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ललित कुमार के जीवन की यह कहानी 'विटामिन ज़िन्दगी', दे सकती है आपके जीवन को दिशा

पोलियो जैसी बीमारी के बावजूद ललित कुमार ने अपने जीवन को वह मुकाम दे दिया जिससे वह एक मिसाल बन गए. उनके जीवन गाथा पर लिखी पुस्तक 'विटामिन ज़िन्दगी' का यह अंश 'अब तो पथ यही है!' साहित्य आजतक के पाठकों के लिए खास

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 17 July 2019
ललित कुमार के जीवन की यह कहानी 'विटामिन ज़िन्दगी', दे सकती है आपके जीवन को दिशा मिसाल बन चुके ललित कुमार

ललित कुमार के जीवन का सफ़र 'असामान्य से असाधारण' तक का सफ़र है. पोलियो जैसी बीमारी ने उन्हें सामान्य से असामान्य तो बना दिया, लेकिन अपनी मेहनत और जज़्बे के बल पर उन्होंने स्वयं को साधारण भीड़ से इतना अलग बना लिया कि वे असाधारण हो गए. उनके इसी सफ़र की कहानी समेटे एक किताब आई 'विटामिन ज़िन्दगी'. एक बच्चा जिसके पैरों को 4 साल की उम्र में ही पोलियो मार गया, कैसे उससे जूझते हुए उसने समाज में अपना एक अहम मुकाम बनाया, यह किताब उसी की कहानी कहती है.

ज़िंदगी में आने वाली तमाम चुनौतियों को लेखक ने किस तरह से अवसर में बदला, यह उसी सकारात्मकता की कहानी है. यह किताब बताती है कि जिस तरह शरीर को विभिन्न विटामिन चाहिए, उसी तरह मन को भी आशा, विश्वास, साहस और प्रेरणा जैसे विटामिनों की ज़रूरत होती है. खासकर तब जब हमारा सामना समस्याओं, संघर्ष, चुनौतियों और निराशा से होता है.

आज आलम यह है कि कविता कोश, गद्य कोश, WeCapable.com, दशमलव और TechWelkin.com जैसी परियोजनाओं के संस्थापक ललित कुमार को विकलांगजन के लिए रोल मॉडल हेतु साल 2018 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. पोलियो जैसी बीमारी, अभावग्रस्त बचपन और बेहद कठिन किशोरावस्था के बावजूद अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में काम कर चुके ललित विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके हैं. इन दिनों वे Dashamav YouTube channel और WeCapable.com के ज़रिए देशभर के विकलांगजन और अन्य ज़रूरतमंद लोगों की सहायता कर रहे हैं.

साहित्य आजतक के पाठकों के लिए हम ललित कुमार के जीवन संघर्ष पर आधारित उन्हीं द्वारा लिखी पुस्तक 'विटामिन ज़िन्दगी' का  यह अंश अपने पाठकों के लिए दे रहेः

अब तो पथ यही है!
                          - ललित कुमार
आज स्कूल में बहुत गहमा-गहमी है. मैं बारहवीं कक्षा का विद्यार्थी हूँ और मेरी बोर्ड की परीक्षाओं में केवल दो महीने शेष हैं. चूँकि बारहवीं कक्षा स्कूल की अंतिम कक्षा होती है, इसलिए आज स्कूल में बारहवीं कक्षा के छात्रों का विदाई समारोह आयोजित किया गया है. यह केवल एक प्रथा है; हर कोई विदा नहीं हो जाता; बहुत से विद्यार्थी बरस-दर-बरस इस समारोह की शोभा बढ़ाते हैं. बहरहाल, प्रथा के अनुसार ग्यारहवीं कक्षा के छात्र और स्कूल के अध्यापकगण बारहवीं कक्षा के छात्रों के लिए यह समारोह आयोजित करते हैं.
दोपहर के बारह बज रहे हैं, धूप तेज़ पर सहनीय है. आज सुबह प्रार्थना के समय ही प्रिंसिपल महोदय ने ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के छात्रों को मैदान में ठीक बारह बजे इकट्ठा होने का निर्देश दे दिया था. सभी छात्र इस समय खुले मैदान में पंक्तियाँ बनाए बैठे हैं. कुछेक ने पतलूनों को मिट्टी से बचाने के लिए कॉपियों से पन्नें फाड़कर नीचे बिछाए हुए हैं. मैंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि चाहे जितना बचाओ मेरे कपड़ों पर तो मिट्टी लग ही जाती है.
 
मैं पूरे गर्व के साथ बारहवीं कक्षा की उस पंक्ति में बैठा हूँ जिसमें बस गिने-चुने विद्यार्थी हैं. यह बारहवीं कक्षा में विज्ञान पढ़ने वाले छात्रों की पंक्ति है. हमारे स्कूल में विज्ञान का विषय केवल दो वर्ष पहले ही आया और विज्ञान पढ़ने वाली पहली कक्षा में मैं भी शामिल हूँ. विज्ञान को मेरे स्कूल में एक महान और कठिन विषय माना जाता है. इसी वजह से हम विज्ञान के छात्रों को एक अलिखित विशेष दर्जा प्राप्त है. सभी अध्यापकगण हमारी ओर बहुत स्नेह और आशा की दृष्टि से देखते हैं. हमसे आशा की जाती है कि हम बोर्ड की परीक्षा में अच्छे नतीजे लाकर स्कूल का नाम रोशन करेंगे.
 
इस तरह के विदाई समारोहों में अधिकांश छात्रों की रुचि का विषय एक समोसा, एक बर्फी, एक केला और एक संतरा होते हैं जो समारोह के बाद हर छात्र को लिफ़ाफ़े में डालकर दिए जाते हैं. आयोजन के कारण, इसके महत्त्व और अध्यापकों के भाषण इत्यादि में अधिकांश छात्रों को कोई रुचि नहीं होती.
 
और ये लीजिए... भाषण आरंभ हो गए हैं. प्रिंसिपल महोदय और बारहवीं कक्षा के क्लास-टीचर्स छात्रों को अपनी-अपनी आशाओं के बारे में बता रहे हैं. ज़्यादातर छात्रों को इन आशाओं से कोई सरोकार नहीं है. वे एक-दूसरे से दबी आवाज़ में बातचीत करने में मशगूल हैं. क़रीब बीस मिनट के बाद आख़िरकार भाषण समाप्त हो गए और अब छात्रों का उत्साह बढ़ाने के लिए कुछ पुरस्कारों की घोषणा की जा रही है. ऐसे पुरस्कार के रूप में अक्सर पेन, कॉपी या ज्यॉमेट्री बॉक्स दिया जाता है.
 
...मुझे आज तक कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला.
 
पिछले बारह वर्षों में मैं कभी कक्षा में सबसे अधिक अंक नहीं ला सका, मैं खेल-कूद में भी भाग नहीं ले पाता था और किन्हीं अनजान कारणों से मैं शिक्षकों के सबसे प्रिय छात्रों में भी नहीं रहा.
 
मंच पर एक-एक करके पुरस्कार विजेताओं को बुलाया जा रहा है. मैं हर उद्घोषणा को धड़कते दिल से सुन रहा हूँ कि शायद मेरा नाम भी पुकारा जाए; लेकिन जैसे-जैसे मंच पर रखी मेज़ से पेन-सेट, कॉपियाँ और ज्यॉमेट्री बॉक्स एक-एक कर अन्य छात्रों में बँट रहे हैं, मेरी आशा कमज़ोर पड़ती जा रही है, मैं विज्ञान पढऩे वाले छात्रों की 'विशिष्ट' पंक्ति में बैठकर गौरव का अनुभव तो कर रहा हूँ, लेकिन एक खुशी, जिसके लिए मैं पिछले कई सालों से लालायित रहा हूँ, वह एक बार फिर मेरे हाथों से फिसलती हुई महसूस हो रही है, हालाँकि मैं स्कूल में हुए टेस्ट में दूसरे स्थान पर रहा और मैंने मोटे तौर पर पिछले दो वर्षों में विज्ञान और अँग्रेज़ी में अन्य छात्रों की बनिस्बत बेहतर प्रदर्शन किया है... लेकिन पुरस्कार? वो तो मुझे कभी मिलता ही नहीं है!
 
''...और इस वर्ष के सर्वश्रेष्ठ छात्र का पुरस्कार जाता है ललित कुमार को'', मंच पर पुरस्कारों की घोषणा कर रहे अध्यापक ने अचानक कहा.
 
मैंने जो सुना उस पर मुझे विश्वास तो नहीं हो रहा, लेकिन जो सुना वो मैंने स्पष्ट सुना है. सर्वश्रेष्ठ छात्र का पुरस्कार मुझे ही दिया जा रहा है!
 
मैंने मंच की ओर देखा तो अध्यापक मुझे आगे आने का इशारा कर रहे हैं. मैं बेतहाशा धड़कते अपने दिल को थामने की कोशिश में जुटा हूँ. स्कूल के बारह वर्षों में मैं आज तक कभी भी मंच पर नहीं गया, लेकिन आज जब मैं स्कूल के अंतिम पड़ाव पर हूँ, तब आख़िरकार मैंने स्वयं को सिद्ध कर ही दिया... मैं किसी से कम नहीं हूँ.
 
मैं इन्हीं भावनाओं में डूबा अपनी बैसाखियों पर खड़ा होने की कोशिश कर ही रहा था कि...
 
''अबे... इसे तो ये इनाम इसलिए मिला है क्योंकि ये लँगड़ा है'', मुझे पीछे बैठे एक सहपाठी की आवाज़ सुनाई दी.
 
पुरस्कार मिलने की खुशी में धड़कता मेरा दिल जैसे अचानक रुक गया... अचानक मैंने अपने चारों ओर उसी सन्नाटे और खालीपन को महसूस किया जो इस तरह की बातें सुनाई देने पर मुझे अपने आगोश में ले लेता है. मुझे लग रहा था जैसे मेरा दिमाग सुन्न हो गया हो... मानो किसी ने मेरे पूरे वजूद को एक झटके में मिटा दिया हो.
 
''यहाँ सबके सामने आओ ललित'', मंच से आई अध्यापक की आवाज़ ने मुझे अचानक आ धमके उस सन्नाटे से निकाला और मैं अपने चीखते मन को बैसाखियों पर ढोते हुए मंच की ओर बढ़ने लगा. छात्रों ने अनमनी-सी तालियाँ बजाकर मेरा स्वागत किया.
 
इसके कुछ देर बाद छात्रों के बीच समोसों के लिफ़ाफ़े बाँट दिए गए. अध्यापक भी प्रिंसिपल महोदय के कमरे में चाय-नाश्ते के लिए चले गए और सभी छात्र अपने-अपने लिफ़ाफ़े से चीज़ें निकालकर खाने लगे.
 
...लेकिन मुझे उस सन्नाटे ने फिर से घेर लिया था. मैदान के एक कोने में बैठा मैं मन-ही-मन रो रहा था.
 
बारह वर्षों की बेहद कड़ी मेहनत के बाद आज मुझे सर्वश्रेष्ठ होने का ख़िताब मिला था, लेकिन समाज की निगाह में इस ख़िताब, ख़िताब को हासिल करने वाले ललित और उसके द्वारा लाँघी गई हज़ारों बाधाओं का कोई अर्थ नहीं था. समाज की नज़र से देखें तो जो बैसाखियों पर चलता है, उसे पुरस्कार केवल इसलिए मिलता है क्योंकि वह विकलांग है. कोई विकलांग व्यक्ति भी किसी ऊँचाई को छू सकता है- ऐसी कोई कल्पना मेरा समाज कर ही नहीं सकता था.
 
मेरे किसी भी सहपाठी का जीवन उतना कष्टप्रद नहीं था जितना मेरा था... मेरे किसी भी सहपाठी ने स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के लिए उतनी मेहनत नहीं की थी जितनी मुझे करनी पड़ी थी... मेरे किसी भी सहपाठी को अपना मन नहीं मारना पड़ा था... पढ़ाई के लिए अपने शरीर को तोडऩा नहीं पड़ा था- लेकिन फिर क्यों मेरे सहपाठी ने मुझे ताना दिया?
 
मैदान के एक अकेले कोने में बैठे हुए मैंने निश्चय कर लिया कि मैं उस सहपाठी को गुस्सा जता कर नहीं, बल्कि अपनी उपलब्धियों से उत्तर दूँगा. अध्यापक मान चुके थे कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ... अब मुझे अपने उस सहपाठी को भी ऐसा जवाब देना था जिसे वह चाहे भी तो नकार न सके. बोर्ड की परीक्षा निकट थी, मुझे स्वयं को सिद्ध करना था.
 
और मैंने ठीक वही किया...
 
बोर्ड की परीक्षा में अपनी कक्षा में मुझे सर्वाधिक अंक हासिल हुए. मैंने सिद्ध कर दिया कि मुझे मिला वह पुरस्कार किसी की सहानुभूति नहीं था.
 
यह छोटी-सी घटना किसी भी विकलांग व्यक्ति के जीवन की कठिनाइयों और हमारे समाज के विकलांगता के प्रति दृष्टिकोण को रेखांकित करती है. विकलांगता और समाज के रवैए के विरुद्ध लड़ाई केवल अथक परिश्रम और इच्छाशक्ति के बल पर ही जीती जा सकती है.
 
यह लड़ाई, जो कि अपने-आप से मैंने लड़ी है
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों ने चढ़ी है
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार, ज़िन्दगी ने कर लिया स्वीकार
अब तो पथ यही है!

-दुष्यंत कुमार

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