क्योंकि सपना है अभी भी, धर्मवीर भारती की स्वप्न व प्रेम कविताएं

ठंडा लोहा, अंधा युग, सात गीत वर्ष, कनुप्रिया, सपना अभी भी और आद्यन्त जैसे काव्य -संकलनों के रचयिता धर्मवीर भारती की पुण्यतिथि पर पढ़िए उनकी दो कालजयी कविताएं, क्योंकि सपना है अभी भी, तुम कितनी सुन्दर लगती हो

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aajtak.in नई दिल्ली, 04 September 2019
क्योंकि सपना है अभी भी, धर्मवीर भारती की स्वप्न व प्रेम कविताएं प्रतीकात्मक इमेज

अभी हाल के दिनों में एक सीरीज बड़ी पॉपुलर हुई थी, सेक्रेड गेम्स. इसमें मुख्य किरदार निभा रहे नवाजुद्दीन सिद्द्की ने बार-बार अहम ब्रह्मास्मी के साथ अपने को अश्वत्थामा कहा है. बड़े संपादक रहे धर्मवीर भारती ने कभी अपने काव्य नाटक 'अंधा युग' उसको बेहद सम्मनित ढंग से उभारा था. लेखन के लिए उन्हें पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी, भारत भारती, महाराष्ट्र गौरव और व्यास सम्मान सहित कई पुरस्कारों से नवाजा गया.

धर्मवीर भारती का जन्म 25 दिसंबर, 1926 को इलाहाबाद में और निधन 4 सितंबर, 1997 को  मुंबई में हुआ था. हिंदी साहित्य उनकी रचनाओं की एक धमक छोड़ चुके थे. उनकी प्रमुख कृतियों में कहानी संग्रह: मुर्दों का गाव स्वर्ग और पृथ्वी, चांद और टूटे हुए लोग, बंद गली का आखिरी मकान, सास की कलम से, समस्त कहानियां एक साथ; काव्य रचनाएं: ठंडा लोहा, अंधा युग, सात गीत वर्ष, कनुप्रिया, सपना अभी भी, आद्यन्त शामिल है.

आज उनकी पुण्यतिथि पर पढ़िए उनकी ये कालजयी कविताएं. पहली कविता का शीर्षक है-

1.
क्योंकि सपना है अभी भी

...क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
...क्योंकि सपना है अभी भी!

तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जब कि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा?)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
....क्योंकि सपना है अभी भी!

तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
वह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो

और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर तड़प कर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है - दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी

इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धुमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
... क्योंकि सपना है अभी भी!

2.
तुम कितनी सुन्दर लगती हो


तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास !
ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास
मदभरी चांदनी जगती हो !

मुँह पर ढँक लेती हो आँचल
ज्यों डूब रहे रवि पर बादल,
या दिन-भर उड़कर थकी किरन,
सो जाती हो पाँखें समेट, आँचल में अलस उदासी बन !
दो भूले-भटके सान्ध्य-विहग, पुतली में कर लेते निवास !
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास !

खारे आँसू से धुले गाल
रूखे हलके अधखुले बाल,
बालों में अजब सुनहरापन,
झरती ज्यों रेशम की किरनें, संझा की बदरी से छन-छन !
मिसरी के होठों पर सूखी किन अरमानों की विकल प्यास !
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
जब तुम हो जाती हो उदास !

भँवरों की पाँतें उतर-उतर
कानों में झुककर गुनगुनकर
हैं पूछ रहीं-‘क्या बात सखी ?
उन्मन पलकों की कोरों में क्यों दबी ढँकी बरसात सखी ?
चम्पई वक्ष को छूकर क्यों उड़ जाती केसर की उसाँस ?
तुम कितनी सुन्दर लगती हो
ज्यों किसी गुलाबी दुनिया में सूने खँडहर के आसपास
मदभरी चाँदनी जगती हो !

तुम कितनी सुन्दर लगती हो.

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