Sahitya AajTak

जन्मदिन विशेषः बातचीत- उर्मिला शिरीष; मैं 'अन्ना कारेनिना' जैसी कोई रचना लिखना चाहती हूं

उर्मिला शिरीष हमारे दौर की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कथाकारों में से एक हैं. उन्होंने ढेरों कहानियां लिखीं और हर वर्ग द्वारा सराही गईं.  उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक की खास बातचीत

Advertisement
जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 19 April 2019
जन्मदिन विशेषः बातचीत- उर्मिला शिरीष; मैं 'अन्ना कारेनिना' जैसी कोई रचना लिखना चाहती हूं उर्मिला शिरीष, कहानीकार - लेखक - प्राध्यापक

उर्मिला शिरीष हमारे दौर की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कथाकारों में से एक हैं. उन्होंने ढेरों कहानियां लिखीं और हर वर्ग द्वारा सराही गईं. उनकी कहानियों की खासियत है कि वह बिना किसी के पक्ष में हुए भी अपनी संवेदनात्मक बुनावट के चलते एक निष्कर्ष देती हैं और पाठक के मन पर गहरी छाप छोड़ती हैं. उनकी कहानियां जीवन की समग्रता को समेटे अपने ‘कहानीपन' के साथ पठनीयता और सहजता जैसे अद्भुत गुणों की बानगी प्रस्तुत करती हैं. वह हमारे समाज में व्याप्त प्रेम और घृणा, संघर्ष और जिजीविषा, राग और द्वेष के बीच बहते जीवन को अपनी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समझ कथानकों में पाठकों के सामने ऐसे सहज ढंग से रख देती हैं कि वह चकित हुए बिना नहीं रहता.

अगर उनका औपचारिक परिचय लिखें तो, उर्मिला शिरीष का जन्म 9 अप्रैल, 1959 को मध्य प्रदेश में हुआ. उन्होंने हिंदी से एम.ए. पी.एचडी. और डी.लिट्. की उपाधि आद्योपान्त प्रथम श्रेणी में प्राप्त की. उनके द्वारा लिखी या संपादित पुस्तकों की गिनती दो दर्जन के आसपास पहुंचने ही वाली हैं. इनमें कहानी संग्रह- 'बिवाईयाँ तथा अन्य कहानियाँ', 'उर्मिला शिरीष की श्रेष्ठ कहानियाँ', 'दीवार के पीछे', 'मेरी प्रिय कथाएँ', 'ग्यारह लंबी कहानियाँ', 'कुर्की और अन्य कहानियाँ', 'लकीर तथा अन्य कहानियाँ', 'पुनरागमन', 'निर्वासन', 'रंगमंच', 'शहर में अकेली लड़की', 'सहमा हुआ कल', 'केंचुली', 'मुआवजा', 'वे कौन थे के' अलावा प्रख्यात लेखक गोविन्द मिश्र की जीवनी 'बयावाँ में बहार' और साहित्यकारों से साक्षात्कार 'शब्दों की यात्रा के साथ' शामिल है. यही नहीं उर्मिला शिरीष ने 'खुशबू' और 'धूप की स्याही' नामक कहानी संग्रहों का संपादन भी किया. उनके द्वारा संपादित अन्य पुस्तकों में 'प्रभाकर श्रोत्रिय: आलोचना की तीसरी परम्परा', 'हिंदी भाषा एवं समसामयिकी' तथा 'सृजनयात्रा: गोविन्द मिश्र' शामिल है.

साहित्य सृजन व लेखन के लिए उन्हें अब तक म.प्र. साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय मुक्तिबोध पुरस्कार, कमलेश्वर कथा सम्मान, रामदास तिवारी सम्मान, कृष्ण प्रताप कथा सम्मान, शैलेष मटियानी चित्रा कुमार कथा सम्मान, विजय वर्मा कथा पुरस्कार, निर्मल पुरस्कार, भगवत प्रसाद स्मृति साहित्य सम्मान, डॉ. बलदेव मिश्र पुरस्कार, वागीश्वरी पुरस्कार और समर स्मृति साहित्य पुरस्कार से नवाजा जा चुका है.

वर्तमान में भोपाल क़ॅ शासकीय महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नातकोत्तर (स्वशासी) महाविद्यालय में हिंदी की प्राध्यापक उर्मिला शिरीष की कुछ कहानियों का उर्दू, अंग्रेज़ी, पंजाबी, सिन्धी तथा ओड़िया आदि भाषाओं अनुवाद भी हो चुका है. दूरदर्शन ने जहां कहानी ‘पत्थर की लकीर’ पर टेली-फ़िल्म बनाया वहीं बैंगलोर की संस्था ‘कलायान’ ने ‘धरोहर’ कहानी पर ‘जो पीछे छूट जाते हैं’ शीर्षक से नाट्य मंचन भी किया है. यही नहीं

बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, राजस्थान विश्वविद्यालय, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, विक्रम विश्वविद्यालय एवं बरकतउल्लाह आदि विश्वविद्यालयों में ‘उर्मिला शिरीष के कथा साहित्य’ पर कई छात्र पीएच.डी. तथा एम.फिल उपाधि प्राप्त कर चुके हैं और अनेक विद्यार्थियों द्वारा यह शोध का यह सिलसिला जारी है.   

अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों तथा सम्मानों की समिति में निर्णायक की भूमिका के साथ ही कई सामाजिक और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी कथाकार- लेखक - प्राध्यापक उर्मिला शिरीष से उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक ने बातचीत की. अंशः

1.    आप अपने बचपन, शिक्षा, व लेखक होने की प्रक्रिया के बारे में बताएँ?

- मेरा बचपन गाँव के बहुत ही खूबसूरत वातावरण में गुजरा है, हरे-भरे खेत, पलाश के जंगल, त्यौहारों के रंग, लोक-गीतों, भजनों और फागों की गूँजें आज भी मेरे कानों में गूँज रही हैं. वहाँ के लोगों के साथ जो रिश्ता था, वह अत्यन्त आत्मीयता से भरा और अन्तरंग था. वे लोग पात्र बनकर मेरी कहानियों में आये हैं, पर अभी भी बहुतों को आना है. घर में पढ़ने का माहौल था. किताबों से कमरा भरा रहता था. बच्चों की पत्रिकाएँ, उस समय की सभी पत्र-पत्रिकाएँ तथा किताबें मेरे आसपास रहती थीं. मेरे साथ की लड़कियाँ जब खेलती थीं, तब मैं स्वयं को किताबों के बीच उनके साथ, उन पात्रों के साथ रहती थी.

लेखक बनने की प्रक्रिया में दो कहानियों का प्रभाव मुझ पर था. एक ‘हार की जीत’, दूसरी ‘काबुलीवाला’. इन कहानियों ने मुझे बहुत ज़्यादा प्रभावित किया था. दूसरा, मेरे हिंदी के अध्यापक जिन्होंने कोई विषय कहानी लिखने के लिए दिया था, तब मेरी कहानी पढ़कर उन्होंने कहा था कि तुम्हें कहानी लिखना चाहिए... यही मेरे लेखक बनने की प्रक्रिया है. मेरे जीवन में साहित्य हमेशा सबसे श्रेष्ठ और प्रिय विषय रहा है. जीने की ताकत.

2.    आप अपनी कहानियों के लिए पात्र कहाँ से चुनती हैं? अगर उन पात्रों में से किसी सबसे अच्छे पात्र को चुनने को कहा जाए, तो किसे चुनेंगी और क्यों?

-  मेरी कहानियों के पात्र मेरे आसपास के समाज से, जीवन से आते हैं. वे मेरे भीतर आकर बैठ जाते हैं. मुझसे सवाल करते हैं. मुझसे अपने जीवन की कथा कहने के लिए प्रेरित करते हैं. संघर्ष करते पात्र मेरी कहानियों में ज़्यादातर आये हैं, क्योंकि संघर्ष से जीता हुआ मनुष्य जीवन में कभी पराजय स्वीकार नहीं करता है. तमाम कहानियों के बहुत सारे पात्र हैं, लेकिन आप किसी सबसे अच्छे पात्र के बारे में जानना चाहते हैं तो वह ‘चीख’ कहानी की ‘लड़की’ है, जो एक खिलाड़ी है, मस्त है, अल्हड़ है... लेकिन बलात्कार की शिकार हो जाती है. उसके बाद उसके जीवन में जो घटनाएँ घटित होती हैं, जिस तरह का माहौल, तनाव, घृणा वह देखती है, सहती है... अचानक एक दिन परिवार देखता है कि वह स्कूटर उठाकर पुनः खेलने के लिए जा रही है. मैंने कहा न कि हर परिस्थिति से जूझकर, निकलकर जीवन को चुनने का फैसला लेने की क्षमता मुझे उसमें नज़र आती है, इसलिए वह सारे पात्रों में अपनी जगह बनाती है.

3.    हाल में देखा जा रहा है कि प्रकाशकों की रुचि उपन्यास की तरफ बढ़ी है. आपने इतनी सारी कहानियाँ लिखीं और लगातार लिख भी रही हैं, क्या आपने उपन्यास लिखने की तरफ नहीं सोचा? अगर हाँ तो वह किस विषय पर होगा?

-  आपने सही बात कही है. इन दिनों उपन्यासों पर ज़्यादा ज़ोर है, बल्कि हर समय उपन्यास पढ़ना और लिखना लेखकों की पहली प्राथमिकता होती है. मेरे साथ कुछ इस तरह की बातें या स्थितियाँ बनती रहीं कि मैं अपने तीन उपन्यासों को प्रकाशन के लिए नहीं दे पाई... पर वह जल्द ही होगा और वह उपन्यास जल्द ही आएँगे.

4.    क्या आप लेखन के क्षेत्र में लिंग-भेद के किसी भी असर को मानती हैं? क्या स्त्री लेखक होने के चलते आपने कभी ऐसा कुछ महसूस किया?

-  लेखन के क्षेत्र में मैं बिल्कुल भी लिंग-भेद को नहीं मानती हूँ, क्योंकि यदि ऐसा मैं मान भी लूँ तो मेरे सामने शरतचन्द्र, जैनेन्द्र कुमार, लियो टालस्टॉय जैसे अनेक लेखक उदाहरण के रूप में आ जाते हैं, जिन्होंने स्त्री जीवन को बहुत ही बारीकी से, संवेदनशील दृष्टि से अपनी कृतियों में अभिव्यक्त किया है. रचनात्मक स्तर पर, चेतना और भावबोध के स्तर पर मैं कभी भी इस बात को स्वीकार नहीं कर पाई हूँ, न मैंने कभी यह महसूस किया है कि मैं स्त्री लेखक होने के कारण कुछ लिखने में असमर्थ हूँ. मैं स्वयं को एक लेखक के रूप में देखना पसन्द करती हूँ. हालाँकि यह सवाल भी उठाया जाता है कि स्वयं का भोगा और देखा यथार्थ ज़्यादा प्रामाणिक होता है, मगर इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात होती है ‘परकाया प्रवेश’ की. एक समर्थ लेखक परकाया प्रवेश करके ही सुन्दर और श्रेष्ठ रचना को जन्म दे सकता है.

5.    आप अपने समकालीन और पूर्ववर्ती लेखकों में किससे प्रभावित हैं? किसकी रचना पढ़ आपको ऐसा लगा कि काश इसे मैंने लिखा होता!

-  जैसा मैंने कहा कि मैं बचपन से ही साहित्य पढ़ती आई हूँ. मेरे प्रिय लेखक प्रेमचन्द, लियो टालस्टॉय, चेख़ब, कृष्णा सोबती, मार्केज और फणीश्वरनाथ रेणु रहे हैं. मैं टैगोर और शरतचन्द्र से भी बहुत प्रभावित रही हूँ, पर मैं अगर कोई रचना लिखना चाहती हूँ तो वह है ‘अन्ना कारेनिना’. काश मैं एक और कहानी लिख पाती, वह है- ‘मारे गये गुलफाम’ उर्फ ‘तीसरी कसम’. काश मैं ऐसी कहानी लिख पाऊँ.

6.    आजकल हिंदी साहित्य में जो कुछ लिखा जा रहा है, जिस तरह से पुरस्कार मिल रहे हैं और जो खेमेबन्दी है, क्या उससे लेखक प्रभावित हो रहा है? आपकी प्रतिक्रिया.

- हिंदी साहित्य का क्षेत्र व्यापक है. आज भी हिंदी साहित्य पढ़ा जाता है और उसी तरह से लिखा भी जा रहा है. बहुत सारी प्राइवेट संस्थाएँ हैं जो साहित्य और कलाकारों के लिए काम कर रही हैं; पुरस्कार दे रही हैं. मैं किसी के ऊपर दोषारोपण नहीं कर रही हूँ, पर पुरस्कारों को लेकर कुछ भ्रामक बातें भी फैलायी जाती हैं. कुछ लेखकों को तो पता भी नहीं रहता कि उन्हें पुरस्कार दिया जा रहा है. जो पुरस्कार की राजनीति करते हैं, उनके बारे में मैं नहीं जानती.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay