कोहरे में सोए हैं पेड़ पत्ता-पत्ता नम है, यह सुबूत क्या कम है! नवगीत-संध्या में डूबी शाम

सैंकड़ों सुइयां चुभोता है समय/ समय से कट कर कहां जाएं/ बिखर कर बँट कर कहां जाएं... 'नवगीत का भविष्य एवं भविष्य का नवगीत' विषय पर लखनऊ में आयोजित संगोष्ठी का दूसरा सत्र नवगीत को समर्पित रहा

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aajtak.in नई दिल्ली, 28 August 2019
कोहरे में सोए हैं पेड़ पत्ता-पत्ता नम है, यह सुबूत क्या कम है! नवगीत-संध्या में डूबी शाम लखनऊ में नवगीत गोष्ठी

लखनऊः नवगीत का भविष्य, भविष्य का नवगीत संगोष्ठी के दोपहर बाद के दूसरे सत्र में माहेश्वर तिवारी, इंदीवर, रविशंकर पांडेय, डा सुरेश, राजेंद्र वर्मा, ओम प्रकाश तिवारी, रामशंकर वर्मा, शीला पांडेय, शोभा दीक्षित भावना, संध्या सिंह, रंजना गुप्ता, पूर्णिमा बर्मन, निर्मल शुक्ल, डॉ ओम निश्चाल, श्याम नारायण श्याम, रश्मि शील, कैलाश निगम, जय चक्रवर्ती, राजेंद्र राज व केवल प्रसाद सत्यओम सहित लगभग पैतालीस नवगीतकारों ने अपनी रचनाएं पढ़ीं. डॉ हरिओम ने अपने नए गजल अलबम की गजल सुनाई. इस नवगीत पाठ सत्र का संचालन हिंदी के सुपरिचित नवगीतकार जय चक्रवर्ती ने किया.
 
गीत गोष्ठी की शुरुआत शोभा दीक्षित 'भावना' ने अपने काव्य-पाठ से की. उसके बाद मुंबई से पधारे ओम प्रकाश तिवारी ने इस दिन खातिर गीत पढ़ कर पारिवारिक संबंधों में आती दरार को उद्घाटित किया तो सीमा गुप्ता ने मैं बिटिया हूं नव भारत की प्रस्तुति कर सबका ध्यान खींचा. वरिष्ठ नवगीतकार राजेंद्र वर्मा ने पढ़ा कि- बाढ़ अभावों की आई है डूबी गली-गली/ दम साधे हम देख रहे हैं/ कागज की नाव चली.

सुकंठ गीतकार डा सुरेश व्यथित ने समय की विडंबनाओं को उद्घाटित करते हुए कहा- सैंकड़ों सुइयां चुभोता है समय/ समय से कट कर कहां जाएं/ बिखर कर बँट कर कहां जाएं. इसके बाद श्रोताओं की मांग पर उन्हों ने दूसरा गीत पढ़ा- मुट्ठियों में बंद कर लेता/ समय होता अगर वश में.
 
सुपरिचित आलोचक व गीतकार डा ओम निश्चल ने अपना एक ताजा गीत पढ़ते हुए आज के उखड़े उखड़े यथार्थवादी जीवन में आशा और उम्मीद की किरन जगाई- एक ऐसी सुबह फिर मिले/ धूप गेंदें की मानिंद मिले. भूख के भूगोल में नामक संग्रह के रचनाकार डॉ रविशंकर पांडेय ने अपना चर्चित यथार्थवादी नवगीत पढ़ा- दिल्ली से लाखों के किस्से पैदल गांव तक आते हैं/ गांवों में आकर एक-एक चौपालों में खो जाते हैं और सबका ध्यान आकृष्ट किया.

जानेमाने नवगीतकार माहेश्वर तिवारी इस उम्र में भी अपनी लय और गूंज से विरत या शिथिल नहीं हुए हैं. वे मंच पर पढ़ते हैं तो लगता है पोडियम पर माहेश्व‍र तिवारी की आवाज है. उसी पुराने सुपरिचित लहजे में उन्होंने अपना गीत- कोहरे में सोए हैं पेड़/  पत्ता- पत्ता  नम है/ यह सुबूत क्या- कम है- सुना कर माहौल को नए सिरे से समझने का एक पथ प्रशस्त किया.

डॉ हरिओम ने अपने नए गजल अलबम की गजल - मंजिलों से खफा खफा जैसे/ मैं कोई एक रास्ता जैसे- सुना कर विमुग्ध कर दिया. यूएई से पधारी नवगीतकार पूर्णिमा बर्मन ने- शहरों की मारामारी में सारे मूल्य गए- सुनाया तो शीला पांडेय ने घन हवाओं से संभलते युद्ध के ऐलान में हैं सुना कर लालित्य की खुशबू बिखेर दी.

निर्मल शुक्ल ने शिष्य और गुरु के अंतराल को बांचते हुए मजाकिया अंदाज में सुनाया- पढ़ चुके हैं हम सारी इबारत अब गुरु जी, तो सब हँसी से झूम उठे. इंदीवर ने अपना एक पुराना गीत सुनाकर माहौल को सरस बनाया. संध्या सिंह ने नवगीत में नए रंग भरते हुए गाया- सीलन का मौसम आना है/ थोड़ी धूप बचाकर रखना/ जम जाएगी काई मन पर अपने पांव जमाकर रखना.

इस नवगीत गोष्ठी में पुराने नवगीतकार एवं जाने माने कवि नरेश सक्सेना भी पधारे और श्रोताओं की मांग पर अपनी लोकप्रिय रचना शिशु लोरी के शब्द नहीं संगीत समझता है, बाद में समझेगा भाषा अभी वह अर्थ समझता है सुना कर जैसे उपस्थित श्रोताओं के मन की लहरों में नर्तन पैदा कर दिया.

आज की दिनचर्या में बूढों के हालात पर रोशनी डालते हुए श्याम नारायण श्याम ने पूरा दृश्य गीत में उपस्थित कर दिया- ये मुआ अखबार फेंको/ इधर हरसिंगार देखो. गीतकार रश्मिशील ने अपना एक सुगठित गीत पढ़ा: मुनिया की आंखों में सपने बड़े बड़े/ ज्यों ज्यों नई योजना आई निर्धन और बढ़े- कह कर व्यवस्था की बखिया उधेड़ी तो रंजना गुप्ता ने हादसों का सिलसिला ने कम हुआ पढ़ कर महफिल में जान डाल दी.

सुपरिचित नवगीतकार जय चक्रवर्ती ने आज की सोशल मीडिया की इस विडंबना पर प्रहार किया कि एक फोटो रोज अपना फेसबुक पर डालता हूँ / अपरिचय के इस जगत में एक परिचय डालता हूँ. राजेंद्र राज ने आज के कटु यथार्थ का नक्शा अपने इस गीत से खींचा-
गुमसुम बैठी श्याम कली के घर पर शोर बहुत
हार हार काले कलंक से रोई भोर बहुत.
जब देखा कुछ भद्रजनों की उठी हुई उंगली
इज्जतदारों के कुनबे में इज्जतखोर बहुत.

डॉ कैलाश निगम ने नवगीत  गोष्ठी को शिखर पर पहुंचाते हुए पढ़ा कि- चिलचिलाती धूप हो या बरसता सावन/ एक पल भी फूल सा खिलता नहीं है मन. गोष्ठी में गिरिजाशंकर दुबे, केवल प्रसाद सत्यम आदि अनेक रचनाकारों ने अपने नवगीत पढ़े. पूरे दिन चली यह चर्चा संगोष्ठी एक संजीदा विमर्श के साथ एक सरस गोष्ठी में बदल गयी जो देर शाम तक चलती रही.

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