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धूप ये अठखेलियाँ हर रोज़ करती हैः दुष्यंत कुमार की जयंती पर 5 ग़ज़लें

दुष्यंत कुमार हमारे दौर के वह ऐसे ग़ज़लकार हैं जिनकी बातें मुर्दों में भी जान भर दे. आज उनकी जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़ें उनकी ये चुनी हुईं पांच ग़ज़लें-

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 01 September 2019
धूप ये अठखेलियाँ हर रोज़ करती हैः दुष्यंत कुमार की जयंती पर 5 ग़ज़लें ग़ज़लकार का मानः दुष्यंत कुमार की याद में जारी डाक टिकट

आज दुष्यंत कुमार की जयंती है. हमारे दौर के वह ऐसे ग़ज़लकार हैं जिनकी बातें मुर्दों में भी जान भर दे. हिंदी साहित्य के आकाश में सूर्य की तरह चमकते हैं दुष्यंत. उन्हें हिंदी गज़ल के क्षेत्र में जो मुकाम हासिल है वह कई दशकों में विरले कविय़ॉ को नसीब होती है. दुष्यंत कुमार का जन्म 01 सितंबर, 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनोर जिले में हुआ. उन्होंने हिंदी कविता जगत को ‘सूर्य का स्वागत’, ‘आवाज़ों के घेरे’, ‘जलते हुए वन का वसंत’ नामक कविता संग्रहों और ‘साए में धूप’ नामक ग़ज़ल संग्रह से एक अलग मुकाम पर पहुंचाया. दुष्यन्त एक महान ग़ज़लकार और कालजयी कवि हैं. उनकी ग़ज़लों की धमक सड़क से संसद तक गूँजती है.

आज उनकी जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़ें उनकी ये चुनी हुईं पांच ग़ज़लें-

1.
हो गई है पीर पर्वत


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

2.
धूप ये अठखेलियाँ हर रोज़ करती है


धूप ये अठखेलियाँ हर रोज़ करती है
एक छाया सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती है

यह दिया चौरास्ते का ओट में ले लो
आज आँधी गाँव से हो कर गुज़रती है

कुछ बहुत गहरी दरारें पड़ गईं मन में
मीत अब यह मन नहीं है एक धरती है

कौन शासन से कहेगा, कौन पूछेगा
एक चिड़िया इन धमाकों से सिहरती है

मैं तुम्हें छू कर ज़रा-सा छेड़ देता हूँ
और गीली पंखुरी से ओस झरती है

तुम कहीं पर झील हो मैं एक नौका हूँ
इस तरह की कल्पना मन में उभरती है

3.
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे


मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आयेंगे
इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आयेंगे

हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आयेंगे

थोड़ी आँच बची रहने दो थोड़ा धुँआ निकलने दो
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आयेंगे

उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
वे आये तो यहाँ शंख सीपियाँ उठाने आयेंगे

फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आयेंगे

रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढ़े तो शायद दृश्य सुहाने आयेंगे

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आयेंगे

हम क्यों बोलें इस आँधी में कई घरौंदे टूट गये
इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जायेंगे

4.
हालाते जिस्म, सूरते-जाँ और भी ख़राब


हालाते जिस्म, सूरते-जाँ और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब

नज़रों में आ रहे हैं नज़ारे बहुत बुरे
होंठों पे आ रही है ज़ुबाँ और भी ख़राब

पाबंद हो रही है रवायत से रौशनी
चिमनी में घुट रहा है धुआँ और भी ख़राब

मूरत सँवारने से बिगड़ती चली गई
पहले से हो गया है जहाँ और भी ख़राब

रौशन हुए चराग तो आँखें नहीं रहीं
अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब

आगे निकल गए हैं घिसटते हुए क़दम
राहों में रह गए हैं निशाँ और भी ख़राब

सोचा था उनके देश में मँहगी है ज़िंदगी
पर ज़िंदगी का भाव वहाँ और भी ख़राब
 
5.
मत कहो आकाश में कोहरा घना है


मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.

सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का,
क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है.

हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है.

दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नेपथ्य में सम्भावना है.

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