहीं
***
दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह
मैनें तुझसे चाँद सितारे कब माँगे
रौशन दिल बेदार नज़र दे या अल्लाह...

सन 1946 में नज़ीर अहमद ने उन्‍हें मशहूर पत्रिका 'आदाब-ऐ-लतीफ़' में उप संपादक बनाकर बुला लिया. यह पत्रिका सन 1936 से छप रही थी. जनवरी 1947 में क़तील को लाहौर के एक फिल्‍म प्रोड्यूसर ने गाने लिखने की दावत दी. उन्‍होंने जिस पहली फिल्‍म में गाने लिखे उसका नाम है 'तेरी याद'. उसके बाद तो यह सिलसिला चल निकला. क़तील ने कई पाकिस्‍तानी और कुछ हिंदुस्‍तानी फिल्‍मों के लिए भी गीत लिखे. जगजीत सिंह-चित्रा सिंह, गुलाम अली सहित कई हिंदुस्तानी, पाकिस्तानी गायकों ने उनकी ग़ज़लें और नज़्में गाए. 11 जुलाई, 2001 को इस दुनिया से अपनी रुखसत से पहले उनकी बीस से भी ज्‍यादा किताबें शाया हो चुकी थीं.

साहित्य आजतक पर क़तील शिफाई की पुण्यतिथि पर पढ़िए उनकी ये पांच चुनिंदा ग़ज़लें-

1.
परेशाँ रात सारी है सितारों तुम तो सो जाओ
सुकूत-ए-मर्ग तारी है सितारों तुम तो सो जाओ

हँसो और हँसते-हँसते डूबते जाओ ख़लाओं में
हमें ये रात भारी है सितारों तुम तो सो जाओ

तुम्हें क्या आज भी कोई अगर मिलने नहीं आया
ये बाज़ी हमने हारी है सितारों तुम तो सो जाओ

कहे जाते हो रो-रो के हमारा हाल दुनिया से
ये कैसी राज़दारी है सितारों तुम तो सो जा

हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा
यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ

हमें भी नींद आ जायेगी हम भी सो ही जायेंगे
अभी कुछ बेक़रारी है सितारों तुम तो सो जाओ

2.
खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें
न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें

सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर
यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें

हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना
ब-नाम-ए-अज़मत-ए-किरदार आओ सच बोलें

सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ़ है
पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें

तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर
कहेंगे क्या रसन-ओ-दार आओ सच बोलें

बजा के ख़ू-ए-वफ़ा एक भी हसीं में नहीं
कहाँ के हम भी वफ़ा-दार आओ सच बोलें

जो वस्फ़ हम में नहीं क्यूँ करें किसी में तलाश
अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें

छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के
नज़र है आईना बरदार आओ सच बोलें

'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया
किधर गए वो गुनह-गार आओ सच बोलें

3.
तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते
जो वाबस्ता हुए तुमसे वो अफ़साने कहाँ जाते

निकल कर दैर-ओ-क़ाबा से अगर मिलता न मैख़ाना
तो ठुकराए हुए इन्साँ ख़ुदा जाने कहाँ जाते

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाख़ाने की
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते

चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी
वगरना हम ज़माने को ये समझाने कहाँ जाते

‘क़तील’ अपना मुक़द्दर ग़म से बेग़ाना अगर होता
तो फिर अपने-पराए हमसे पहचाने कहाँ जाते

4.
यारो किसी क़ातिल से कभी प्यार न माँगो
अपने ही गले के लिये तलवार न माँगो

गिर जाओगे तुम अपने मसीहा की नज़र से
मर कर भी इलाज-ए-दिल-ए-बीमार न माँगो

खुल जायेगा इस तरह निगाहों का भरम भी
काँटों से कभी फूल की महकार न माँगो

सच बात पे मिलता है सदा ज़हर का प्याला
जीना है तो फिर जीने के इज़हार न माँगो

उस चीज़ का क्या ज़िक्र जो मुम्किन ही नहीं है
सहरा में कभी साया-ए-दीवार ना माँगो

5.
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह

किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह

बढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह

सितम तो ये है कि वो भी ना बन सका अपना
कूबूल हमने किये जिसके गम खुशी कि तरह

कभी न सोचा था हमने 'क़तील' उस के लिये
करेगा हमपे सितम वो भी हर किसी की तरह

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