जन्मदिन विशेषः आलोकधन्वा के कविता संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' से 5 चुनिंदा कविताएं

हमारे दौर के चर्चित लेखक एवं कवि आलोकधन्वा के जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनके प्रतिनिधि कविता संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' से चुनी हुई 5 कविताएं.

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aajtak.in नई दिल्ली, 02 July 2019
जन्मदिन विशेषः आलोकधन्वा के कविता संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' से 5 चुनिंदा कविताएं आलोकधन्वा के कविता संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' का कवर [ सौजन्यः राजकमल प्रकाशन ]

बारिश एक राह है
स्त्री तक जाने की

यह आलोकधन्वा की 'बारिश' शीर्षक वाली कविता की शुरुआती पंकित है. वह हिंदी के चर्चित जनकवि हैं, और आज उनका जन्मदिन है. आज ही की तारीख यानी जन्म 2 जुलाई, 1948 को बिहार के मुंगेरे जिले में उनका जन्म हुआ. कहा जाता है कि 70-80 के दशक में समकालीन हिंदी कविता में आलोकधन्वा एक धूमकेतु की तरह उदित हुए. उन्होंने आधुनिक हिंदी कविता, जो जनवादी और जनआंदोलनों की पक्षधर थी, को एक नई दिशा दी.

चर्चित कवि अरुण खरे ने लिखा था, "1970 के दशक का एक दौर ऐसा था जब आलोकधन्वा की गुस्से और बगावत से भरी रचनाएं अनेक कवियों और श्रोताओं को कंठस्थ थीं तथा उस समय के परिवर्तनकामी आंदोलन की सर्जनात्मक देन मानी गई थीं. आलोकधन्वा की ऐसी कविताओं ने हिंदी कवियों तथा कविता को कितना प्रभावित किया है, इसका मूल्यांकन अभी ठीक से हुआ नहीं है. श्रोताओं और पाठकों के मन-मस्तिष्क में प्रवेश कर उन्होंने कौन-से रूप धारण किए होंगे यह तो पता लगा पाना भी मुश्किल है."

वाकई आलोकधन्वा गोली दागो पोस्टर, जनता का आदमी, कपड़े के जूते और ब्रूनों की बेटियाँ जैसी अपनी कविताओं से खूब चर्चित हुए. उन्हें पहल सम्मान, नागार्जुन सम्मान, फ़िराक़ गोरखपुरी सम्मान, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, प्रकाश जैन स्मृति सम्मान से भी नवाजा गया.  हमारे दौर के इस चर्चित लेखक एवं कवि आलोकधन्वा के जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनके प्रतिनिधि कविता संग्रह 'दुनिया रोज़ बनती है' से चुनी हुई 5 कविताएं.

1.
छतों पर लड़कियाँ


अब भी
छतों पर आती हैं लड़कियां
मेरी जिन्दगी पर पड़ती है उनकी परछाइयाँ.

गो की लड़कियां आई हैं उन लड़कों के लिए
जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं.
नाले के ऊपर बनी सीढ़ियों पर और
फुटपाथ के खुले चायखानों की बेंचों पर
चाय पी रहे
उस लड़के को घेर कर
जो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन पर
आवारा और श्री 420 की अमर धुनें.

पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकान
सामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान अख़बार भी पढ़ रहे हैं.
उनमें सभी छात्र नहीं हैं
कुछ बेरोज़गार हैं और कुछ नौकरीपेशा,
और कुछ लफंगे भी

लेकिन उन सभी के खून में
इंतज़ार है एक लड़की का!
उन्हें उम्मीद है उन घरों और उन छतों से
किसी शाम प्यार आयेगा!

2.
रेल


हर भले आदमी की एक रेल होती है.
जो माँ के घर की ओर जाती है

सीटी बजाती हुई
धुआँ उड़ाती हुई.

3.
रास्ते


घरों के भीतर से जाते थे हमारे रास्ते
इतने बड़े आँगन
हर ओर बरामदे ही बरामदे
जिनके दरवाज़े खुलते थे गली में
उघर से धूप आती थी दिन के अन्त तक

और वे पेड़
जो छतों से घिरे हुए थे इस तरह कि
हम उन पेड़ों पर चढ़कर
किसी भी छत पर उतर जाते

थे जब हम बन्दर से भी ज्यादा बन्दर
बिल्ली से भी ज्यादा बिल्ली

हम थे कल गलियों में
बिजली के पोल को
पत्थर से बजाते हुए.

4.
पानी


आदमी तो आदमी
मैं तो पानी के बारे में भी सोचता था
कि पानी को भारत में बसना सिखाऊँगा

सोचता था
पानी होगा आसान
पूरब जैसा
पुआल के टोप जैसा
मोम की रोशनी जैसा

गोधूलि में उस पार तक
मुश्किल से दिखाई देगा
और एक ऐसे देश में भटकायेगा
जिसे अभी नक्शे में आना है

ऊँचाई पर जाकर फूल रही लतर
जैसे उठती रही हवा में नामालूम गुम्बद तक
यह मिट्टी के घड़े में भरा रहेगा
जब भी मुझे प्यास लगेगी

शादी में हो जायेगा और भी पतला
साफ़ और धीमा

किनारे पर उगे पेड़ की छाया में

सोचता था
यह सिर्फ शरीर के ही काम नहीं आयेगा
जो रात हमने नाव पर जगकर गुज़ारी
क्या उस रात पानी
सिर्फ शरीर तक आकर लौटता रहा?

क्या-क्या बताया हमने
जब से लिखना शुरू किया ?

उजड़ते हुए बार-बार
उजड़ने के बारे में लिखते हुए
पता नहीं वाणी का
कितना नुक़सान किया

पानी सिर्फ़ वही नहीं करता
जैसा उससे करने के लिए कहा जाता है
महज़ एक पौधे को सींचते हुए पानी
उसकी ज़रा-सी जमीन के भीतर भी
किस तरह जाता है

क्या स्त्रियों की आवाज़ों में बच रही है
पानी की आवाजें
और दूसरी सब आवाजें कैसी हैं ?

दुखी और टूटे हुए हृदय में
सिर्फ पानी की रात है ।
वहीँ है आशा और वहीं है
दुनिया में फिर से लौट आने की अकेली राह।

5.
चौक


उन स्त्रियों का वैभव मेरे साथ रहा
जिन्होंने मुझे चौक पार करना सिखाया!

मेरे मोहल्ले की थीं वे
हर सुबह काम पर जाती थीं
मेरा स्कूल उनके रास्ते में पड़ता था
माँ मुझे उनके हवाले कर देती थी
छुट्टी होने पर मैं उनका इंतज़ार करता था
उन्होंने मुझे इंतज़ार करना सिखाया.

कस्बे के स्कूल में
मैंने पहली बार ही दाखिला लिया था
कुछ दिनों बाद मैं
खुद ही जाने लगा
और उसके भी कुछ दिनों बाद
कई लड़के मेरे दोस्त बन गये
तब हम साथ-साथ कई दूसरे रास्तों
से भी स्कूल आने-जाने लगे

लेकिन अब भी
उन थोड़े से दिनों के कई दशकों बाद भी
जब कभी मैं किसी बड़े शहर के

बेतरतीब चौक से गुज़रता हूँ
उन स्त्रियों की याद आती है
और मैं अपना दायां हाथ उनकी ओर
बढ़ा देता हूँ और
बायें हाथ से उस स्लेट को सँभालता हूँ
जिसे मैं छोड़ आया था
बीस वर्षों के अखबारों के पीछे!

****
पुस्तकः दुनिया रोज़ बनती है
रचनाकारः आलोकधन्वा
विधा: कविता
प्रकाशनः राजकमल प्रकाशन
कीमतः रुपए 95/-
पृष्ठ संख्या: 96

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