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जन्मदिन विशेषः कुमार अंबुज की 'नई सभ्यता की मुसीबत' सहित उन्हीं द्वारा चुनी गईं 5 कविताएं

कुमार अंबुज हमारे वक्त के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवियों में शामिल हैं. आज उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़ें उनकी की वे 5 कविताएं, जिन्हें उन्होंने खुद आपके लिए चुना है

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कुमार अंबुजनई दिल्ली, 16 April 2019
जन्मदिन विशेषः कुमार अंबुज की 'नई सभ्यता की मुसीबत' सहित उन्हीं द्वारा चुनी गईं 5 कविताएं प्रतीकात्मक इमेज

कुमार अंबुज हमारे वक्त के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कवियों में शामिल हैं. उनका पहला कविता संग्रह 1992 में प्रकाशित हुआ था और उसके बाद से संकलनों का सिलसिला जारी है. काव्य-सृजन उनके लिए अभिव्यक्ति की राह तो है ही उनका भवतव्य भी. वह क्या कुछ लिखते हैं, यह उनके जन्मदिन पर उन्हीं के द्वारा चुनी गई इन पांच रचनाओं में देखें.

साहित्य आजतक पर कुमार अंबुज की वे 5 कविताएं, जिन्हें उन्होंने खुद आपके लिए चुना हैः

1.

नई सभ्यता की मुसीबत

नई सभ्यता ज्यादा गोपनीयता नहीं बरत रही है

वह आसानी से दिखा देती है अपनी जंघाएँ और जबड़े

वह रौंद कर आई है कई सभ्यताओं को

लेकिन उसका मुकाबला बहुत पुरानी चीजों से है

जिन पर लोग अभी तक विश्वास करते चले आए हैं

उसकी थकान उसकी आक्रामकता समझी जा सकती है

कई चीजों के विकल्प नहीं हैं

जैसे पत्थर आग या बारिश

तो यह असफल होना नहीं है

हमें पूर्वजों के प्रति नतमस्तक होना चाहिए

उन्हें जीवित रहने की अधिक विधियाँ ज्ञात थीं

जैसे हमें मरते चले जाने की ज्यादा जानकारियाँ हैं

ताड़पत्रों और हिंसक पशुओं की आवाजों के बीच

या नदी किनारे घुड़साल में पुआल पर

जन्म लेना कोई पुरातन या असभ्य काम नहीं था

अपने दाँत मत भींचो और उस न्याय के बारे में सोचो

जो उसे भी मिलना चाहिए जो माँगने नहीं आता

गणतंत्र की वर्षगाँठ या निजी खुशी पर इनाम की तरह नहीं

मनुष्य के हक की तरह हर एक को थोड़ा आकाश चाहिए

और खाने-सोने लायक जमीन तो चाहिए ही चाहिए

माना कि लोग निरीह हैं लेकिन बहुत दिनों तक सह न सकेंगे

स्वतंत्रता सबसे पुराना विचार है सबसे पुरानी चाहत

तुम क्या क्या सिखा सकती हो हमें

जबकि थूकने तक के लिए जगह नहीं बची है

तुम अपनी चालाकियों में नई हो

लेकिन तुम्हारे पास भी एक दुकानदार की उदासी है

जितनी चीजों से तुमने घेर लिया है हमें

उनमें से कोई जरा-सा भी ज्यादा जीवन नहीं देती

सिवाय कुछ नई दवाइयों के

जो यों भी रोज-रोज दुर्लभ होती चली जाती हैं

और एक विशाल दुनिया को अधिक लाचार बनाती हैं

हँसो मत, यह मशीन की नहीं आदमी की चीख है

उसे मशीन में से निकालो

घर पर बच्चे उसका इंतजार कर रहे हैं

हम चाहते हैं तुम हमारे साथ कुछ बेहतर सलूक करो

लेकिन जानते है तुम्हारी भी मुसीबत

कि इस सदी तक आते आते तुमने

मनुष्यों के बजाय

वस्तुओं में बहुत अधिक निवेश कर दिया है।

2.

क्रूरता

धीरे धीरे क्षमाभाव समाप्त हो जाएगा

प्रेम की आकांक्षा तो होगी मगर जरूरत न रह जाएगी

झर जाएगी पाने की बेचैनी और खो देने की पीड़ा

क्रोध अकेला न होगा वह संगठित हो जाएगा

एक अनंत प्रतियोगिता होगी जिसमें लोग

पराजित न होने के लिए नहीं

अपनी श्रेष्ठता के लिए युद्धरत होंगे

तब आएगी क्रूरता

पहले हृदय में आएगी और चेहरे पर न दीखेगी

फिर घटित होगी धर्मग्रंथों की व्याख्या में

फिर इतिहास में और फिर भविष्यवाणियों में

फिर वह जनता का आदर्श हो जाएगी

निरर्थक हो जाएगा विलाप

दूसरी मृत्यु थाम लेगी पहली मृत्यु से उपजे आँसू

पड़ोसी सांत्वना नहीं एक हथियार देगा

तब आएगी क्रूरता और आहत नहीं करेगी हमारी आत्मा को

फिर वह चेहरे पर भी दिखेगी

लेकिन अलग से पहचानी न जाएगी

सब तरफ होंगे एक जैसे चेहरे

सब अपनी-अपनी तरह से कर रहे होंगे क्रूरता

और सभी में गौरव भाव होगा

वह संस्कृति की तरह आएगी उसका कोई विरोधी न होगा

कोशिश सिर्फ यह होगी कि किस तरह वह अधिक सभ्य

और अधिक ऐतिहासिक हो

वह भावी इतिहास की लज्जा की तरह आएगी

और सोख लेगी हमारी सारी करुणा, हमारा सारा श्रृंगार

यही ज्यादा संभव है कि वह आए

और लंबे समय तक हमें पता ही न चले उसका आना।

3.

अन्याय

अन्याय की ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती

वह एक दिन होता ही है

याद करोगे तो याद आएगा कि वह रोज ही होता रहा है

कई बार इसलिए तुमने उस पर तवज्जो नहीं दी

कि वह किसी के द्वारा किसी और पर किया जाता रहा

कि तुम उसे एक साधारण खबर की तरह लेते रहे

कि उसे तुम देखते रहे और किसी मूर्ति की तरह देखते रहे

कि वह सब तरफ हो रहा होता है

तुम सोचते हो और चाय पीते हो कि यह भाग्य की बात है

और इसमें तुम्हारी कोई भूमिका नहीं है

फिर सोचोगे तो यह भी आएगा याद कि तुमने भी

लगातार किया है अन्याय

जो ताकत से किया या निरीह बन कर सिर्फ वह ही नहीं

जो तुम प्रेम की ओट ले कर करते रहे वह भी अन्याय ही था

और जो तुमने खिलते हुए फूल से मुँह फेर कर किया

और तब भी जब तुम अपनी आकांक्षाओं को अकेला छोड़ते रहे

और जब तुम चीजों पर अपना और सिर्फ अपना हक मानते रहे

घर में ही देखो तुमने पेड़, पानी, आकाश, बच्चों, स्त्री

और ऐसी कितनी ही चीजों पर कब्जा किया

इजारेदारी से बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है

और उस तथाकथित पवित्र आंतरिक कोने में भी देखो

जिसे कोई और नहीं देख सकता तुम्हारे अलावा

वहाँ अन्याय करते रहने के चिह्न अब भी हैं

तुमने एक बार दासता स्वीकार की थी

एक बार तुम बन बैठे थे न्यायाधीश

इस तरह भी तुमने अन्याय के कुछ बीज बोए

तुम एक बार चुप रहे थे, उसका निशान भी दिखेगा

और उस वक्त का भी जब तुम विजयी हुए थे

अन्याय से ही आखिर एक दिन अनुभव होता है

कि कुछ ऐसा होना चाहिए जो न हो अन्याय

और इस तरह तुम्हारे सामने

जीवन की सबसे बड़ी जरूरत की तरह आता है -

न्याय!

4.

परचम

वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला

कोई उसे छू भी नहीं रहा है

किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा

लेकिन देखो, वह खिला हुआ है

बारिश, धूल और यातनाओं को जज्ब करते हुए

एक पत्थर भी वहाँ किसी की प्रतीक्षा में है

आसपास की हर चीज इशारा करती है

तालाब के किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू

दुर्दिनों के किनारे शब्द

मुझे प्यास लग आई है और यह सपना नहीं है

जैसे पेड़ की यह छाँह मंजिल नहीं

यह समाज जो आखिर एक दिन आजाद होगा

उसकी संभावना मरते हुए आदमी की आँखों में है

असफलता मृत्यु नहीं है

यह जीवन है, धोखेबाज पर भी मुझे विश्वास करना होगा

निराशाएँ अपनी गतिशीलता में आशाएँ हैं

'मैं रोज परास्त होता हूँ' -

इस बात के कम से कम बीस अर्थ हैं

यों भी एक-दो अर्थ देकर

टिप्पणीकार काफी कुछ नुकसान पहुँचा चुके हैं

गणनाएँ असंख्य को संख्या में न्यून करती चली जाती हैं

सतह पर जो चमकता है वह परावर्तन है

उसके नीचे कितना कुछ है अपार

शांत, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ।

5.

तानाशाह की पत्रकार वार्ता

वह हत्या मानवता के लिए थी

और यह सुंदरता के लिए

वह हत्या अहिंसा के लिए थी

और यह इस महाद्वीप में शांति के लिए

वह हत्या अवज्ञाकारी नागरिक की थी

और यह जरूरी थी हमारे आत्मविश्वास के लिए

परसों की हत्या तो उसने खुद आमंत्रित की थी

और आज सुबह आत्मरक्षा के लिए करना पड़ी

और यह अभी ठीक आपके सामने

उदाहरण के लिए!

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