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कविता बहती हुई नदी, बस देखने का नजरिया अलग-अलग: प्रसून

साहित्य आज तक के पांचवें सत्र में गीतकार, कवि और पटकथा लेखक प्रसून जोशी ने शिरकत की. उन्होंने अपनी यात्रा और कविता पर बात की.

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महेन्द्र गुप्तानई दिल्ली, 12 November 2018
कविता बहती हुई नदी, बस देखने का नजरिया अलग-अलग: प्रसून प्रसून जोशी

साहित्य आज तक के पांचवें सत्र में गीतकार, कवि और पटकथा लेखक प्रसून जोशी ने शिरकत की. इस सत्र का संचालन श्वेता सिंह ने किया. इस दौरान प्रसून ने कविता, सेंसरशिप और राजनीतिक मुद्दों पर बात की. उन्होंने अपने सत्र में बीच-बीच में कविताएं भी सुनाई.

उन्होंने कहा कि कला के क्षेत्र में अलग-अलग तरह के लोगों को आना चाहिए. गीतों को लिखने में भावनाएं अहम किरदार अदा करती हैं. आपबीती से गीत लिखने की प्रेरणा मिलती है.

कवि की यात्रा के सवाल पर प्रसून जोशी ने कहा, जब आप सोचते हैं कि आप क्या है, उससे पहले समाज आपको बता देता है कि ये हैं आप. उसे समाज रोक देता है वहीं पर. जबकि कलाकार को बहते रहने देना होगा. कलाकार को यह कहकर नहीं रोकना कि आप तो ये हैं. रिलीजन, जेंडर या कुछ और से उन्हें जोड़ दिया जाता है. इस तरह कलाकार के बहने देने का तारतम्य टूट जाता है.

प्रसून ने कहा, कविता यदि जीवन का सार है, उसे सिखाया जाना चाहिए. समझाना चाहिए. किसी ने मुझसे पूछा कि आप कितना कमा सकते हैं कविता लिखकर. दरअसल, कविता की कोई फाइनेंशियल वैल्यू नहीं हैं. ये अनमोल है. जो चीज जिंदगी जीना सिखाती है, उसका क्या मोल हो सकता है.

बकौल प्रसून जोशी, 'मैंने अपनी कृतियों को क्र‍िएटर के तौर पर ही नहीं, रिसीवर के तौर पर ही देखता हूं. उस पर पाठक या समाज की क्या प्रतिक्र‍िया है, उस तरह से सोचता हूं.' प्रसून ने कहा, लोग कहते हैं कि ये विचार मेरा है. दरअसल, विचार एक बहती नदी की तरह है. बस उसे देखने के नजरिया अलग-अलग होता है. कोई पहाड़ पर से देख रहा है, कोई उसे करीब से देख रहा है. हर एक के देखने का नजरिया अलग-अलग है. ये हो सकता है कि जहां मैं खड़ा हूं, वहां मुझसे पहले कोई और खड़ा न हुआ हो.

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