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बातचीतः कवि मदन कश्यप; संघर्ष जब करुणा में ढलता है तब कविता रची जाती है

आधुनिक हिंदी साहित्य में कविता, आलेख, आलोचना से अपनी गंभीर व सामाजिक, सियासती विषयॉ पर सार्थक, वैचारिक उपस्थिति से विशिष्ट पहचान बनाने वाले कवि मदन कश्यप का आज जन्मदिन है. साहित्य आजतक ने इस मौके पर उनसे खास बातचीत की.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 29 May 2019
बातचीतः कवि मदन कश्यप; संघर्ष जब करुणा में ढलता है तब कविता रची जाती है कवि, आलोचक मदन कश्यप [फाइल फोटो]

आधुनिक हिंदी साहित्य में कविता, आलेख, आलोचना से अपनी गंभीर; व सामाजिक, सियासती विषयों पर सार्थक, वैचारिक उपस्थिति से विशिष्ट पहचान बनाने वाले कवि मदन कश्यप का आज जन्मदिन है. उन्होंने अपने बेहद चर्चित काव्य-संकलनों 'लेकिन उदास है पृथ्वी', 'नीम रोशनी में', 'कुरूज', 'दूर तक चुप्पी', 'अपना ही देश' के अलावा 'मतभेद', 'लहुलुहान लोकतंत्र' और 'राष्ट्रवाद का संकट' नामक आलेख संकलनों से भी खास पहचान बनाई.

मदन कश्यप का जन्म 29 मई, 1954 को बिहार के वैशाली जिले के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ. वह जब आठ साल के थे, तभी उनकी मां का देहांत हो गया. उन्होंने ननिहाल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की और 1979 में रोजी-रोटी की तलाश में धनबाद आ गए. यहीं एक दैनिक पत्र से जुड़कर कोई 2 वर्ष तक सक्रिय पत्रकारिता की. फिर 1981 में एक सार्वजनिक उपक्रम से जुड़ गए. साल 1987 में एक दूसरे सार्वजनिक उपक्रम में पटना आ गए. नवंबर, 2000 में उस नौकरी से भी इस्तीफा दे दिया. उसके बाद राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर नियमित रूप से लिखना शुरू किया.

संपादक और पत्रकार के रूप में कई बार छोटे- बड़े पदों की अल्पकालिक पारी खेली. कई बार सहयोगी के रूप में, कई बार परामर्शदाता, तो कई बार संपादक के रूप में भी 'श्रमिक सॉलिडरिटी', 'अंतर्गत', 'आलोचना', 'समकालीन जनमत', 'सहयात्री', 'पुरुष', 'समकालीन कविता', 'अभिधा' और 'द पब्लिक एजेंडा' और गृह प्रकाशनों से भी जुड़े रहे.

दूरदर्शन, साहित्य अकादमी, आकाशवाणी, नेशनल बुक ट्रस्ट, हिंदी अकादमी और साहित्य आजतक के आयोजनों में वक्ता और कवि के रूप में सक्रिय भागीदारी निभाई है. अपने कवि कर्म के चलते 'नागार्जुन पुरस्कार', 'केदार सम्मान', 'शमशेर सम्मान' और 'बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान' से सम्मानित मदन कश्यप फिलहाल कविता, राजनीति, इतिहास, जनांदोलन, आदिवासी और शूद्र चिंतन-धारा के अध्ययन के अलावा भारतीय ज्ञानपीठ की फेलोशिप के तहत 'मक्खली गोसाल' के जीवन पर आधारित उपन्यास लिख रहे हैं.

हाल ही में उनका कविता संकलन 'पनसोखा है इंद्रधनुष' नाम से आया है. साहित्य आजतक ने इस प्रखर कवि से उनके जन्मदिन पर लंबी बातचीत की. प्रस्तुत है अंशः

1. आपका बचपन कैसा था, किन स्थितियों में पले, बढ़े, लिखा-पढ़ा? किस प्रक्रिया ने आपको कवि बनाया?

बचपन मिलाजुला था, कुछ अच्छा भी, कुछ बुरा भी. पिता की शादी के बारह वर्ष के बाद पहली संतान के रूप में पैदा हुआ था तो लाड़-प्यार की कमी नहीं थी लेकिन परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी. संकट की शुरुआत तब हुई जब मां नहीं रही. मैं केवल साढे आठ साल का था, जब मां का निधन हो गया. मुझे ननिहाल भेज दिया गया. वहां खानेपीने की कोई कमी नहीं थी लेकिन अधिकारहीन जीवन ने धीरे-धीरे मुझे अंतर्मुखी बना दिया. बाहरी दुनिया से कहीं ज़्यादा मैं अपनी उस आंतरिक दुनिया में जीने लगा, जिसे मैं अपने मन के भीतर लगातार रचता  रहता था. बस यहीं से लेखन की शुरुआत हुई. मैं बता दूं कि मेरे विवेक का विस्तार भी मेरी भावुकता और संवेदनशीलता से हुआ है. इसीलिए प्रायः लोगबाग मुझे अव्यवहारिक और मूर्ख मानते हैं, जो मेरी समझ से उचित ही है.

2. आप अपनी कविताओं का विषय कहां से चुनते हैं?

- कविता के लिए विषय मैं जीवन से ही लेता हूँ, प्रकृति, समाज, समय - सब जीवन में ही शामिल हैं. बाहर की घटनाएं जब भीतर जाती हैं, मनोभावों को झकझोरती हैं, तभी कविता फूटती है. संघर्ष जब करुणा में ढलता है तब कविता रची जाती है.

3.  साहित्यकारों की झंडाबरदारी, और किसी खास विचारधारा से उसके लगाव पर आपकी प्रतिक्रिया?

- एक नागरिक के रूप में झंडाबरदारी की ज़रूरत हो सकती है लेकिन कवि के रूप नहीं. हाँ, विचारधारा ज़रूर चाहिए, ऐसी विचारधारा जो समाज के आख़िरी आदमी के संघर्ष और करुणा को समझने में मदद करे, उसके पक्ष में खड़ा होने की ताक़त और साहस दे. समझ ही नहीं, अनुभव के विस्तार के लिए भी विचारधारा ज़रूरी है. लेकिन, ध्यान रहे कि विचारधारा सत्ता के विरुद्ध एक नयी या अलग सत्ता खड़ा करती है जबकि कवि का काम सत्ता के विरुद्ध सहअस्तित्व निर्मित करना होता है.

4.  हिंदी साहित्य में कविता की वर्तमान दशा से आप कितने संतुष्ट हैं? बहुधा देखा जाता है कि प्रकाशक भी काव्य संकलन छापने से कतराते हैं, आपकी नजर में इसका जिम्मेदार कौन है?

- कविता की अपनी सीमा है और ख़ास ख़ूबियाँ भी, उन्हें ठीक से पहचानें तो ऐसे सवाल नहीं उठेंगे. कविता थोड़ी व्यापकता तभी पाती है जब समाज में कोई बड़ा आंदोलन होता है, जैसे भक्ति आंदोलन या स्वतंत्रता आंदोलन. लेकिन कविता बुरे दिनों में भी होती और लिखी जाती है. उसकी स्थाई भूमिका है पाठक की संवेदना का विस्तार करना. आज भी लिखी जा रही है और पढ़ी भी जा रही है. कविता संकलन बिकते भी हैं. प्रकाशक सहर्ष छापते हैं, बल्कि कईबार संकलन नहीं देने या वापस ले लेने से नाराज भी होते हैं. हाँ, यह कवि को जान और समझ लेना चाहिए कि उसके पाठक हैं या... अलबत्ता संस्थाएं कथा और आलोचना ख़रीदती हैं, कविता संग्रह और नाटक नहीं ख़रीदतीं. अच्छा है कि कविता का बाज़ार नहीं है, उसके थोड़े ही सही लेकिन प्रतिबद्ध पाठक हैं.

5. कवि के लिए पुरस्कार का कितना महत्त्व है? आज का साहित्यकार क्या सुविधाओं और पुरस्कारों के लिए समझौते कर रहा है?

- पुरस्कार का कोई महत्त्व नहीं है, सिवा इसके कि इससे कुछ नये पाठक मिल जाते हैं, कुछ लोगों का ध्यान चला जाता है. इसका विरोध करना भी इसके महत्व को स्वीकार करना है. अच्छा लेखक कभी जुगाड़ नहीं करता, सहजता से मिल जाये तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, बशर्ते देने के पीछे कोई राजनीति नहीं हो.

6. एक कवि के रूप में आज के सियासी हालात पर आपकी टिप्पणी?

- सियासी हालात बहुत बुरे हैं, क्योंकि आज के राजनेता सामाजिक यथार्थ को समझने, उससे टकराने और समाज को बेहतर बनाने का रास्ता निकालने का उपक्रम नहीं कर रहे हैं. झूठ और फ़रेब का बोलबाला है. एक ऐसी आपराधिक लोकप्रियता रचने और सामूहिक सम्मोहन पैदा करने की कोशिश हो रही है जिसके दुष्परिणाम बहुत आगे चलकर दिखेंगे. लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट यह है कि यह विपक्षविहीन होता जा रहा है. विरोधी दल सत्ता के एजेंडे के इर्दगिर्द ही चक्कर लगा रहे हैं. केवल भारत ही नहीं, वैश्विक स्तर पर बड़े राजनीतिक बदलाव की ज़रूरत है. हाल ही में यूक्रेन में हुआ चुनाव देख लीजिए, वहाँ एक ऐसा व्यक्ति राष्ट्रपति का चुनाव जीत गया, जो पेशेवर कमेडियन है, कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है. अब दिशा बदलनी होगी.

7.  आपके पसंदीदा कवि- साहित्यकार, वरिष्ठ, समकालीन व नए लेखक व उनकी रचनाएं, कुछ का नाम?

- इस प्रश्न को रहने दीजिए. मेरे सबसे प्रिय कवि विद्यापति हैं. और सूची इतनी लंबी है कि.....माफ़ कीजिए!

8. आपने 2009 से 2011 के बीच अनेकों ऐसी कविताएं लिखीं थीं, जो आज के संदर्भों में ज्यादा सटीक लगती हैं, जैसे 'विजेता हत्यारा' और 'नए युग के सौदागर'. इस पूर्वानुभूति की वजह?

- दरअसल, यह कोई पूर्वानुभूति या पूर्वानुमान नहीं, सूक्ष्म ऑबजर्वेशन का मामला है. कवि अपने समय के यथार्थ को केवल घटनाओं में नहीं देखता है बल्कि, उसकी आंतरिक गतिशीलता को पहचानने का भी उपक्रम करता है, इसी से यह संभव होता है. केवल 2009 से 2011 के बीच की ही नहीं, 1990 के बाद की मेरी कई ऐसी कविताएं हैं जो आज ज़्यादा प्रासंगिक लग सकती हैं.

9. इन दिनों नया क्या लिख रहे हैं?

-कुछ ख़ास नहीं. उपन्यास लिखने का बहाना इतना पुराना हो गया है कि अब उससे भी बचाव नहीं हो सकता. हाँ, कुछ भिन्न तरह के निबंध लिख रहा हूँ. ये ललित निबंध से बिल्कुल अलग हैं. मैं इन्हें काव्य निबंध कहना पसंद करूंगा.

10. सियासत में साहित्य और साहित्य की सियासत पर आपकी प्रतिक्रिया?

- सियासत में साहित्य की जगह कहाँ रह गयी है? बस दिनकर और दुष्यंत जैसे कवियों की कुछ पंक्तियाँ कभी-कभी नेताओं के काम आ जाती हैं. हाँ, साहित्य में सियासत की जगह है, क्योंकि समाज ही नहीं, समय भी सियासत से नियंत्रित हो रहा है, बल्कि कईबार सियासत इतिहास और संस्कृति को भी नियंत्रित करने की कोशिश करता दिख रहा है. ऐसे में सियासत की चुनौतियों से जूझना साहित्य का धर्म है. लेकिन साहित्य की सियासत तो बहुत निकृष्ट चीज़ है. यह पदों-पुरस्कारों के लिए होती है और लेखन को क्षति पहुंचाती है. एक पंक्ति में कहूँ तो मैं साहित्य में राजनीति की अभिव्यक्ति का पक्षधर हूँ, लेकिन साहित्य की राजनीति का घोर विरोधी हूँ. शुक्रिया!

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