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जन्मदिन विशेषः बातचीत- कुमार अंबुज, मनुष्‍यता के समक्ष यह एक निर्णायक समय है

हिंदी के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समकालीन कवियों में से एक कवि कुमार अंबुज से उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक की खास बातचीत

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जय प्रकाश पाण्डेय नई दिल्ली, 12 September 2019
जन्मदिन विशेषः बातचीत- कुमार अंबुज, मनुष्‍यता के समक्ष यह एक निर्णायक समय है कवि कुमार अंबुज [ फोटो फेसबुक वॉल से ]

कोई है जो माँजता है दिन-रात मुझे

चमकाता हुआ रोम-रोम

रगड़ता

ईंट के टुकड़े जैसे विचार कई

इतिहास की राख से

माँजता है कोई मुझे....

यह कुमार अंबुज की 'कोई है माँजता हुआ मुझे' शीर्षक वाली कविता की चंद शुरुआती पंक्तियां हैं. वह हमारे समय के उन चुनिंदा प्रभावी कवियों में से हैं, जिनमें मानवीय सरोकार और संवेदना समूची शिद्दत से, बेहद निडरता और करुणा के साथ प्रवाहित होती है. वह लिखते हैं, और शब्द कविता का रूप धर लेते हैं, और झांकने लगता है उनमें हमारा समाज, संदर्भ सहित. आज उनका जन्मदिन है.

कुमार अंबुज का जन्म 13 अप्रैल, 1957 को मध्य प्रदेश के गुना में हुआ था. 13 अप्रैल यानी बैसाखी का दिन. उत्तर भारत में यह सर्दियों की फसल कटने के बाद नए साल की खुशियां मनाने का दिन है. यह दिन रबी की फसल के पकने की खुशी का प्रतीक भी है. संभवतः कुमार अंबुज की कविताओं में खेतखलिहान, मजदूर, किसान, श्रम, औरतें, मध्यवर्ग, प्रकृति, करुणा, क्रूरता, उपकार और उम्मीदें उनके जन्म की तारीख के साथ ही आ गए.

हालांकि उन्होंने जो कुछ लिखा या लिख रहे उनमें उनका अपना पाठ्य, अनुभव व समय शामिल है. अनुभवों की आग में तप कर, अपने परिवेश से वह अपनी कविताओं के लिए शब्द यों चुनते हैं कि पाठक भाव प्रवाह में आकंठ डूब जाता है. 'एक स्त्री पर कीजिए विश्वास' कविता में इसकी बानगी देखिए.

जब ढह रही हों आस्थाएँ

जब भटक रहे हों रास्ता

तो इस संसार में एक स्त्री पर कीजिए विश्वास

वह बताएगी सबसे छिपाकर रखा गया अनुभव

अपने अँधेरों में से निकालकर देगी वही एक कंदील....

कोई अचरज नहीं कि जब साल 1998 में उनका संकलन 'अनंतिम' आया तो उसकी भूमिका लिखते हुए विष्णु खरे ने लिखा था- 'अनंतिम किसी ने कहा था कि दुनिया के मज़दूरो, एक हो जाओ - खोने के लिए तुम्हारे पास अपनी ज़ंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है. कुमार अंबुज की ‘ज़ंजीरें’ उन असंख्य साँकलों का जिक्र करती हैं, जिनसे हमारा समूचा चिंतन, सृजन तथा समाज बँधा हुआ है और उन्हें वंदनीय मानने लगा है, हालाँकि कुछ लोग आखिर ऐसे भी थे जो अपनी-अपनी आरियाँ लेकर उन्हें काटते थे और बार-बार कुछ आज़ाद जगहें बनाते थे. स्वयं कुमार अंबुज के कवि के लिए यह एक उपयुक्त रूपक है. उनकी कविताओं में कोई असंभव, हास्यास्पद आशावाद या क्रांतिकारिता नहीं है...'

कुमार अंबुज को काव्य लेखन के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा सम्मान, केदार सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार, गिरजाकुमार माथुर सम्मान मिल चुका है और 'किवाड़', 'क्रूरता', 'अनंतिम', 'अतिक्रमण', 'अमीरी रेखा' नाम से कविता संग्रह आ चुके हैं. उन्होंने 'इच्छाएँ' नाम से कहानी संग्रह भी लिखा है.

उनकी कविताओं में अन्याय का विरोध है, तो अपने समय का खाका भी. शायद इसीलिए उनमें ताज़गी और सहजता तो है, पर कथित बौद्धिकता और कृत्रिम वैचारिकता नदारद हैं. स्वयं कुमार अंबुज ने एक बार नए कवियों को संबोधित करते हुए कहा था कि कवि का वैज्ञानिक चेतना से लैस होना सबसे अधिक जरूरी है. क्योंकि अगर कवि अपने आसपास की घटनाओं को वैज्ञानिकता और तर्क की कसौटी पर नहीं कसता तो उसकी कविता का न तो उद्देश्य और न ही उसका फलक इतना बड़ा हो पायेगा कि वह समाज के अपने अनुभवों को सही परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त कर सके.

इसी तरह अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में एक बार उन्होंने लिखा था- 'एक सवाल की तरह और फिर एक विवाद की तरह, कुछ चीज़ें हमेशा संवाद में बनी रहती हैं. रचनाशीलता में मौलिकता एक तरह का मिथ है. मौलिकता एक अवस्थिति भर है जिसमें आपको एक दी हुई दुनिया का अतिक्रमण करना है. मै और मेरी रचना उतनी ही मौलिक है जितना इस संसार में मेरा अस्तित्व मौलिक है. मेरी मौलिकता पूरे जड़-चेतन से सापेक्ष है निरपेक्ष नहीं. ... जैसे मेरी हँसी में मेरे पिता की हँसी शामिल है.

यह भूमिका काफी लंबी हो गई. कायदे से इसे अलग से होना चाहिए था. पर जनकवि के जन्मदिन पर यह छूट तो ली जा सकती है. 'साहित्य आजतक' ने इस महत्त्वपूर्ण अवसर पर उनसे बातचीत की. पर इस बातचीत से पहले हम उनकी 'यह संगीत है जो अविराम है' कविता की कुछ पंक्तियां आपको पढ़ाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए.

यह संगीत है जो अविराम है

यह भीड़ में है

जो अकेलेपन के कक्ष में

गूँजता है अलग बंदिश में

शब्द में

निःशब्द में हवा में

निर्वात में

संगीत है....

कवि कुमार अंबुज से साहित्य आजतक की खास बातचीत

1.   अपने बचपन के बारे में, विशेषकर कवि के रूप में अपनी निर्मिति प्रक्रिया के बारे में कुछ बताएं?

निम्‍न मध्‍यवर्गीय जीवन के बचपन को यह मौका ज्‍यादा मिलता है कि वह समाज की तलछट का सहजबोध प्राप्‍त कर ले. गॉंव की पृष्‍ठभूमि इसमें इजाफा करती है. इसी वजह से सामंती, जातिगत, कृषि आधारित जीवन की मुश्किलों से भी मेरा परिचय होता रहा. फिर कस्‍बाई, शहरी जीवन से गुजरते हुए यदि लेखन या कविता की तरफ प्रवृत्‍त होने का संयोग बने तो इन चीजों का मेल किसी रसायन की तरह सोचने-समझने में अनायास शामिल हो जाता है.

वे तमाम अनुभव और निरीक्षण जो किसी कवि की तरह नहीं बल्कि एक अबोध लेकिन उत्‍सुक बच्‍चे की तरह आपके पास इकट्ठा होते हैं, बाद में कवि के लिए थाती हो सकते हैं. वे सब आपके तलघर में बने रहते हैं और जरूरत पड़ने पर आपके लिए प्रकट हो जाते हैं. प्रारंभ में कवि होना आप तय नहीं करते, इसका अहसास भी धीरे-धीरे होता है कि आप लिख सकते हैं. जब आप स्‍म़ृतियों, प्रस्‍तुत जीवन, अंतर्विरोधों और विडंबनाओं को, इनके अंतर्संबंधों को अभिव्‍यक्‍त करना चाहते हैं, उसी प्रक्रिया में पता चलता है कि आप कविता लिख पा रहे हैं. बचपन के अनुभव आपके क्रोमोजोम्‍स का हिस्‍सा हो जाते हैं. अमिट, समय सूचक और दिशा निर्देशक यंत्र की तरह. इस दृष्टि का विकास करना एक पृथक, अनवरत काम भी है.

2.   वनस्पति शास्त्र, कानून और बैंक प्रबंधन के बीच आपने कविता को कैसे साधा?

साधने की जरूरत नहीं पड़ी. अलग विधाओं और अनेक तरह के कामकाज से गुजरना किसी भी कवि के लिए उपहार की तरह हो सकता है. कविता जीवन के नानाप्रकार से स्‍त्रोत ग्रहण करती है, संपन्‍न होती है. रिल्‍के ने अपनी प्रसिद्ध कविता 'फौर द सेक ऑव अ पोएम' में कहा ही है कि कवि को कविता लिखने के लिए अनेक समुद्रों, जंगलों और अनुभवों से गुजरना पड़ता है. कोई भी बेहतर लेखक दिन-रात साहित्‍य नहीं कर सकता. उसे जीवन के विशाल प्रांगण में ज्‍यादा वक्‍त गुजारना चाहिए. नौकरी, औपचारिक पढ़ाई के विषयों और विभिन्‍न रुचियों ने मेरे लिए यह अवसर काफी हद तक जुटा दिया.

3.   हिंदी साहित्य, खासकर काव्य की वर्तमान दशा और दिशा से आप कितने संतुष्ट हैं?

दिशा से ही दशा बेहतर हो सकती है. अभी हिंदी कविता में प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन दृष्टि की समस्‍याऍं हैं.

वैचारिक संपन्‍नता की कुछ कमी लगती है. नए कवि राह निकालेंगे.

4.   किसी कवि के लिए पुरस्कार का कितना महत्त्व है? पुरस्कारों को लेकर लॉबिंग के बारे में आपका नजरिया?

पुरस्‍कार बता सकते हैं कि लोगों का ध्‍यान कवि के रचनाकर्म पर है. लेकिन पुरस्‍कार कवि की राह में पड़नेवाले सहज स्‍थल हैं, महत्‍व तो अनवरत यात्रा का है. लॉबिंग के बारे में ज्‍यादा नहीं जानता. पुरस्‍कार को उसकी जूरी के सदस्‍यों की श्रेष्‍ठता और उसे प्राप्‍त करनेवालों की सूची ही महत्‍वपूर्ण बनाती है. अन्‍यथा हर शहर में कई संस्‍थाऍं पुरस्‍कार, सम्‍मान देती हैं लेकिन उनका मूल्‍य टिन के छोटे से पत्‍तर से भी कमतर होता है. बायोडाटा में दर्ज करने के बावजूद वे किसी को याद नहीं रहते, किसी को भी प्रेरित नहीं करते.

5.   एक कवि के रूप में आज के समाज और सियासत पर आपकी टिप्पणी?

किसी भी कीमत पर सत्‍ता की आकांक्षा तानाशाही का मूल है. एकवचनीय समाज की इच्‍छा और अपने धर्म की, जाति या नस्‍ल की श्रेष्‍ठता का भाव फासिज्‍म का आधार है. ये दोनों बातें स्‍पष्‍ट दिख रही हैं. इस चुनाव में यदि बहुलतावादी, लोकतांत्रिक, समाजवादी शक्तियों को समर्थन नहीं मिला तो तानाशाही और फासिज्‍म का खतरा एकदम दहलीज पर है. यह राजनीति इतिहास से कोई सबक नहीं ले रही है, यह कल्‍याणकारी राज्‍य और मनुष्‍य की स्‍वतंत्र चेतना के विरोध में है. जैसा कि पूँजीवादी कार्पोरेट समाज में संभव है कि तानाशाही, लोकतंत्र की ओट में जगह बना सकती है. इस महादेश के सामने, मनुष्‍यता के समक्ष यह एक निर्णायक समय है.

6.   साहित्य की समृद्धि में अनुवाद की कितनी भूमिका है? क्या देश में भारतीय भाषाओं के कवियों को परस्पर भाषाओं में, और विदेशों में भारतीय कवियों को वह सम्मान हासिल है, जो योरोपीय और अंग्रेजी भाषा के लेखकों को दुनिया भर में प्राप्त है?

समृद्धि से कहीं अधिक उसके प्रसार और वैश्विक साहचर्य में अनुवाद की भूमिका जाहिर है. चूँकि यह काम गुणवत्‍ता और प्रचुरता, दोनों ही मामलों में पिछड़ा हुआ रहा है इसलिए हिंदी कविता की ताकत, श्रेष्‍ठता और महत्‍ता से शेष संसार का परिचय बेहद कम है. जब परिचय ही नहीं है तो उसकी स्‍वीकार्यता और सम्‍मान की बात बहुत दूर की है. इस दिशा में योजनाबद्ध, संस्‍थागत और महत्‍वाकांक्षी प्रयास से ही कुछ हो सकता है.

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