उर्मिला शिरीष की कहानीः प्रार्थनाएं, मां के लिए एक बेटे की मार्मिक पहल

जब से उसने होश सँभाला है, माँ को एक हाड़-मांस की सेल्फ मशीन की तरह काम करते पाया है. सुबह पाँच बजे जब असंख्य परिन्दे समवेत स्वर में कलरव करके चारों तरफ संगीत की तान छेड़ देते, उनकी दिनचर्या आरम्भ होती और अनन्त रात्रि तक अनथक चलती रहती.

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aajtak.in नई दिल्ली, 23 May 2019
उर्मिला शिरीष की कहानीः प्रार्थनाएं, मां के लिए एक बेटे की मार्मिक पहल प्रतिकात्मक इमेज

‘‘अरे माँ... आपको क्या हो गया है?’’

‘‘बस बेटा... ऐसे ही चक्कर आ रहे हैं.’’ माँ का अनमना-सा विरक्ति भरा जवाब.

‘‘आपका चेहरा तो एकदम पीला पड़ गया है.’’ बेटा चिन्तित और उतावला हो उठा.

‘‘अभी दवा खा लूँगी.’’ माँ ने टालते हुए कहा. टालना ऐसा कि बेटा आगे सवाल न करे. पर बेटा अब टालने वाली मन:स्थिति को पहचान चुका है.

‘‘माँ, आपको अपने पर भी ध्यान देना चाहिए.’’ माँ की आँखों में बेचैनी की मछली तड़पी. उछली और फिर अदृश्य हो गयी. माँ ने समझा बेटा ने देखा नहीं, पर बेटा चुपके से देख लेता है.

‘‘क्या ध्यान दूँ बेटा...’’ माँ ने ऐसा कहा, मानो ये तकलीफें उसके लिए कोई मायने नहीं रखती हैं.

सचमुच क्या ध्यान दे पाती है माँ स्वयं पर. जब से उसने होश सँभाला है, माँ को एक हाड़-मांस की सेल्फ मशीन की तरह काम करते पाया है. सुबह पाँच बजे जब असंख्य परिन्दे समवेत स्वर में कलरव करके चारों तरफ संगीत की तान छेड़ देते... हल्का-सा उजाला चारों तरफ फैलने लगता, सूरज खरामा-खरामा सरकता-सा एक कमरे से दूसरे कमरे की खिडक़ी से अदृश्य होता जाता... दूधवाले घण्टियाँ बजाते सडक़ पर दिखाई देते, कुत्तों का समूह सडक़ पर दौड़ता नज़र आता, तब से... उनकी दिनचर्या आरम्भ होती और अनन्त रात्रि तक अनथक चलती रहती. हर मौसम की अँधेरी-उजली बेला में पानी भरना... अनदेखे... अनकहे... छोड़े... बिखरे... गन्ध-सुगन्ध से भरे... रसोई के काम निपटाना... पापा के लिए बिस्तर पर ही नींबू पानी... फिर चाय... फिर पेपर.. फिर नाश्ता देना... नहाने के पहले कपड़े निकालना... पानी की बोतल... टिफिन... गाड़ी की चाबी, यहाँ तक कि उनका सामान गाड़ी में रखना. पापा की हर फरमाईश पूरी करती माँ कई बार थकान से, गुस्से से या कमजोरी से गिरती... टकराती... झुँझलाती... अचकचाती... बड़बड़ाती... अपने लिए एक कप चाय पीने का समय नहीं निकाल पाती. वह जानता है माँ को सुबह-सुबह शीतल अलसायी और धूप के सौन्दर्य से नहायी छत पर घूमना पसन्द है. माँ को सूर्योदय के साथ बरामदे में बैठकर पेपर पढऩा पसन्द है... माँ सुबह-सुबह रेडियो सुनना पसन्द करती थी, बल्कि उसने देखा था कई बार तो माँ बच्चों की तरह दौड़ती... खेलती... कूदती... साईकिल चलाती नज़र आती थी... पर वही खिलखिलाती, गुनगुनाती, दौड़ती-भागती... हँसती माँ आज एकदम थकी और पस्त नज़र आती है. उनके गुलाबी गाल आज कितने दुबले, चपटे और चितकबरे से नज़र आते हैं. उनके रेशमी बाल आधे से ज्य़ादा झड़ कर सफेद हो चुके हैं. उनकी आकर्षक तराशी... देह बेडौल, थुलथुल और मोटी हो चुकी है. बीच-बीच में आते मेहमान, दोस्त जिनकी फरमाईशें माँ के लिए मुसीबतें लेकर आती हैं. इन मुसीबतों का कोई नाम नहीं होता, न कोई चेहरा-

‘‘अरे सरिता, तुम्हारे हाथ के बने मैथी के पराठे खाने हैं....’’ पहला कहता.

‘‘ज्वार की रोटी खाने का मन कर रहा है....’’ दूसरा कहता.

‘‘चाय के साथ थोड़े भजिये भी बना लेना.’’ तीसरा कहता.

जैसे माँ को इसके अलावा कुछ आता ही न हो.

‘‘ये रोटियाँ बाई ने बनायी हैं... उसके हाथ का खाना गले के नीचे नहीं उतरता.’’ उधर हर दूसरे दिन पापा खाने की थाली सरकाते हुए कहते. तब वह... न चाहते हुए भी टोकने को विवश हो जाता. हद तो तब होती जब पापा कभी भी किसी भी दिन ऑफिस से फोन पर कहते-

‘‘सरिता, शाम को चार-पाँच दोस्त आ रहे हैं.’’

‘‘बताना तो था....’’ माँ लाचार अविरोधी होकर रह जाती. मना करने का मतलब यानी हंगामा होना.

‘‘तुम्हें क्या करना है?’’ उधर से झुँझलाती आवाज़ आती. पापा को ना सुनने की आदत नहीं है. उनकी बात का, आदेश का पालन होना ही चाहिए.

‘‘पापा, आपकी फरमाईशें कभी पूरी नहीं होतीं... आप तो बोलते ही जाते हो... माँ को यही सब करना पड़ता है, दूसरों के सामने वे कुछ कह भी नहीं पाती हैं, आपको अपने दोस्तों की खुशी की परवाह है, पर कभी उनके बारे में सोचा?’’ वह झुँझला उठता. उसे आश्चर्य होता कि पापा को माँ की चिन्ता क्यों नहीं होती. उनकी थकान... उनकी रुचि-अरुचि क्यों नहीं दिखती. उन्हें क्या अच्छा लगता है क्या बुरा... पापा क्यों नहीं सोचते! वे... उनकी तकलीफ को क्यों महसूस नहीं करते!  

फिर वह देखता... माँ... दिन भर सब्जियाँ धोने, काटने, छीलने, छौंकने, बघारने, सजाने-सहेजने में लगी है. क्रॉकरी की सफाई-धुलाई-पुछाई में लगी है. ढलती शाम जब माँ को घूमना, टहलना अच्छा लगता है... जब माँ को न्यूज़ सुनने की तलब लगती... जब माँ का पसन्दीदा सीरियल आ रहा होता, जब माँ का कोई नाटक या संगीत का प्रोग्राम देखने-सुनने का मन होता तब... पापा के दोस्तों का जमघट लगा है... सबकी पसन्द की चीज़ें बनायी-परोसी जा रही हैं.... उनकी सेहत और खूबसूरती को लेकर हँसी-मज़ाक किया जा रहा है. क्योंकि माँ.. हमेशा पापा के लिए एक ‘औरत’ रहती है.

औरत जिसका मज़ाक बनाया जाना... जिसे छेडऩा... जिसे गरियाना... जिसे खरीदना-बेचना सब ... जायज हो! सारा माहौल एकदम अलग मदमस्त. धुआँ-धुआँ! सुरूर से छलकता... महकता. और माँ... माँ का चेहरा... उतरता जा रहा है. फीकी पड़ती मुस्कराहट को बार-बार बटोरती माँ असहज होने लगती, तब पापा की व्यंग्यकारी हँसी उन्हें सजग... बना देती है! कभी माँ हँसती... कभी हँसने... मुस्कराने का अभिनय करती माँ... अकेली अपने बिस्तर पर नीम बेहोशी में पड़ी... नज़र आती थकी-हारी. ये हज़ारों शामों-रातों की कहानी है.... अब इस कहानी का अंत होना चाहिए... उसके दिमाग में नये-नये आइडिया आ रहे हैं...

‘‘माँ, मैंने आपके लिए कुछ सोचा है.’’ वह माँ के कंधे दबाता, पीठ पर मालिश करते हुए कहता. जानता है... माँ अपने दर्द की शिकायत नहीं करेगी! काश माँ शिकायत करना जानती!

‘‘क्या?’’ उनकी भारी पलकें खुलती नहीं हैं.

‘‘आप मेरे साथ जिम जाना शुरू कर दो.’’

‘‘मैं और जिम....’’ माँ चकित-सी हैं देखती उसका चेहरा. युवा होते बेटे का चमकता-दमकता... चेहरा!

‘‘आपका फिट रहना ज़रूरी है. कितनी औरतें आती हैं. न तो आप सुबह घूमने जा पाती हो, न शाम को. कुछ तो करना होगा माँ अपनी सेहत को लेकर.’’

‘‘मुझसे नहीं होगा....’’ माँ के भीतर बैठी कमजोर औरत उन्हें हताश कर रही है.

‘‘होगा माँ... होगा. आप कोशिश तो करो....’’ कई दिनों तक लगातार बहुत समझाने के बाद वह माँ को अपने साथ जिम लेकर जाने लगा है. माँ उसको बहुत मानती है शायद इसीलिए!

‘‘आप भी सूट और जीन्स पहना करो माँ... कितनी स्मार्ट लगोगी....’’ वह मुस्कराता है. एक मोहक और आत्मीय मुस्कान. अलौकिक और पवित्र मुस्कान! विश्वास दिलाती मुस्कान.

‘‘इस उम्र में....’’ माँ और भी आश्चर्य में डूब जाती है. बेटा उनके थके अवसाद में डूबे मन... और लापरवाही से ठुकराये गये तन को नये साँचे में ढालना चाहता है.... चाहता है माँ अपने पुराने समय में, पुराने रूप में, पुरानी दुनिया में लौट जायें. रंगों... खुशबुओं और उल्लासों से भरे समय में!

‘‘तो क्या हुआ... आप कितनी खूबसूरत लगती थी. आप नाटकों में काम करती थीं ना, आप मिस कॉलेज रही थीं और कविताएँ भी लिखती थीं... फिर ऐसा क्या हुआ माँ... कि आप ऐसी हो गयीं, सब कुछ छोड़ दिया आपने!... आपने अपना सत्यानाश जो होने दिया माँ... मैंने आपके पुराने फोटो देखे हैं. माँ, आप खुद को महत्त्व देंगी तो सामने वाला आपको महत्त्व देगा. सब जानते हैं आप तुरन्त पिघल जाती हो, बात मान जाती हो... सबको लगता है आप कहीं नहीं जाओगी, कुछ नहीं कहोगी तो सबको लगता है कि आपको जैसा चाहो वैसा यूजा कर लो. दो दिन चुप रहकर देखो माँ... ‘ना’ कहना सीखो माँ. नकारना सीखो. आप कितनी अच्छी हो माँ... आप नहीं जानतीं.’’

वह माँ का आत्मविश्वास बढ़ा रहा है. वह माँ को समय की पटरी पर दौड़ाना चाहता है... वह चाहता है माँ हवाओं के साथ... परिन्दों के साथ अपने मन को उड़ायें... न कि गिरें. डगमगायें. उसके दिल-दिमाग पर अनेक चोटें हैं... जो गाहे-बगाहे पापा के द्वारा पहुँचायी गयी हैं.... वह उन जुमलों को सुनकर सिहर उठता है- ‘तुम तो ढल गयी हो... बुढिय़ा लगने लगी हो... इस बुढ़ापे में ये पहनोगी...’ और पापा की न थमने वाली वो क्रूर हँसी... ठहाके... सबके बीच मज़ाक उड़ाता उनका वो शैतान चेहरा.... वह कैसे तो कसमसाकर रह जाता. कैसा तो उसका मन रोने-रोने को होता... कैसे वह स्वयं को रोक पाता है....

अब वह माँ के साथ शॉपिंग करने जा रहा है... खिले रंग के सूट... आधुनिक... नये फैशन के कपड़े-जूते. ब्यूटी पार्लर पर जाकर उनके बालों की कटिंग, चेहरे की मसाज.... उसने देखा था... पतझड़ आने पर पत्ते पीले पडक़र झड़ते हैं और वही सूखा... पीला... मुरझाया वृक्ष पुन: हरा-भरा हो जाता है... लहलहाती शाखें... मर्मर करते पत्ते... खिले-खिले फूल.. जब... प्रकृति बदल सकती है तो माँ क्यों नहीं. माँ को रूपान्तरित करने के लिए कल्पना उसने यहीं से की थी. क्योंकि वह माँ को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ और सुन्दर स्त्री बना देना चाहता है. वह माँ को हँसते, खेलते, मुस्कराते, खिलखिलाते और गुनगुनाते हुए देखना चाहता है. वह चाहता है माँ जहाँ से गुज़रे अलग-सी और विशिष्ट दिखे. वह उनके मन... आत्मा और हृदय में जीवन की खुशबू बिखेर देना चाहता है. कई बार उसे लगता माँ... एक नन्ही-सी नाजुक... भोली-भाली... बच्ची है, जिसे ढेर से प्यार और देखभाल की ज़रूरत है....

‘‘माँ, आपको सुबह-सुबह सोना पसन्द है. कल से आप मत उठना. मैं पानी भर दिया करूँगा. दूध गरम कर दिया करूँगा.’’ और सचमुच ही दूसरे दिन से वह माँ को बच्चों की तरह सुला रहा है... कोई शोर उन तक न पहुँचे. कोई उन्हें परेशान न करे.... शोर की कोई आवाज़ वहाँ तक न पहुँचे....

‘‘पापा, माँ को मत जगाना.’’ वह पहली हिदायत पापा को देता.

‘‘क्यों! क्या तबियत खराब है?’’

‘‘उन्हें सुबह ही नींद आती है. बेचारी ठीक से सो भी नहीं पाती है.’’

‘‘मेरी चाय कौन बनायेगा... सुबह से इतने लोग आते हैं, दूधवाला, बाईयाँ... और बाकी लोगों को कौन झेलेगा?’’ पापा का गुस्सा बढऩे लगता है.

‘‘आप खुद बना लिया करो ना अपनी चाय और बाई किसलिए है.’’

‘‘मैं चाय बनाऊँगा... दिमाग खराब हो गया है तेरा!’’ घर का प्रथम शक्तिशाली पुरुष यानी पापा का स्वर रूखा, तीखा और क्रोधाभिभूत हो उठता है.

‘‘मैं बना दिया करूँगा... बस.’’ वह बात को खत्म करने के लिए कहता.

‘‘माँ का चमचा! साला!... मेरे खिलाफ माहौल बना रहा है.’’ उसके कानों में पापा के शब्द चोट पहुँचा रहे हैं. उसे घायल कर रहे हैं. पलटकर बोलना ज़रूरी है....

‘‘सुनो पापा, तमीज से बोला करो.... मुझे माँ की तरह ट्रीट मत करना. मैं देखता आ रहा हूँ... इसीलिए बोल रहा हूँ. माँ को नौकरानी बनाकर रखा है आपने. कभी ध्यान दिया उनकी तरफ.... कितनी बीमारियाँ हो गयी हैं उन्हें. क्या से क्या हो गयी हैं वे. पर आप क्यों सोचोगे...?’’

आज उसका मन अपनी तमाम भड़ास... तमाम क्षोभ और तमाम घृणा निकाल देना चाहता है. वह माँ के लिए आकाश का टुकड़ा बनकर उन्हें किसी कोमल फूल की तरह धूप-गरमी... आँधी-तूफान... बारिश से बचा लेना चाहता है. वह माँ के लिए नरम... गुलगुली ज़मीन तैयार कर देना चाहता है. वह माँ के लिए... सब कुछ पापा को, परिवार को, आसपास की दुनिया को, यहाँ तक कि ब्रह्माण्ड तक को बदल देना चाहता है.... और अरसे बाद वह देख रहा है... माँ उबर रही है. माँ बोल रही हैं... भीतर को धीरे-धीरे ही सही पर उड़ेल रही हैं... कदम बढ़ा रही है अपने नये चमकीले सुन्दर जीवन की ओर... उनके गालों पर चमक लौट रही है... उनकी आँखों में दीप जल उठे हैं... उनकी देह... हल्की और स्वस्थ हो रही है.... उनकी बातों में, व्यवहार में, चाल-ढाल में नजाकत और नफासत दीखने लगी है.... उनके चारों तरफ एक खूबसूरत सा पर मजबूत घेरा बनता जा रहा है.

‘‘आपने कभी गलत बातों का विरोध भी नहीं किया माँ, गालियाँ... मार... अपमान... कब से सहती आ रही हो... कब तक सहोगी... और क्यों माँ, कोई यकीन करेगा कि... ’’
वह... माँ के आँसुओं को समेट रहा है अपनी लम्बी मजबूत उँगलियों के पोरों में- ‘‘आपको बुरा नहीं लगता... कैसे सुन लेती हो...?’’

‘‘लगता है. बेटा बहुत बुरा लगता है, आत्मा छलनी हो जाती है, मन आत्मग्लानि से भर उठता है कि क्यों यह सब सुनती रही हूँ, क्या मजबूरी थी. जिंदा रहने की! पेट भरने की! समाज में स्वयं को सुखी विवाहित स्त्री दिखाने की, पर सब सोचने के बाद यही ध्यान में रहता है कि मेरे बाद तुम सबका क्या होगा? कौन तुम लोगों का ख्याल रहेगा और कौन है तुम्हारे अलावा... जिसके लिए मैं स्वयं को दिलासा देती रही, स्वयं के होने का अर्थ खोजती रही. पर अब तक कोई साथ देने वाला नहीं था इतने लोगों के बीच... मैं अकेली जो थी.’’ माँ का गला रुँधता जा रहा है. आँखों के सामने बादलों की चादर बिछ गयी है. चादर फडफ़ड़ा रही है... आँसुओं के सरोवर में कमल खिलने को तैयार है.

‘‘आजकल बेटे के साथ मेरे खिलाफ मोर्चा खोल लिया है!’’ पापा का छोड़ा तीर... माँ को जा लगा है.

‘‘तुम्हारे खिलाफ नहीं, मैं तो खुद को सँवारने की कोशिश कर रही हूँ.’’

‘‘ऐसा कौन-सा दु:ख है तुम्हारे जीवन में! झूठी सहानुभूति पाने के ये चोंचले....’’

‘‘सुख भी तो नहीं है....’ माँ इन दिनों बहस नहीं करती हैं. बस छोटा-सा जवाब देकर चुप लगा जाती हैं.

अनचाहा तनाव... धुआँ बनकर उड़  रहा है... उन दोनों के दरम्यान.... आदेश, आज्ञा और मनमानी की दीवारें दरक रही हैं. हाँ, इन बातों को हवा लगी तब और ज्य़ादा... जब इस बीच पापा का एक्सीडेण्ट हो गया. लगा पापा मौत से लडक़र उठे हैं. पल भर में दुनिया बदल गयी है.

घर में कोहराम-सा मच गया। माँ तो जैसे पागल-सी हो गयी है. सारा घर भरा है.... नाते-रिश्तेदार, मित्र. सबकी बातें. सबकी चिन्ताएँ. गहरी चिन्ताएँ. दुनिया भर के सुझाव. सुझावों की प्रतिस्पर्धाएँ! सबके अपने बहुत करीब होने के दावे. दावों की अदायगी और दिखाईगिरी.

‘‘भइया, मैंने आपके लिए मन्नत माँगी है... आपको मेरे साथ मन्दिर चलना होगा.’’

‘‘राजू, मैंने तेरे लिए सोलह शुक्रवार के व्रत रखे हैं.’’

‘‘भइया, हम लोग आपके लिए प्रसाद भेज रहे हैं...’’

‘‘अपनी सेहत का ध्यान रखना... सरिता, तुम्हें राजू का ध्यान रखना चाहिए. देखो तो क्या हाल हो गया है.’’

‘‘पूरा ध्यान आपको भइया पर देना है. फिलहाल सब छोड़-छाड़ दीजिए.’’

‘‘आप लोगों को क्या लगता है, माँ पापा का ख्याल नहीं रखती?’’

‘‘अब और ज्य़ादा ध्यान रखना होगा ना!’’

‘‘इन्हीं को समझाओ कि अपना ख्याल स्वयं भी रखा करें....’’ वह जानबूझकर जवाब दे रहा है. वह माँ की चुप को तोड़ रहा है.

वह पापा को उतना ही प्यार करता है जितना माँ को... पर माँ की इस घर में आज तक वो जगह नहीं बन पाई जो पापा की है... जो उनके घरवालों की है... जो उनके दोस्तों की है... जो उनके रिश्तेदारों की है. वे जब चाहे पराये घर की बेटी बना दी जाती है. ‘परायी’ कह दी जाती है. ‘परायी’ कहकर कभी भी उन्हें परिवार के अहम निर्णयों से बेदखल कर दिया जाता है. पापा के परिवार की औरतें गुपचुप बातें करती हैं. पूजा-पाठ करती हैं... पापा के पास बैठकर एक अलग दुनिया बना लेती हैं और माँ को यूँ तिरस्कृत कर देती हैं, गोया वो कुछ है ही नहीं.

‘‘पापा, इतने दिनों से माँ आपकी सेवा में लगी है. पता है, कितने दिनों से ठीक से सोयी तक नहीं. सब लोग उन्हीं को आकर नसीहतें दे रहे हैं. जबकि आपकी हालत के लिए कौन जिम्मेदार है? आप न.... उस दिन शराब पीकर गाड़ी चला रहे थे न....’’ उसका स्वर ऊँचा और ऊँचा होता जा रहा है. जिस सचाई के नीचे निर्दोष माँ को पीसा जा रहा है, वह उस सचाई को, सचाई की नंगाई को सबके सामने लाना चाहता है. पापा का झूठ और माँ का सच... क्यों उल्टा हो जाता है... क्यों पापा... वैसे ही माँ का हाथ थामकर नहीं कहते- ‘चिन्ता मत करो...’ जैसे अपने भाइयों से कहते हैं, जैसे अपनी बहिनों से कहते हैं - जो दूर बैठी पापा को घण्टों समझाती रहती हैं - जैसे वे अपने आत्मीयों से कहते हैं. क्यों पापा... माँ को आज तक अपना नहीं बना सके. क्यों उनके रिश्ते दिखावटी और स्वार्थ से भरे हैं... क्या है, जो उन्हें माँ से दूर और अलग कर देता है. माँ से जन्मा वह उनके खानदान का हो गया, उनका सेवक हो गया और माँ वहीं की वहीं है... दूसरे खानदान की, दूसरे घर की!

पापा के स्वस्थ होने के लिए प्रार्थनाएँ की जा रही हैं.... दुआएँ दी जा रही हैं. मन्दिरों में प्रसाद चढ़ाये जा रहे हैं. सत्यनारायण कथा करवायी जा रही है. महामृत्युंजय का जाप करवाया जा रहा है.... वह देख रहा है... देखता आ रहा है कि माँ पूजा करती हैं. मन्दिर जाती है. व्रत-त्योहार करती है. हम सबके लिए. पापा के लिए। वह जानता है हम सबके लिए माँ हर पल जीती है. हम सबके समय के साथ सोती है... जागती है.... हम सबकी खुशी से खुश होती हैं. हम सबकी मुस्कान देखकर मुस्कराती हैं. हम सबकी परेशानी से परेशान हो उठती हैं... हम सबकी पसन्द का खाना बनाती है, खाती है. और हम सब... माँ के लिए क्या करते हैं... वह गुस्से में बड़बड़ा रहा है. जो आदमी चौबीस घण्टे उनका बुरा करने... मज़ाक उड़ाने... नीचा दिखाने के अलावा कुछ नहीं करता... उसके लिए सब कुछ किया जाता है... और जो माँ हर पल उनके लिए लगी रहती है, उन्हीं को अपराधी की तरह पेश किया जा रहा है. यह माँ का अपमान है... यह माँ की उपेक्षा है... यह माँ की तपस्या का मज़ाक है. सारा परिवार एक तरफ और दूसरी तरफ माँ अकेली....

‘‘माँ, कल से एक नर्स आयेगी पापा की देखभाल के लिए.’’ उसकी आवाज़ की दृढ़ता के आगे माँ निरुत्तर रहती है.

‘‘पर बेटा... सब क्या कहेंगे...?’’

‘‘मैंने कह दिया न. आपको सबकी परवाह क्यों रहती है? आप अपनी परवाह करना सीखो माँ. आपने पापा के लिए कोई पूजा रखी है न? पहले भी करवा चुकी हो.’’

‘‘हाँ, पंडित जी कर रहे हैं. मन्दिर में ही.’’

‘‘आपको लगता है पापा बदलेंगे...?’’

‘‘ईश्वर ने उन्हें नया जीवन दिया है... बेटा!...’’

‘‘मैं भी उन्हें प्यार करता हूँ माँ... मुझे भी उनकी चिन्ता रहती है... पर... उनकी आदतें... उनकी भाषा... उनका रवैया....’’ उसकी आवाज़ काँप रही है.... दु:ख से भरा वह... माँ का पक्ष रखना चाहता है. माँ के लिए भी वही सब चाहता है, जो पापा के लिए होता आया है या पापा अपने लोगों के लिए करते हैं या इस परिवार के लोग सिर्फ पापा के लिए करते हैं. पापा का यह दोहरा व्यवहार उसे सहन नहीं होता. पापा के दो चेहरे क्यों हैं... क्यों! पापा मालिक... माँ नौकर, पापा हुक्मरान... माँ सेवक... पापा सच्चे माँ झूठी... पापा सब कुछ... माँ नाकुछ....

‘‘बेटा...! तू मेरे लिए इतना टेंशन क्यों लेता है...?’’

‘‘कल आपका चैकअप होना है. आपको भी ठीक रहना है माँ!’’

‘‘समझती हूँ... बेटा, मैं ठीक हूँ.’’

‘‘आपकी सेहत के लिए मैं....’’ कहते-कहते रुक जाता है वह.... पिछले वर्षों में माँ एक न एक मुसीबत से घिरी रही हैं. कभी गिरी हैं तो कभी बीमार पड़ी हैं तो कभी बुरी खबर उन्हें झिंझोड़ देती है. उनके ग्रह खराब चल रहे हैं या उनका समय! अगर ईश्वर या कोई शक्ति पापा को ठीक कर सकती है तो... माँ को भी ठीक कर सकती है...! वो परमात्मा... वो ईश्वर जो शक्ति... माँ का भी रक्षाकवच बन सकती है...

दूसरे दिन... सबने देखा... घर में एक पंडित जी आये हुए हैं.... पूजा की सामग्री रखी हुई है. वह व्यस्त है.... उसके चेहरे पर गम्भीरता के भाव... जमे हुए हैं. उसकी आँखें शान्त और सुन्दर भावों में डूबी हैं! उसके लम्बे-लम्बे हाथ... पूजा की सामग्री को सुन्दर ढंग से थालों में सजा रहे हैं. किसी की तरफ देख भी नहीं रहा है.... उसने अपने आसपास खामोशी का सघन घेरा बना लिया है... जिसमें कोई प्रवेश न कर पाये... सिवा माँ के!

‘‘यह पूजा किसके लिए करवा रहे हो, बेटा?’’ पापा की तरफ से सवाल आता है.

‘‘माँ के लिए....’’ वह हल्के-से मुस्कराता है.

‘‘माँ के लिए....’’ सब अचरज में हैं. कुछ-कुछ उखड़े हुए. नाराज़ से.... बीमार पिता से ज्य़ादा... माँ की चिन्ता है इसे.... क्या हो गया है इसे....

‘‘क्यों माँ के लिए पूजा-पाठ, हवन-पूजन नहीं किया जा सकता. आपके लिए तो बड़ी-बड़ी पूजाएँ तो हो ही हैं ना....’’ वह विनम्र किन्तु दृढ़ आवाज़ में हुए बोला. चारों तरफ फूलों की महक है. धूप, चन्दन, अगरबत्ती की गंध फैल रही है....

‘‘अभी तक तो ऐसा सुना नहीं. हम तो सोच रहे थे तुम पापा के लिए पूजा करवा रहे हो. इस समय तो पापा के लिए ज्य़ादा ज़रूरत है पूजा-पाठ की. आखिर तुम्हारी माँ को ऐसा क्या हुआ है?’’ कहने वालों की आवाज़ में तल्खी उतर आती है. ईर्ष्या और दुत्कार का भाव भी!

‘‘पापा के लिए जाप चल रहा है न... वो भी महामृत्युंजय जाप! माँ हम सबके लिए सालों से यह सब करती आ रही है. क्या मुझे माँ के लिए नहीं करना चाहिए... माँ भी सुरक्षित और स्वस्थ रहें... क्या बुराई है....’’ उसकी सख्त और निर्णायक आवाज़ सुनकर सब खामोश हो जाते हैं.... सबको लगता है... उसके मन में माँ के लिए... कुण्ठा पैदा हो गयी है... वह आहत और असुरक्षित महसूस कर रहा है. वह सबके सामने माँ की इज्जत बढ़ाना चाहता है. शायद माँ को पापा के बरक्स खड़ा करना चाहता है. माँ-पापा के बीच दरार पैदा करना चाहता है. वह जताना चाहता है कि इस घर में उसी को इस औरत यानी अपनी माँ की चिन्ता है.... वह साबित करना चाहता है कि वह सच्चा, समर्पित और फिक्रमन्द बेटा है... वह ताकीद करना चाहता है कि तुम सब माँ को अकेला मत समझना... पर नहीं... वह तो पंडित के सामने बैठा है... आँखें मूँदे... हाथ जोड़े, सिर झुकाये, ध्यान में लीन, सचमुच प्रार्थना कर रहा है... संकल्प ले रहा है माँ पापा को एकात्म करने का. उन्हें करीब लाने का... उनके बीच... प्रेमाभाव प्रस्फुटित करने का! लोग क्यों नहीं समझते कि वह माँ-पापा के बीच कोई दरार नहीं डालना चाहता है, बल्कि वह चाहता है, जिस माँ की पवित्र मिट्टी में पापा का बीज पड़ा था... उसकी उत्पत्ति का वह प्रतिरूप है... दो शरीरों का एक शरीर... एक मन... एक आत्मा... उसके लिए माँ-पापा धरती हैं, आकाश हैं, समन्दर हैं, हवा हैं, धूप हैं... पानी हैं... उन दो अलग... शरीरों से उत्पन्न वह ‘जीव’ अनवरत कोशिश कर रहा है... अपने माध्यम से... जोडऩे का, जुडऩे का... और ये लोग हैं कि माँ-पापा को विलग किनारों पर खड़ा देखना चाहते हैं. नहीं... वह ऐसा नहीं होने देगा. वह माँ की हर इच्छा को पूर्ण करना चाहता है.
 
उसके भीतर प्रार्थनाओं के आदिम, शान्त, पवित्र स्वर अविरल प्रवाहित हो रहे हैं और बाहर... उसके आसपास के वातावरण में गूँज रही है मंत्रों की पावन, मधुर सांगीतिक ध्वनि! [समाप्त]

# संपर्कः ई-115/12, शिवाजी नगर, भोपाल-462003, मो: 093031-32118, ई-मेल urmilashirish@hotmail.com

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