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स्त्री की मुक्ति का प्रश्न, मनुष्यता की सबसे बड़ी चुनौतीः सविता सिंह

बिहार के आरा जिले के संपन्न परिवार में 5 फ़रवरी, 1962 को सविता सिंह का जन्म हुआ. पढ़ाई की भाषा अंग्रेजी थी और घर की भाषा भोजपुरी, हिंदी. हर छुट्टी में विदेश जाना और पढ़ाई के दिनों में खूब पढ़ना उनके लिए शगल जैसा था. इसके चलते उन्होंने अकादमिक योग्यता भी खूब अर्जित की.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 06 February 2019
स्त्री की मुक्ति का प्रश्न, मनुष्यता की सबसे बड़ी चुनौतीः सविता सिंह सविता सिंह

सविता का अर्थ होता है, सूर्य या तेज, पर कवयित्री सविता सिंह के संदर्भ में ऐसा नहीं है. अपने नाम के साथ सिंह लगने के बाद भी वह केवल 'स्त्री' है. अपनी संपूर्णता में भी, और अधूरेपन में भी. सबलता और सहजता का एक अनोखा मिश्रण है उनमें.

साहित्य, शिक्षा, प्रशासन के क्षेत्र में उनकी कामयाबी देखने वालों को उनके कवि होने पर संशय हो सकता है. पर वह ऐसी ही हैं, उदार और कठोरता के अजब विरोधाभासी आवरण को समेटे. और इन सबके मूल में उनके अंदर की 'औरत' स्नेह से पगी हुई. ममता से ओतप्रोत. जो भी कभी मिला उनसे, वह उनकी आवाज का और जिसने भी पढ़ा, वह उनकी लेखनी का कविताओं का कायल हो गया.

बिहार के आरा जिले के संपन्न परिवार में 5 फ़रवरी, 1962 उनका जन्म हुआ. पढ़ाई की भाषा अंग्रेजी थी और घर की भाषा भोजपुरी, हिंदी. माता-पिता देश के बाहर रहते थे, सो हर छुट्टी में उनसे मिलने विदेश जाना और पढ़ाई के दिनों में खूब पढ़ना उनके लिए शगल जैसा था. इसके चलते उन्होंने अकादमिक योग्यता भी खूब अर्जित की.

दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए, एमफिल करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए वह मॉट्रियल के मैक्गिल विश्वविद्यालय चली गईं. उनके शोध का विषय था 'भारत में आधुनिकता का विमर्श: एक व्याख्यात्मक अध्ययन'. वह चार साल कनाडा और दो साल लंदन में रहीं. इस दौरान अंग्रेजी में कविताएं लिखीं.

भारत लौटीं तो अध्यापन से जुड़ गईं. इस बीच सृजनात्मक यात्रा भी जारी रही. लगभग डेढ़ दशक तक दिल्ली विश्विद्यालय में अध्यापन किया. फिलहाल वह इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्विद्यालय में प्रोफेसर व स्कूल ऑफ जेन्डर एवं डेवलपमेंट स्टडीज़ की निदेशक हैं.

उनकी रचनात्मक उपलब्धियां अकादमिक उपलब्धियों जैसी ही भारीभरकम हैं. वह हिंदी और अंग्रेज़ी में सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य के अलावा स्त्री विमर्श की सशक्त वक्ता हैं. समकालीन वैचारिक मुद्दों सहित अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनके शोध-पत्र तथा साहित्यिक रचनाएं छपती रही हैं.

उनका पहला कविता-संग्रह 'अपने जैसा जीवन' साल 2001 में हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कृत हुआ. उन्होंने स्त्री के मर्म को इतनी शिद्दत से महसूसा कि उनकी कविताओं में वह अपने आप अभिव्यक्त होते गए. इसकी बानगी उनकी अधिकांश कविताओं में मिलती है.

पर सविता सिंह के कविता की स्त्री केवल दर्द की ही नहीं, साहस की भी प्रतिमूर्ति है. उनकी 'दर्पण सी हंसी' कविता की शुरुआती लाइनें देखिए-

एक हंसी दर्पण-सी अपने होठों पर रख ली थी उसने

जिसमें देवताओं ने देखे अपने दुख....

उनके दूसरे कविता संग्रह का नाम था 'नींद थी और रात थी.' यह साल 2005 में छपा. इस पर उन्हें रज़ा सम्मान से भी मिला था. उनका एक द्विभाषिक कविता संग्रह अंग्रेज़ी-हिंदी में 'रोविंग टुगेदर' नाम से साल 2008 में प्रकाशित हुआ. इसी साल फ्रैंच और हिंदी द्विभाषी प्रकाशन में भी कविताएं छपीं. साल 2011 में उन्होंने अमेरिका, योरोप और एशिया की सात कवयित्रियों के अंग्रेज़ी संकलन  'सेवेन लीव्स, वन ऑटम' का संपादन किया.

साल 2012 में उनकी प्रतिनिधि कविताएं 'नई सदी के लिएः पचास कविताएं' नाम से छपी. उनका तीसरा कविता संकलन 'स्वप्न समय' के नाम से छपा. वह काव्य सम्मान, हिंदी अकादमी सम्मान, महादेवी वर्मा कविता सम्मान और भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाजी जा चुकी हैं. 'साहित्य आजतक' ने सविता सिंह के जन्मदिन पर उनसे लंबी बातचीत की. खास अंशः

आप अपने बचपन के बारे में कुछ बताइए?

सविता सिंहः मेरा बचपन एक जादुई बचपन था. जिसमें हर रोज नई चीजें सीखती थी, नई चीजें पढ़ती थी, नए लोगों से मिलती थी, नए फल खाती थी. नई चिड़िया देखती थी, प्रकृति को बहुत पसंद करती थी. मेरे घर के पीछे एक बड़ा बागान था, वहां अलगअलग तरह के पेड़पौधे थे, तो मैं अक्सर मैं वहां होती थी. इस तरह से मेरा बचपन एक खुशहाल बचपन था. हालांकि मेरे माता-पिता हमेशा विदेश में रहते थे. हमें अच्छी भारतीय शिक्षा मिले इसलिए उनलोगों ने हमें यहां छोड़ रखा था. 

यहां हम एक संयुक्त, भरेपूरे परिवार में चाचा, चाची, दादा-दादी, भाई-बहन सभी के साथ रहते थे. हमारा परिवार एक संपन्न परिवार था तो भौतिक रूप से कोई अभाव नहीं था, कोई दुख नहीं था. पर माता-पिता के साथ न रहने का असर मनोवैज्ञानिक रूप से रहता था. हालांकि लगातार माता-पिता आते जाते रहते थे, फिर भी एक तरह का गैप जो क्रिएट हुआ वह एक धब्बे के रूप में आज भी बचा हुआ है. 

शायद इसीलिए मैंने अपना पूरा समय पढ़ने-लिखने में लगा दिया.  क्योंकि मेरा मानना है कि पढ़ने-लिखने का कोई विकल्प नहीं है. वह आपके स्व का हिस्सा है. ज्ञान की ऐसी दुनिया में चले जाना जहां आपके हर सवालों का जवाब मिलता रहता है. इसीलिए मैंने अपने को ज्ञान अर्जित करने में लगा दिया. इसने मुझे स्वतंत्र एवं स्वायत्त बनाया. इसीलिए मैं ने अपनी एक अलग दुनिया सी बना ली. अंदर की दुनिया को मैं अच्छे से समझने लगी थी. इससे मैंने लोगों से कट कर अपना एक अलग एकांत बना लिया. किताबों की दुनिया के बीच.

मेरे घर में एक बड़ी लाइब्रेरी थी, मेरे दादा जी की, वे सब बहुत पढ़ने लिखने वाले लोग थे. तो हम शहर में भी रहते थे, गांव में भी, फिर अपने पैरेंट्स के पास विदेश भी जाते थे, खासकर कुवैत, जहां मेरे पिताजी ज्यादातर रहते थे. ईरान, इराक, मॉस्को इन जगहों पर गए. हमारा जीवन कहीं एक जगह स्थिर नहीं था. जैसी बाहर की यात्रा थी, वैसी ही अंदर की यात्रा थी. इसीलिए मुझे बचपन से ही लगता था कि इस जीवन का उद्देश्य कुछ और है. यह सामान्य जीवन नहीं है. सारे बच्चे अपने माँबाप के साथ एक जगह रहते हैं, हम लोग दस जगह रहते हैं. पर कोई ऐसी कमी नहीं थी, पर वह जो ख़ला थीं वह अपने अंदर की थी. वह आज भी है. इसीलिए यह लिखना अब तक जारी है.

आपका औपचारिक लेखन कब शुरू हुआ? आपको कब लगा कि आप लिख सकती हैं? यही मेरा रास्ता है?

सविता सिंहः बचपन से, सात-आठ साल की उम्र से ही मैंने लिखना शुरू कर दिया था. बचपन से ही डायरी लिखना शुरू कर दिया था. जो भी देखती उसके बारे में, चिड़िया, चींटियों के बारे में, प्रकृति में जो भी सुंदर था, उसे देखती, लिखती थी. शुरुआती किस्म का लेखन जो डायरी में था वहां भी कविता का रूप ले लेती थीं. पर औपचारिक तौर पर जब मैंने स्कूल पास कर लिया और गर्मियों की छुट्टियां आईं, तो मैंने बहुत सारी कविताएं लिखीं और मुझे लगा कि मैं कविता लिख सकती हूं.  पर छपने का कौतूहल नहीं था उस समय. मैं बस अच्छा लिखना चाहती थी. अपने मन की बात जैसा मैं चाहती थी. टॉलस्टॉय को, दोस्तोवस्की को पढ़ती थी, उनकी किताबों से मेरा घर भरा था, तो मैं वैसा लिखना चाहती थी. कविताएं मैं बहुत सहज ढंग से लिखती थी.

आप हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखती हैं? किस भाषा में लिखना आपको ज्यादा सुकून देता है?

सविता सिंहः मुश्किल है कहना. क्योंकि एक स्तर पर आकर भाषाएं एक व्यक्ति के लिए एक ही संसार की रचना करती हैं, क्योंकि भाषा ही संसार है. मेरा तो मानना है कि इसी में प्रेम और एकांत दोनों संभव है. मेरी एक कविता है 'रुथ का सपना', उसमें है यही बात. सुकून है दोनों ही भाषाओं में. अगर मैं किसी तीसरी भाषा में लिखूं तो उसमें भी सुकून है. कविता में जाकर आप, भाषा में जाकर आप अपना सबकुछ पा लेते हैं.

आपके सोचने की भाषा क्या है?

सविता सिंहः मेरी सोचने की भाषा दो क्या तीन हैं. हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी. यह बड़ा विचित्र है कि जब मैं उन लोगों से बात करती हूं जो भोजपुरी में बात करते हैं तो उन्हीं की भाषा में सोचती हूं. यही हिंदी और अंग्रेजी के साथ भी है. सारी भाषाएं साथ-साथ चलती रहती हैं. सभी से उतना ही प्रेम, लगाव व सुकून है.

आपकी पसंदीदा रचना, पसंदीदा कृति?

सविता सिंहः इस सवाल का जवाब भी बहुत मुश्किल है. क्योंकि जिन चीजों को आप पसंद करते हैं, पढ़ते हैं आप, उन्हें पढ़ते हुए ही आप मनुष्य बनते हैं. तो कितनी सारी किताबें होंगी जिन्होंने आपकी मदद की होगी. पर एक किताब की मैं अवश्य चर्चा करूंगी वह उपन्यास है जेन आयर, यह एक अद्भुत नॉवल है. मेरा मानना है कि सभी लोगों ने इसे अवश्य पढ़ा होगा.  हिंदी में मुझे महादेवी बहुत अच्छी लगती हैं. सिल्विया प्लाथ, एमिली डिकिंसन, दोस्तोवस्की मेरे पसंदीदा लेखक है. जो रचनाएं आपको रचती हैं, वह वही होती हैं, जो आपकी पसंदीदा होती हैं.

स्त्री आपकी कविता का मुख्य पात्र क्यों है? उसका दुख, अकेलापन, संघर्ष क्यों है?  

सविता सिंहः मेरी रचनाएं फेमनिस्ट कविताएं हैं. मेरी चेतना का जो संसार है, उसमें स्त्री की पीड़ा का बहुत मानी है. मुझे ऐसा लगता है कि पीड़ा ने ही स्त्री को गढ़ा है. उसपर जो अत्याचार होते हैं वही उसे गढ़ता है. मैं पूरी दुनिया में जहां भी गई, मांट्रियल जहां से मैंने पीएचडी की, इंगलैंड में रही, हर जगह मैंने देखा कि स्त्री-पुरुष बराबर नहीं हैं.  वे बराबर इसलिए नहीं हैं कि उनमें शारीरिक बनावट में कोई अंतर है, बल्कि यह समाज स्त्रियों को पराधीन बनाकर रखना चाहता है. यह एक बड़ा दुख है, दोष है इस संसार का. 

मेरा जो अकादमिक जीवन है, उसमें मैं राजनीति सिद्धांती हूं, पर मैं अंदर ही अंदर अपने को फेमनिज्म के करीब पाती हूं. लोकतंत्र, समानता, मार्क्स आदि के सिद्धांतों के बीच एक बड़ा तबका जो स्त्री है, उसके बारे में कोई बात नहीं होती. मैं चेतना के जिस दौर में हूं उसमें स्त्रियों की मुक्ति को मैं सबसे बड़ा प्रश्न मानती हूं. मेरा मानना है कि मनुष्यता को इसे सुलझाना ही होगा.

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