जन्मदिन विशेषः डॉ कुसुम खेमानी की कहानी- वक़त एक साधारण औरत की

डॉ कुसुम खेमानी के जन्मदिन पर समाज के पारिवारिक ऊहापोह को दर्शाती उनकी एक कहानी साहित्य आजतक पर पढ़िए. यह कहानी उनके राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित 'सच कहती कहानियां' नामक संकलन से ली गई है.

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aajtak.in नई दिल्ली, 20 September 2019
जन्मदिन विशेषः डॉ कुसुम खेमानी की कहानी- वक़त एक साधारण औरत की सच कहती कहानियां का कवर [राजकमल प्रकाशन]

लेखिका डॉ कुसुम खेमानी का जन्म 19 सितंबर, 1944 को हुआ. उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हासिल की. उनकी रचनाओं में 'हिन्दी नाटक के पांच दशक' आलोचना 'सच कहती कहानियां', 'एक अचम्भा प्रेम', 'अनुगूंज जि़न्दगी की' कहानी-संग्रह, 'एक शख्स कहानी-सा' जीवनी, 'कहानियां सुनाती यात्राएं', यात्रा-वृत्तान्त, 'कुछ रेत... कुछ सीपियां... विचारों की', ललित निबंध, 'लावण्यदेवी', 'जडिय़ा बाई' उपन्यास आदि शामिल हैं.
डॉ. खेमानी को लेखन जगत में उनके योगदान के लिए कुसुमांजलि साहित्य सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, हरियाणा गौरव सम्मान, भारत निर्माण सम्मान, रत्नादेवी गोयनका वाग्देवी पुरस्कार, पश्चिम बंग प्रान्तीय मारवाड़ी सम्मेलन पुरस्कार, कौमी एकता पुरस्कार, भारत गौरव सम्मान, समाज बन्धु पुरस्कार से नवाजा गया था.
'वक़त एक साधारण औरत की' एक ऐसी कहानी है जो ग्रामीण परिवेश के विविध शेड्स को उजागर करती है. इस कहानी में  अनुभवों और एहसासों की सूक्ष्मता और अन्तरंगता से सामाजिक जीवन की वास्तविकता को तो बतलाया ही गया है साथ ही उन स्थितियों के कड़वे सच्चाई के पुट को भी सिद्दत के साथ कहानी के कैनवास पर उकेरा गया है.
डॉ कुसुम खेमानी के जन्मदिन पर समाज के पारिवारिक ऊहापोह को दर्शाती उनकी एक कहानी साहित्य आजतक पर पढ़िए. यह कहानी उनके राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित 'सच कहती कहानियां' नामक संकलन से ली गई है.

कहानीः वक़त एक साधारण औरत की
‘‘नब्बे बरस पहले ‘बापोड़े’ गांव में चार हजार रुपये लगाकर कुआं खुदाया था चुनिया बुआ नै इतना बढ़िया कि आज भी लोग असीसे सैं.’’
‘‘अरे भई! उसकी के बात?...वा तो देबी थी देबी....उसकी तो किस्ससे होड़ तुलना नहीं हो सकै? सारी दुनिया का दु:ख-दरद उसनै जीसा व्याप्प छूता था, उस्सा कोई सोच भी सकै स कै?’’
‘‘वा? और विधवा? माथा खराब सै कै थारा? उससे बड़ी सुहागन कौण और उससे बड़ी माँ कोण?’’
इन अलंकृत वाक्यों से घिरी अंजलि ने झुंझलाकर मां से पूछा, ‘‘आखिर ये चुनिया बुआ हैं कौन? जिसको देखो, उसी का राग अलापे जा रहा है. जब से यहां आई हूं ‘बोर’ कर दिया आप लोगों ने उनके गुण गा-गाकर, आखिर यह बला है कौन?’’
‘‘ऐ! छोरी जबान नै लगाम दे. इतनी ओछी खराब बोली बुआ के वास्ते? भगवान भी माफ नहीं करैगा.’’
‘‘अरे ओ परसै की मां! थम आप ज़रा-सी दाल चलाइओ...मैं इसनै बताऊं कि कोण कौन थी चुनिया बुआ.’’
अंजलि का किस्सा लोभी मन नाच उठा. वैसे भी इस सड़े से भिवानी नगर में करने-धरने को तो कुछ था नहीं. बस, हवेली में इधर से उधर चक्कर लगाते रहो. कोई आ जाए तो पैर छूकर प्रणाम कर लो और जाते वक्त बड़े ‘दरवज्जे’ तक छोड़ आओ. अपनी उम्र के लड़के-लड़कियों में कुछ तो उसे बहुत ही उद्दंड और हेकड़ लगते और कुछेक एकदम दब्बू. दब्बू किस्म के उसकी ऊंची पढ़ाई और शहरी तौर-तरीकों से आतंकित दिखते तो हेकड़ किस्म के बेबात उसकी खिल्ली उड़ाते हुए. ऐसों से दोस्ताना बातचीत कैसे हो?
वह जबसे यहां आई है, अपने भावुक मन को कोसती रहती है जिसके कारण उसने अपनी ‘शैराक्रूज’ अमेरिका की भारी-भरकम कमाऊ डिग्री छोड़ दी और वापस भारत आने की ठान ली? विदेश में जो भाव उसे सुरक्षित कर देते थे, वे ही अब उसे बासी और ऊबाऊ लग रहे हैं. यहां कलकत्ते से भिवानी आना भी परिवार के ‘जमावड़े’ में वह रस ढूंढ़ना ही था.
पर कहां है वह आलोड़न?...कहां हैं वह थिरकन?...वह स्पंदन...जिस वाइब्रेशन के चक्कर में वह यहां से वहां टकराती फिर रही है-कहां है वह? क्या चुनिया बुआ की कहानी में कुछ अनोखा होगा?...कुछ ऐसा! कि जिससे उसका यहां आना कुछ तो सार्थक हो.
अंजलि ने आशा भरी आंखों से मां की ओर देखा और मां ने बात का सिरा उठाते हुए कहना शुरू किया...
‘‘चुनिया बुआ भूरामलजी की इकलौती बेटी थी. भूरामलजी का व्यापार चारूं चारों तरफ बिखरेड़ा था. गुजरात के बन्दरगाह सै ‘बसरा’ के मोती आते, पूरब बंगाल सै कच्चा जूट उठाकर वे कलकत्ते की मिलां मैं उनके बोरे बणवाते...किराणै गल्ला और मेवा की आढ़त भी करते, और बम्बई मैं भी कुछ कर्या करते. जाणै कोण-कोण सै काम्मां व्यापार में वे हर बखत फंसे रहते.’’
अंजलि से टोके बिना नहीं रहा गया और वह बीच में ही पूछ बैठी ‘मां! तुमने मुझे जो हाथी दांत वाले गणेशजी दिए हैं, वे कहां से आए थे? एक बार कलकत्ता अजायबघर के निदेशक डॉ. शर्मा ने उन्हें जांच कर कहा था कि ‘यह असली हाथी दांत है, और उस समय इसे ‘चीन’ से मंगवाया गया होगा. उन दिनों चीन भारत के देवी-देवताओं की ऐसी ही मूर्तियां यहां के बाज़ार के लिए बनाया करता था और बदले में यहां से अफ़ीम मंगवाता था. यह कारीगरी उस समय के चीन की ही है.’
मां ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘हां! शायद उनका व्यापार चीन सै भी था. कल जिन फीत्तां के रोल तुम रंग-बिरंगे कागज के समझकर फाड़न जुटी हुई थी. वै सिल्क के थे. मेरे रखे हुए वे सारे फीते सत्तर-अस्सी बरसां मैं कलफ़ लागेड़ी सिल्क होवा के कारण गलगे.’’
‘‘मां! यदि उनका कारोबार विदेशों तक भी फैला हुआ था, तो उन्होंने कमाया भी ख़ूब होगा?’’
‘‘अरे मूरख! कमाई नहीं होत्ती तो बीचलै बाज़ार न्यूयॉर्क के मैनहट्टन के समकक्ष में खड़ी या किले सी हवेली किस कैसे बणवातै? उस सस्ती के ज़माने में इस हवेली के एक लाख चौदह हजार रुपये लागै थे. आज तो इसमें करोड़ों लागै’’
‘‘और चुनिया बाई! इन्हीं सेठजी की एकमात्र बेटी थीं?’’
‘‘हाँ! इन भूरामल सेठ की बेटी तो थी एै, छह भाइयाँ कै बीच एकै भाण (बहन) थी. सबकी लाड़ली. भाण चले तो भाई पलक बिछावैं. छऊं भाइयां मैं होड़ रैती कि चुनिया किसकी ज्यादा प्यारी सै.’’
वाक्य अधूरा सा छोड़ किस्सागो ने एक लम्बा-सा सांस लेते हुए कहा, ‘‘लेकिन होणी भाग्य कै आगे किसका बस? पांच बरस की ब्याई चुनिया बिना गौना आठ बरस की विधवा होग्गी.’’
‘‘आठ बरस की विधवा? मां! क्या बकवास है? आठ बरस की विधवा?’’ जब वह विदा ही नहीं हुई थी तो इसे पूरा विवाह कैसे मान लिया गया?
मां ने हाथ से बरज कर कहा, ‘‘उस जमाने मैं आज की-सी बात कोनी थी. चाहे गोदी का ये बच्चा हो, सात फेरे फिरगे तो विवाहित कहलाता.’’
‘‘मां, उनके पति को कौन-सी बीमारी हुई थी? जो इतनी कम उम्र में ही मर गए?’’
‘‘अरे बैटा, किस्सी बिमारी? भला-चंगा मुंह अंधेरे मैदान गया था!...बच्चा-सा था!...खोदेड़ी माटी खोदी हुई मिट्टी ऊपर से ढह पड़ी! उसकै नीचै दब कर मर गया. जदै तो कहावत सै कि होणी बलवान सै.
कहते हैं कि उसकी मौत पर बोपोड़े गांव में किसी के घर चूल्हा नहीं जला क्योंकि उसके विवाह में लगभग पूरा गांव ही बारात में गया था और उस विवाह की चर्चा अभी तक चौपालों में होती थी.
इधर चुनिया नाचती-कूदती, गुडिया खेलती, गणगोर के गीत गाती, गहणां-गूठी जवाहरातों सै लदी, सही उमर और पति का इन्तज़ार करती रै गई.उमर तो आई पर जवानी कोनी आई. आठ बरस की चुनिया बाई उस्स दिन सै अस्सी बरस की ‘चुनिया बुआ’ होगी.’’
‘‘क्या...अस्सी बरस की बूढ़ी?’’
‘‘हाँ बाई! भाभीजी ठीक कह रही हैं!’’ कहते हुए हाथरस वाली ‘स्मार्ट चाची’ ने बुआ वृत्तांत में प्रवेश ले लिया.’
‘‘बाई! जब मैं यहां ब्याही आई तो चारों ओर बुआ का प्रताप छाया था. सच कहूं, तो मुझमें भी अपने पढ़े-लिखे और शहरी होने का गुमान था. स्वाभाविक था कि मैं उनके हर कार्य को सन्देह और आलोचनात्मक दृष्टि से देखती. लेकिन बाई क्या बताऊं, बुआ ने अपने समर्पण से मुझे ऐसा पस्त किया कि मेरी आंखें खुल गर्इं. मैं उनकी भक्त हो गई. सही तो यह है कि न तो किसी ने उन्हें कभी खाते देखा, न सोते, न नहाते, धोते. भगवान जाने वो सारा काम निबटा कर कब सोती थीं, क्या खाती थीं? हां! सारी दुनिया ने उन्हें हर क्षण खट-खटकर अपनी हड्डियां घिसते देखा. वे एकदम सहजता से मुस्कुराते हुए सारे काम करती रहतीं, काम ही काम बस आठों प्रहर काम आठ क्या बाई मुझे तो लगता है, उन्होंने आठ को भी सोलह प्रहर बना लिया था.’’
चाची का ध्यान बारबार अपने कन्धे की ओर जाता देख अंजलि घूमी और ताईजी को ध्यान मुद्रा में वहां खड़े देखा. अंजलि की प्रश्नवाचक दृष्टि को समझ कर ताईजी ने शब्दों को तौल कर कहा, ‘‘बेटा! बहू की सारी बातां ठीक है. सब सै बड़ी बात भुआजी मैं या थी कि बै बिदेह शारीरिक इच्छाओं से परे हो गया था. निज कै लिए कुछ नर्इं चायै यो एक ही भाव थो बिन्ना को. जो कुछ मिलै बीन्नै भी दुनिया पै लुटा दूं या ई मंशा रैती बांकी.
सास कंजूस था, तो छिप-छप कर म्हानै बदाम पिश्ता हलुवा-पूड़ी खुवाती. म्हार सगला का बच्चा तो बुआ जी ई पाल्या. एक बिन्ना कै कन्धे पर, तो एक बार्इं जांघ पर और तीसरी दार्इं जांघ पर पसरेडो कोई उनके पास चिपकेड़ो बैठो, कोई पीठ से पीठ टिकायां दिखे. अईयां लागतो मानो वै बुआ जी नर्इं है ‘रत्नां (रत्न) सै भरी मां धरती है, जिस्सै चिपककर बच्चां नै स्वर्ग को सो सुख मिलतो इससे. बै कदै बीमार पड़या भी होवै तो कोई नै पत्तो नई पड़नै दियो. इत्ता गुणां के कारण वे पूरै गांव का ब्याह-सगाई, जायै-मरै का सारा काम, निज मैं करवाता. बी जमाने में चोखा काम्मां मैं शुभ कार्य में विधवा को सामणे आणो भी खराब मान्यो जात्यो पर बुआजी कै बिना पूरी भिवानी में कोई भी चोखो काम नर्इंई होतो.’’
कहानी जवानी पकड़ रही थी कि पास खड़ी ‘निवासिया की श्रीनिवास की पत्नी बोल पड़ी, ‘‘ये बेबे! उस परमात्मा की कै बात?...भरी दुपहर-जब घर के सब सो जाते तो बगीचे जाकर घणे सारे काचे आम, नींबू, करौंदे, कमरख और भी इस्स तरहां की कई चीज़ उठा लाती. और कुम्हार से बड़े-बड़े घड़े मंगाकर उनमै ऊपर सै नमक, मिरच डाल कर सबके टुकड़े कर अचार बणा देती. पास से रुई मंगाकर गरीबणीयां नै सूत कात्तन दे देती. कते हुए सूत के पैसे देते समय साथ में अचार का ‘मुट्ठा’ भर कर दे देती. जानती थी कि गरीब-गुरबा कै घर में साग कोणी बणैं. बस्स, उन बिचारियां के तो ठाठ हो जाते. कालैड़ सूत के जुलायां से मोटे खेस बुनवा कर उननै बाजार में बिकवा कर उसके पिस्से उण लुगाइयां नै दे देती. इससे कइयां का खाणा खरचा चल जाता.’’
अंजलि ने तमककर कहा, ‘‘जब इतने बड़े घर की बेटी थी और उसी का राज चलता था तो बुआजी इतनी मेहनत क्यों करती थीं? घरवालों को कहकर गरीबों को रुपया-अन्न वगैरह दिलाने का इन्तजाम क्यों नहीं किया उन्होंने?’’
प्रत्युत्तर में पता चला, हालांकि घर में चारों ओर सम्पदा बिखरी पड़ी थी पर बुआ ने कभी भी उसमें से एक पैसा नहीं लिया. वे उस धन के तालाब में कमल-पत्ते की तरह रहतीं, न उसे छूना न उस धन को अपना मानना. विवाह के समय से उनके जो रुपए जमा थे, उससे उन्हें आठ रुपये महीना ब्याज मिलता था. दान-धर्म, खाना-खर्चा, जोड़ना-खर्चना आदि आदि सारे कार्य व्यापार वे उसी से चलातीं. हां! शरीर उनका अपना था इसलिए उसे एक क्षण भी आराम करने की अनुमति नहीं देतीं.
मां कुछ देर से किसी ख़याल में खोई हुई थीं कि अचानक बोल पड़ी, ‘‘बुआ जद तक जीवित रहीं, छोटी-सी अंगीठी पर पाव भर की पतीली में कभी मूंग, कदै जुआर, कदै बाजरा-जो भी सस्ता हो, उसकी खिचड़ी चढ़ा देती. उस खिचड़ी नै वै एक बार मैं खाती कि दो बार मैं राम जाणै. चुनिया बुआ नै कितणां के ब्याह कराए, कितणां नै बच्चे गोद दिला कर उनकै घरां में रौशनी करी इसकी गिणती और अन्दाज लगाना मुश्किल सै.’’
अचानक ताईजी ने विरोध के स्वर में बात काटते हुए कहा ‘‘लेकिन बुआजी भी कई बार अत्ती कर देता. भूरामलजी कै घर मैं इत्तो धन थे पर उनके पोते नै गरीब मुनीम के गोद बिना पूछे दे दियो. ज़रा सोचो, कहां सेठजी और कहां मुनीम? यो बहुत ही गलत कर्यो बैं? भोत ही अन्याय की बात है या.’’
ताईजी को इस बात की पीड़ा थी और अंजलि को लग रहा था कि क्या ‘समदर्शी’ होने का इससे बढ़िया उदाहरण कहीं और मिलेगा?
वह सोच रही थी, क्या सच चुनिया बुआ अस्सी बरस की होकर मरीं?
कहते हैं, उनकी मृत देह सुबह आंगन की नाली के पास पड़ी मिली. सबका अनुमान था कि रात को जब तबीयत बिगड़ी तो किसी को कष्ट देने से बचने के लिए वे उल्टी  करने नाली तक आई होंगी और वहीं चिर-निन्द्रा में सो गई होंगी.
कहावत है, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. पर बिना किसी एन.जी.ओ. का बिल्ला लगाए,...बिना किसी पर भार बने, उस समय के चार हजार का कुआं खुदवाती, ढेरों का जीवन सुधारती, यह पराश्रित बाल-विधवा क्या एक मिसाल नहीं है खुद्दारी से जीने की और जीना सिखलाने की?

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