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पुण्यतिथि विशेषः 'बावरा अहेरी' से 'देवता अब भी' तक अज्ञेय की 5 श्रेष्ठ कविताएं

भारतीय साहित्य में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद अज्ञेय अकेले ऐसे साहित्यकार हैं, जिनका प्रभाव हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं और लेखकों के रचना कर्म पर पड़ा. आज अज्ञेय की पुण्यतिथि पर साहित्य आजतक के पाठकों के लिए अलग-अलग कालखंड में लिखी गई उनकी कुछ श्रेष्ठ कविताएं

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 04 April 2019
पुण्यतिथि विशेषः 'बावरा अहेरी' से 'देवता अब भी' तक अज्ञेय की 5 श्रेष्ठ कविताएं प्रतिकात्मक इमेज [ सौजन्य Getty Images ]

'उस साहित्य की कोर्इ प्रतिष्ठा नहीं हो सकती, जिसमें कोर्इ अस्मिता नहीं बोलती. जिससे हम बने हैं, उसे पहचानते हुए उसे अभिव्यक्ति दें तो वर्तमान और भविष्य हमारे हैं, नहीं तो हम कहीं के नहीं.' सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' ने केवल यह कहा ही नहीं था बल्कि इसे जीया भी. आज उनकी पुण्यतिथि है.   

भारतीय साहित्य में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को छोड़कर ऐसा कोई रचनाकार नहीं हुआ, जिसके व्यक्तित्व और रचनाकर्म को शब्दों में समेटना एक चुनौती भरा काम हो. अज्ञेय उन दुर्लभ रचनाकारों में से हैं, जिन्होंने इतना विपुल लिखा कि अपने जीवनकाल में ही किंवदंती बन गए. हिंदी साहित्य में अपने कुलीन लेखन के चलते लगभग आधी शताब्दी तक उन्होंने अपनी उपस्थिति को केंद्र में बनाए रखा.

'नदी के द्वीप' हो या 'शेखर एक जीवनी' अज्ञेय ने काव्य और गद्य दोनों ही विधाओं में अपना व्यापक प्रभाव छोड़ा. एक तरह से देखें तो भारतीय साहित्य में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद वह अकेले ऐसे साहित्यकार हैं, जिनका प्रभाव हिंदी के अलावा दूसरी भाषाओं और लेखकों के रचना कर्म पर पड़ा.

आज अज्ञेय की पुण्यतिथि पर उनकी अलग-अलग कालखंड में लिखी गई कुछ श्रेष्ठ कविताएं

1.

बावरा अहेरी

भोर का बावरा अहेरी

पहले बिछाता है आलोक की

लाल-लाल कनियाँ

पर जब खींचता है जाल को

बाँध लेता है सभी को साथ :

छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े-पंखी

डैनों वाले डील वाले डौल के बेडौल

उड़ने जहाज,

कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले

तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल धुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी

बेपनाह काया को :

गोधूली की धूल को, मोटरों के धुएँ को भी

पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्वि रूप-रेखा को

और दूर कचरा जलाने वाली कल की उद्दंड चिमनियों को, जो

धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देंगी!

बावरे अहेरी रे

कुछ भी अवध्य नहीं तुझे, सब आखेट है :

एक बस मेरे मन-विवर में दुबकी कलौंस को

दुबकी ही छोड़ कर क्या तू चला जाएगा?

ले, मैं खोल देता हूँ कपाट सारे

मेरे इस खँडर की शिरा-शिरा छेद दे आलोक की अनी से अपनी,

गढ़ सारा ढाह कर ढूह भर कर दे :

विफल दिनों की तू कलौंस पर माँज जा

मेरी आँखें आँज जा

कि तुझे देखूँ

देखूँ और मन में कृतज्ञता उमड़ आए

पहनूँ सिरोपे से ये कनक-तार तेरे-

बावरे अहेरी।

2.

मेरे देश की आँखें

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं

पुते गालों के ऊपर

नकली भँवों के नीचे

छाया प्यार के छलावे बिछाती

मुकुर से उठायी हुई

मुस्कान मुस्कुराती

ये आँखें-

नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं...

तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से

शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ-

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं...

वन डालियों के बीच से

चौंकी अनपहचानी

कभी झाँकती हैं

वे आँखें,

मेरे देश की आँखें;

खेतों के पार

मेड़ की लीक धारे

क्षिति-रेखा को खोजती

सूनी कभी ताकती हैं

वे आँखें...

उसने

झुकी कमर सीधी की

माथे से पसीना पोंछा

डलिया हाथ से छोड़ी

और उड़ी धूल के बादल के

बीच में से झलमलाते

जाड़ों की अमावस में से

मैले चाँद-चेहरे सकुचाते

में टँकी थकी पलकें

उठायीं-

और कितने काल-सागरों के तार तैर आईं

मेरे देश की आँखें...

3.

नया कवि : आत्म-स्वीकार

किसी का सत्य था,

मैंने संदर्भ से जोड़ दिया।

कोई मधु-कोष काट लाया था,

मैंने निचोड़ लिया।

किसी की उक्ति में गरिमा थी,

मैंने उसे थोड़ा-सा सँवार दिया

किसी की संवेदना में आग का-सा ताप था

मैंने दूर हटते-हटते उसे धिक्कार दिया।

कोई हुनरमंद था :

मैंने देखा और कहा, 'यों!'

थका भारवाही पाया-

घुड़का या कोंच दिया, 'क्यों?'

किसी की पौध थी,

मैंने सींची और बढ़ने पर अपना ली,

किसी की लगायी लता थी,

मैंने दो बल्ली गाड़ उसी पर छवा ली

किसी की कली थी :

मैंने अनदेखे में बीन ली,

किसी की बात थी।

मैंने मुँह से छीन ली।

यों मैं कवि हूँ, आधुनिक हूँ, नया हूँ :

काव्य-तत्त्व की खोज में कहाँ नहीं गया हूँ?

चाहता हूँ आप मुझे

एक-एक शब्द सराहते हुए पढ़ें।

पर प्रतिमा- अरे वह तो

जैसी आपको रुचे आप स्वयं गढ़ें।

4.

घृणा का गान

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

तुम, जो भाई को अछूत कह वस्त्र बचा कर भागे,

तुम, जो बहिनें छोड़ बिलखती, बढ़े जा रहे आगे!

रुक कर उत्तर दो, मेरा है अप्रतिहत आह्वान-

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

तुम, जो बड़े-बड़े गद्दों पर ऊँची दूकानों में,

उन्हें कोसते हो जो भूखे मरते हैं खानों में,

तुम, जो रक्त चूस ठठरी को देते हो जल-दान-

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

तुम, जो महलों में बैठे दे सकते हो आदेश,

'मरने दो बच्चे, ले आओ खींच पकड़ कर केश!'

नहीं देख सकते निर्धन के घर दो मुट्ठी धान

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

तुम, जो पा कर शक्ति कलम में हर लेने की प्राण-

'नि:शक्तों' की हत्या में कर सकते हो अभिमान!

जिनका मत है, 'नीच मरें, दृढ़ रहे हमारा स्थान'-

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

तुम, जो मंदिर में वेदी पर डाल रहे हो फूल,

और इधर कहते जाते हो, 'जीवन क्या है? धूल!'

तुम, जिस की लोलुपता ने ही धूल किया उद्यान-

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

तुम, सत्ताधारी, मानवता के शव पर आसीन,

जीवन के चिर-रिपु, विकास के प्रतिद्वंद्वी प्राचीन,

तुम, श्मशान के देव! सुनो यह रण-भेरी की तान-

आज तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

5.

देवता अब भी

देवता अब भी

जलहरी को घेरे बैठे हैं

पर जलहरी में पानी सूख गया है।

देवता भी धीरे-धीरे

सूख रहे हैं

उनका पानी

मर रहा है।

यूप-यष्टियाँ

रेती में दबती जा रही हैं

रेत की चादर-ढँकी अर्थी में बँधे

महाकाल की छाती पर

काल चढ़ बैठा है।

मर रहे हैं नगर-

नगरों में

मरु-थर-

मरु-थरों में

जलहरी में

पानी सूख गया है

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