Sahitya AajTak
Sahitya AajTak

बातचीतः परिवर्तनशील जगत में राम और रावण का युग आता-जाता रहता है- आबिद सुरती

साहित्य आजतक को अपने जन्मदिन पर दिए इंटरव्यू में चित्रकार, लेखक, कार्टूनिस्ट, पत्रकार, पर्यावरणविद्, नाटककार, पटकथा लेखक आबिद सुरती का मानना है कि देश पर इनदिनों रावण का राज है.

Advertisement
aajtak.in
जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 12 September 2019
बातचीतः परिवर्तनशील जगत में राम और रावण का युग आता-जाता रहता है- आबिद सुरती आबिद सुरती और उनकी किताब Sufi का कवर

'मासूम को गोरैया से न प्रेम था न ईर्ष्या थी. गोरैया खिड़की पर आ बैठे या छत में घोसला बनाए इसमें उसे क्या आपत्ति हो सकती है? फिर भी वह विचलित हो गई. गोरैया ने अपना घोंसला कहीं और नहीं उसके हृदय में बनाया था... यह उनके उपन्यास 'आधी स्त्री' की चंद पंक्तियां हैं. हम बात कर रहे हैं 84 साल के युवा आबिद सुरती की. 5 मई, 1935 को गुजरात के अमरेली जिले के राजुला में पैदा हुए आबिद को किसी परिचय विशेष की दरकार नहीं. वह अपने आप में चलती-फिरती किंवदंती बन चुके हैं. उन्हें देश के पहले सुपर हीरो कॉमिक बनाने के चलते 'फादर ऑफ इंडियन कॉमिक्स' कहा जाता है. पर यह उनके विशद, विविधता भरे जीवन परिचय का अदना सा हिस्सा भर है.

वह एक बड़े चित्रकार, ख्याति प्राप्त लेखक, महान कार्टूनिस्ट, उम्दा पत्रकार, जानेमाने पर्यावरणविद्, यशस्वी नाटककार, सफल पटकथा लेखक और ऐसे समाजसेवी हैं, जिनकी कोशिश पानी बचाकर धरती पर जीवन बचाने की है. 'ढब्बू जी' नामक अपने कार्टून कैरेक्टर से आबिद सुरती ने तीन से भी अधिक दशकों तक देश और दुनिया के कार्टूनजगत में अपनी शानदार उपस्थिति बनाए रखी. उनके बनाए कार्टून भारत की सभी प्रमुख पत्रिकाओं और पत्रों में प्रकाशित होते रहे हैं. कॉमिक कैरेक्टर 'बहादुर' उन्हीं की पैदाइश है. उनके प्रशंसकों में देश के करोड़ों  लोगों के अलावा ओशो, अटल बिहारी वाजपेयी, आशा भोंसले, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान जैसी हस्तियां शामिल हैं.

हिंदी, अंग्रेजी, गुजराती में उनकी लिखी पुस्तकों की भरमार है. कहते हैं फिल्म 'अतिथि तुम कब जाओगे' की कहानी भी उनकी एक कहानी से प्रेरित थी. कभी धर्मवीर भारती ने उनकी पुस्तक 'काली किताब' के लिए लिखा था, 'संसार की पुरानी पवित्र किताबें इतिहास के ऐसे दौर में लिखी गईं, जब मानव समाज को व्यवस्थित और संगठित करने के लिए कतिपय मूल्य मर्यादाओं को निर्धारित करने की ज़रूरत थी. पर आबिद सुरती की यह महत्त्वपूर्ण 'काली किताब' इतिहास के ऐसे दौर में लिखी गई है, जब स्थापित मूल्य-मर्यादाएं झूठी पड़ने लगी हैं और नए सिरे से एक विद्रोही चिंतन की आवश्यकता है, ताकि जो मर्यादाओं का छद्म- समाज को और व्यक्ति की अंतरात्मा को अंदर से विघटित कर रहा है, उसके पुनर्गठन का आधार खोजा जा सके. महाकाल का तांडव नृत्य निर्मम होता है, बहुत कुछ ध्वस्त करता है, ताकि नयी मानव रचना का आधार बन सके. वही निर्ममता इस कृति के व्यंग्य में भी है.'

आबिद सुरती ऐसे ही विरल कथाकार और कलाकार हैं, उनकी रचनाएं सदियों से चली आ रही जड़-रूढ़ियों, परंपराओं पर जमकर प्रहार करती हैं, तो उनकी चित्रकला में उकेरी कूंचियां और रंग उन्हें कला से कहीं बेहद आगे ले जाकर इस संसार और अंततः मानवता की बेहतरी का खाका खींचते हैं... पर आबिद हैं कि शब्दों और रंगों से ही उनका मन नहीं भरता.... वह मुंबई जैसे महानगर में पानी बचाने की मुहिम का एक जाना-पहचाना चेहरा हैं. मजेदार बात यह कि इस अभियान की शुरुआत उनके जीवन में घटे एक इतने छोटे से अनुभव से हुई, अमूमन जिसकी हम सभी अपने जीवन में अनदेखी कर देते हैं. 

हुआ यह कि साल 2007 में आबिद सुरती अपने एक दोस्त के घर बैठे थे, जब उनकी नजर अचानक दोस्त के घर में एक लीक करते पानी के टैप पर पड़ी. जब उन्होंने अपने दोस्त का ध्यान इस ओर दिलाया, तो उन्होंने इस बात को कोई खास तवज्जुह नहीं दी. आबिद दुखी हो गए, इसी बीच उन्होंने एक आर्टिकल पढ़ा, जिससे पता चला कि अगर पानी की एक बूंद हर सेकंड बर्बाद होती है, तो हर महीने करीब एक हजार लीटर पानी बर्बाद हो जाता है. यहीं से उनके दिमाग में पानी बचाने की मुहिम सवार हुई....

इसी के साथ सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा प्राप्त और लेखन के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार जीतने वाले, गुजरात गौरव सम्मान से सम्मानित आबिद के खुद कंधे पर झोला डाल पानी बचाओ अभियान पर निकल पड़े. वह साल 2007 से 'द ड्राप डेड फाउंडेशन' अभियान चलाकर लोगों के घरों में नल से टपकती पानी की बूंदों को बचा रहे हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार अब तक उन्होंने अपने दम पर तकरीबन 60 लाख लीटर पानी बर्बाद होने से बचाया है. आबिद सुरती की प्रमुख कृतियों में कहानी संग्रह-  तीसरी आंख, आतंकित, दूसरी बीवी, दस प्रतिनिधि कहानियां; उपन्यास- कथावाचक, मुसलमान, काली किताब, आदमी और चूहे, बहत्‍तर साल का बच्चा, खोया हुआ चेहरा, काले गुलाब, गुलमोहर के आंसू; नाटक- नारी परीक्षा, राधे-राधे हम सब आधे; बाल साहित्य- नवाब रंगीले, डॉ. टिंचू के चमत्कार, बुद्ध क्यों मुस्कुराए, 2500 साल के बाद और कई अन्य किताबें शामिल हैं.

साहित्य आजतक ने इस अनूठी शख्सियत को उनके जन्मदिन पर बधाई देते हुए लंबी बातचीत की. खास अंशः

 1.   सबसे पहले जन्मदिन की शुभकामनाएं. इस उम्र में भी इतनी उर्जा कहां से लाते हैं आप?

- मैं अपनी उर्जा सकारात्मक सोच, युवा पीढ़ी का साथ और- प्रकृति के प्रति सम्मान और प्यार से पाता हूं.

2.   आप की इस सृजनात्मकता का अक्षय स्रोत क्या है? आज जो आबिद हैं, वह कैसे बने? आपकी निर्मिति की प्रक्रिया, बचपन से अब तक? 

- दिमाग की खुली खिड़की, ओपेन माइंड. इससे जीवन में हर पग के साथ मैं कुछ सीखता हूं. एक उदाहरण, जिसे मैंने ओशो की किसी किताब में पढ़ा था- हम अपने को बौद्धिक, उदारवादी, न जाने क्या–क्या समझते हैं, लेकिन जब हमारी शादी हो जाती है, बच्चे हो जाते हैं, तो हम क्या करते हैं- हम अपने धर्म को बच्चों पर थोपने लगते हैं या इस बात का इंतजार करते हैं कि वे मेच्योर होने पर अपनी पसंद के मुताबिक अपना धर्म चुन सकें? संक्षेप में कहूं तो मैंने धर्म को नहीं थोपा. क्यों? इसलिए कि मैंने ओशो के विचारों को अपनाया और अपने दिमाग को हमेशा ताजगी, ताजे विचारों के लिए खुला रखा.

3. 1965 के 'टूटेला फरिश्ता' से 'The Black Book',  ‘Musalman’ और 'तीसरी आंख' सहित 80 से भी अधिक किताबों के इस सफर में आपकी सबसे बेहतर कृति और किरदार कौन है और क्यों?

- 'सूफी' ( मुसलमान ), 'काली किताब', 'बहत्तर साल का बच्चा' .... कोई एक नहीं, इनमें से कई. काली किताब की बात करूं, तो उसकी विषय-वस्तु, खासकर शैतान का चरित्र अद्वितीय था. कमलेश्वर और डॉ धर्मवीर भारती, दोनों को ही यह बेहद पसंद आया. पहले कमलेश्वर ने इसे सारिका में प्रकाशित किया. जब यह पुस्तक के रूप में छपा, तो एक ने इसके फ्लैप का मैटर लिखा, तो दूसरे ने इसकी भूमिका लिखी. यह मेरे जैसे नवागंतुक लेखक के लिए गर्व का विषय था, हिंदी साहित्य के क्षेत्र में इससे धमाकेदार प्रवेश क्या हो सकता था. 'सूफी' के जीवंत चरित्र इकबाल ने तो पाठकों की नजर में कभी न भूलने वाली इमेज बनाई. इसी तरह 'बहत्तर साल का बच्चा' उपन्यास जो बच्चों को ध्यान में रखकर लिखा गया था, अभिभावकों को भी बेहद पसंद आया. इस पुस्तक में मुख्य नायक अपनी ईमानदारी, विश्वसनीयता और साहस के चलते पाठकों के दिलोदिमाग पर पहले पन्ने से ही छा जाता है.

4. कहानी, आत्मकथा, उपन्यास, नाटक, कविता, पटकथा लेखन...आपने इन सभी विधाओं में लिखा? पर आप अपने आपको किस विधा में सहज पाते हैं?

- मूलतः, मैं एक चित्रकार हूं. लेखन और कार्टून आदि से मैं अपनी कला के लिए सहयोग हासिल करता था. इसलिए इनसे कोई प्रतिबद्धता नहीं थी. लेकिन जब मैं आर्थिक रूप से व्यवस्थित हो गया, तब मैं हर उस चीज के लिए गंभीर हो गया, जो मैं कर रहा था, खासकर साहित्य से संबंधित - आप मुझे एक प्रतिबद्ध लेखक कह सकते हैं. मेरे बारे में विस्तार से जानने के लिए पाठक यूट्युब पर मेरे जीवन पर बना वीडियो या मेरी वेबसाइट www.ddfmumbai.com पर भी विजीट कर सकते हैं.

5.  यह दुनिया आबिद सुरती को एक लब्ध प्रतिष्ठित पेंटर, कार्टूनिस्ट, लेखक, एक्टिविस्ट, रंगमंच की दमदार आवाज के रूप में जानती है, पर आबिद मूलतः क्या हैं? उन्हें क्या होना पसंद है?

- मैं जो हूं, जैसा हूं, खुश हूं. जब भी, जो भी करने का मन करता है, करता हूं.

6. आपकी सृजनशीलता पर किनका, और किनकिन लोगों का प्रभाव है?

- कॉलेज में मैंने शरद बाबू की किताब पढ़ी तो लगा कि मुझे कोई चुनौती दे रहा है. भीतर सवाल उठा- अगर वह लिख सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? और सिलसिला शुरू हो गया.

7. बतौर कलाकार, रचनाकार वर्तमान भारत और विश्व को आप किस रूप में देखते हैं?

- बुद्ध का मैं भक्त हूं. उनका विचार है- सब कुछ परिवर्तनशील है. राम जाएंगे तो रावण आएंगे और रावण जाएगा तो राम आएंगे. ये दौर रावण का चल रहा है. सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशों में भी रावण सत्ता में आ गए हैं. क्या किसी ने ख्वाब में भी सोचा था कि विवेकानंद और गांधी के देश पर दो कट्टर अपराधी राज करेंगे?   

8.  सृजन के क्षेत्र में तकनीक के प्रभाव पर आपके विचार?

-तकनीक वर्तमान पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद है. यह एक तरह से सर्जन के चाकू की तरह है. आप इसका इस्तेमाल अपने मरीज को नया जीवन प्रदान करने के लिए कर सकते हैं और उसी चाकू से किसी निर्दोष व्यक्ति का गला भी रेत सकते हैं.

9.  समाज, सियासत, कला, साहित्य और सृजन के क्षेत्र में खेमेबंदी पर आपकी प्रतिक्रिया?

- खेमेबंदी कोई नई घटना नहीं है. यह हजारों सालों से हमारे जीवन का हिस्सा है! आप इसे अपनाइए या छोड़ दीजिए, और खुद को जिंदा रखने का रास्ता खोजिए.

10. नई पीढ़ी के लिए कोई संदेश? आबिद कैसी दुनिया का स्वप्न देखते हैं?

- नई पीढ़ी को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए - वे जीवन से क्या चाहते हैं - खुशी या समृद्धि? हम प्रचुर आनंद के साथ पैदा हुए हैं लेकिन अगर हम धन की प्राप्ति के लिए भागमभाग करने का फैसला करते हैं, तो आनंद का स्तर धीरे-धीरे नीचे की ओर, शून्य की तरफ आना शुरू हो जाएगा. अपना करियर समझदारी से चुनिए, वह जो आपको पूर्ण संतुष्टि प्रदान करता है, अमीर नहीं बनाता. अगर आप प्रसन्न हो, पैसा खुद-ब-खुद आपका पीछा करने लगेगा.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay