वो हुस्न जिसको देख के कुछ भी कहा न जाए; खलीलुर्रहमान आज़मी की जयंती पर उनकी ग़जलें

साहित्य आजतक पर पढ़िए उर्दू साहित्य की मशहूर शख्सियत और मशहूर शायर शहरयार के उस्ताद रहे खलीलुर्रहमान आज़मी की जयंती पर उनकी बेहद मशहूर पांच ग़ज़लें

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Aajtak.inनई दिल्ली, 08 August 2019
वो हुस्न जिसको देख के कुछ भी कहा न जाए; खलीलुर्रहमान आज़मी की जयंती पर उनकी ग़जलें प्रतीकात्मक इमेज [सौजन्यः GettyImages ] इनसेट में खलीलुर्रहमान आज़मी

खलीलुर्रहमान आज़मी की आज जयंती है. उन्हें उर्दू की आधुनिक शायरी का पायनियर माना जाता रहा. उनका जन्म 08 अगस्त, 1927 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से उर्दू में एमए की पढ़ाई की, और खास बात यह कि जब वह खुद एक छात्र थे, तभी उन्होंने ब्रिटिश विद्वान, राल्फ रसेल को उर्दू पढ़ाया. वह मशहूर शायर शहरयार के उस्ताद भी थे.

तर्ज़ जीने का सिखाती है मुझे, तश्नगी ज़हर पिलाती है मुझे...कैसे हो ख़त्म कहानी ग़म की,
अब तो कुछ नींद सी आती है मुझे...जैसी न जानें कितनी नायाब पंक्तियां लिखने वाले खलीलुर्रहमान पूरी जिंदगी लिखते पढ़ते रहे. उनकी प्रकाशित रचनाओं में काग़जी पैरहन, नया अहद नामा, नयी नज़्म का सफर, फिक्र ओ फन, मज़मीन ए नौ, मुकद्दमा ए कलाम ए आशिक और ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी शामिल है.

लेखक व पत्रकार आसिफ आजमी ने आजमगढ़ की धरती पर पैदा हुए इस महान शायर पर खलीलुर्रहमान आजमीरू एक बाजयाफ्ता नामक पुस्तक भी लिखी है.

साहित्य आजतक पर पढ़िए उर्दू साहित्य की इस मशहूर शख्सियत खलीलुर्रहमान आज़मी की जयंती पर उनकी पांच चुनी हुई ग़ज़लें

1.
वो हुस्न जिसको देख के कुछ भी कहा न जाए
दिल की लगी उसी से कहे बिन रहा न जाए।

क्या जाने कब से दिल में है अपना बसा हुआ
ऐसा नगर कि जिसमें कोई रास्ता न जाए।

दामन रफ़ू करो कि बहुत तेज़ है हवा
दिल का चिराग़ फिर कोई आकर बुझा न जाए।

नाज़ुक बहुत है रिश्त-ए दिल तेज़ मत चलो
देखो तुम्हारे हाथ से यह सिलसिला न जाए।

इक वो भी हैं कि ग़ैर को बुनते हैं जो कफ़न
इक हम कि अपना चाक गिरेबाँ सिया न जाए।

2.
बने-बनाए से रस्तों का सिलसिला निकला
नया सफ़र भी बहुत ही गुरेज़-पा निकला

न जाने किस की हमें उम्र भर तलाश रही
जिसे क़रीब से देखा वो दूसरा निकला

हमें तो रास न आई किसी की महफ़िल भी
कोई ख़ुदा कोई हम-साया-ए-ख़ुदा निकला

हज़ार तरह की मय पी हज़ार तरह के ज़हर
न प्यास ही बुझी अपनी न हौसला निकला

हमारे पास से गुज़री थी एक परछाईं
पुकारा हम ने तो सदियों का फ़ासला निकला

3.
मैं कहाँ हूँ कुछ बता दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!
फिर सदा अपनी सुना दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!

सो गए इक एक कर के ख़ाना-ए-दिल के चराग़
इन चराग़ों को जगा दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!

वो बिसात-ए-शेर-ओ-नग़्मा रतजगे वो चहचहे
फिर वही महफ़िल सजा दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!

जिस के हर क़तरे से रग रग में मचलता था लहू
फिर वही इक शय पिला दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!

अब तो याद आता नहीं कैसा था अपना रंग-रूप
फिर मिरी सूरत दिखा दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!

एक मुद्दत हो गई रूठा हूँ अपने-आप से
फिर मुझे मुझ से मिला दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!

जाने बरगश्ता है क्यूँ मुझ से ज़माने की हवा
अपने दामन की हवा दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!

रच गया है मेरी नस नस में मिरी रातों का ज़हर
मेरे सूरज को बुला दे ज़िंदगी ऐ ज़िंदगी!

4.
सोते सोते चौंक पड़े हम ख़्वाब में हम ने क्या देखा
जो ख़ुद हम को ढूँड रहा हो ऐसा इक रस्ता देखा

दूर से इक परछाईं देखी अपने से मिलती-जुलती
पास से अपने चेहरे में भी और कोई चेहरा देखा

सोना लेने जब निकले तो हर हर ढेर में मिट्टी थी
जब मिट्टी की खोज में निकले सोना ही सोना देखा

सूखी धरती सुन लेती है पानी की आवाज़ों को
प्यासी आँखें बोल उठती हैं हम ने इक दरिया देखा

आज हमें ख़ुद अपने अश्कों की क़ीमत मालूम हुई
अपनी चिता में अपने-आप को जब हम ने जलता देखा

चाँदी के से जिन के बदन थे सूरज के से मुखड़े थे
कुछ अंधी गलियों में हम ने उन का भी साया देखा

रात वही फिर बात हुई ना हम को नींद नहीं आई
अपनी रूह के सन्नाटे से शोर सा इक उठता देखा

5.
तेरी सदा का है सदियों से इंतज़ार मुझे
मेरे लहू के समुन्दर जरा पुकार मुझे

मैं अपने घर को बुलंदी पे चढ़ के क्या देखूं
उरूज-ए-फ़न मेरी दहलीज़ पर उतार मुझे

उबलते देखी है सूरज से मैंने तारीकी
न रास आएगी ये सुब्ह-ए-ज़रनिगार मुझे

कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पाँव चूमूंगा
ज़माना लाख करे आ के संगसार मुझे

वो फाकामस्त हूँ जिस राह से गुज़रता हूँ
सलाम करता है आशोब-ए-रोज़गार मुझे

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