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जयंती विशेषः महमूद दरवेश की कविताएं; आओ! दुख और ज़ंजीर के साथियों, हम चलें कुछ भी न हारने के लिए

कविता मेरे धड़कते हृदय का रक्त है - फ़िलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश की 'चुनौती' नामक कविता की यह एक पंक्ति है. महमूद प्रतिरोध के कवि थे. साहित्य आजतक के पाठकों के लिए महमूद दरवेश की जयंती पर उनकी पांच कविताएं:

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 13 March 2019
जयंती विशेषः महमूद दरवेश की कविताएं; आओ! दुख और ज़ंजीर के साथियों, हम चलें कुछ भी न हारने के लिए प्रतीकात्मक इमेज- GettyImages

कविता मेरे धड़कते हृदय का रक्त है - फ़िलिस्तीनी कवि महमूद दरवेश की 'चुनौती' नामक कविता की यह एक पंक्ति है. महमूद प्रतिरोध के कवि थे या मानवता के, संघर्ष के कवि थे या शांति के इस पर अपने-अपने अलग मत हो सकते हैं, पर वह एक शानदार कवि थे, और जब तक अरब या विश्व साहित्य जिंदा रहेगा, उनकी कविताएं लोगों तक पहुंचती और गुनगुनायी जाती रहेंगी.

साहित्य आजतक के पाठकों के लिए महमूद दरवेश की जयंती पर उनकी पांच कविताएं: 

1.

मैं घोषणा करता हूं

जब तक

मेरी एक बालिश्त ज़मीन भी शेष है

एक जैतून का पेड़ है मेरे पास

एक नीम्बू का पेड़

एक कुआँ

और एक कैक्टस का पौधा

जब तक

मेरे पास एक भी स्मृति शेष है

पुस्तकालय है छोटा-सा

दादा की तस्वीर है

और एक दीवार

जब तक

उच्चरित होंगे अरबी शब्द

गाए जाते रहेंगे लोकगीत

पढ़ी जाती रहेंगी-

कविता की पंक्तियाँ

अनतार-अल-अब्से की कथाएँ

फ़ारस और रोम के विरुद्ध लड़े गए

युद्धों की वीर गाथाएँ

जब तक

मेरे अधिकार में हैं मेरी आँखें

मेरे होंठ और मेरे हाथ

मैं खुद हूँ जब तक

मैं अपने शत्रु के समक्ष घोषित करूँगा -

मुक्ति के लिए प्रबल संघर्ष

स्वतन्त्र लोगों के नाम पर हर कहीं

मज़दूरों, छात्रों और कवियों के नाम पर

मैं घोषित करूँगा

खाने दो कलंकित रोटी

कायरों को

सूरज के दुश्मनों को

मैं जब तक जीवित रहूँगा

मेरे शब्द शेष रहेंगे -

"रोटी और हथियार

मुक्ति-योद्धाओं के लिए"

2.

लोगों के लिए गीत

आओ! दुख और ज़ंजीर के साथियों

हम चलें कुछ भी न हारने के लिए

कुछ भी न खोने के लिए

सिवा अर्थियों के

आकाश के लिए हम गाएँगे

भेजेंगे अपनी आशाएँ

कारखानों और खेतों और खदानों में

हम गाएँगे और छोड़ देंगे

अपने छिपने की जगह

हम सामना करेंगे सूरज का

हमारे दुश्मन गाते हैं -

"वे अरब हैं... क्रूर हैं..."

हाँ, हम अरब हैं

हम निर्माण करना जानते हैं

हम जानते हैं बनाना

कारखाने, अस्पताल और मकान

विद्यालय, बम और मिसाईल

हम जानते हैं

कैसे लिखी जाती है सुन्दर कविता

और संगीत...

हम जानते हैं.

3.

उन्होंने उससे पूछा

उन्होंने उससे पूछा -

तुम क्यों गाते हो?

उसने जवाब दिया -

मैं गाने के लिए गाता हूँ।

उन्होंने उसकी छाती टटोली

पर वहाँ उसका दिल नहीं ढूँढ़ पाए

उन्होंने उसका दिल टटोला

पर उन्हें वहाँ नहीं मिले उसके लोग

उन्होंने उसकी आवाज़ की तलाशी ली

पर उन्हें वहाँ उसका दुख नहीं मिला

उसके बाद उन्होंने उसके दुख की तलाशी ली

और वहाँ उन्हें मिला उसका क़ैदख़ाना

उन्होंने तलाशी ले डाली कैदख़ाने की

लेकिन उन्हें दिखे वे सब सिर्फ़ बेड़ी-हथकड़ी में।

4.

चुनौती

तुम मुझे चारों तरफ़ से बाँध दो

छीन लो मेरी पुस्तकें और चुरूट

मेरा मुँह धूल से भर दो

कविता मेरे धड़कते हृदय का रक्त है

मेरी रोटी का खारापन

मेरी आँखों का तरलता

यह लिखी जाएगी नाख़ूनों से

आँखॊं के कोटरों से, छुरों से

मैं इसे गाऊँगा

अपनी क़ैद-कोठरी में, स्नानघर में

अस्तबल में, चाबुक के नीचे

हथकड़ियों के बीच, ज़ंजीरों में फँसा हुआ

लाखों बुलबुलें मेरे भीतर हैं

मैं गाऊँगा

गाऊँगा मैं

अपने संघर्ष के गीत

5.

बहुत बोलता हूं मैं

बहुत बोलता हूं मैं

स्त्रियों और वृक्षों के बीच के सूक्ष्म भेदों के बारे में

धरती के सम्मोहन के बारे में

और ऐसे देश के बारे में

नहीं है जिसकी अपनी मोहर पासपोर्ट पर लगने को

पूछता हूं: भद्र जनों और देवियों,

क्या यह सच है- जैसे आप कह रहे हैं-

कि यह धरती है सम्पूर्ण मानव जाति के लिए?

यदि सचमुच ऐसा है

तो कहां है मेरा घर-

मेहरबानी करें मुझे मेरा ठिकाना तो बता दें आप !

सम्मेलन में शामिल सब लोग

अनवरत करतल ध्वनि करते रहे अगले तीन मिनट तक-

आजादी और पहचान के बहुमूल्य तीन मिनट!

फिर सम्मेलन मुहर लगाता है लौट कर अपने घर जाने के हमारे अधिकार पर

जैसे चूजों और घोड़ों का अधिकार है

शिला से निर्मित स्वपन में लौट जाने का।

मैं वहां उपस्थित सभी लोगों से मिलाते हुए हाथ

एक-एक करके

झुक कर सलाम करते हुए सबको-

फिर शुरू कर देता हूं अपनी यात्रा

जहां देना है नया व्याख्यान

कि क्या होता है अंतर बरसात और मृग मरीचिका के बीच

वहां भी पूछता हूं : भद्र जनों और देवियों,

क्या यह सच है- जैसा आप कह रहे हैं-

कि यह धरती है सम्पूर्ण मानव जाति के लिए?

- शुरू की चार कविताओं का अंग्रेज़ी से अनुवाद अनिल जनविजय ने किया है और आखिरी कविता का अनुवाद- यादवेंद्र ने. स्रोतः कविता कोश

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