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एक कवि का निजी जीवन उसकी कविताओं में प्रकट हो ही जाता हैः बाबुषा कोहली

बाबुषा कोहली ने एक बेहद संभावनाशील कवयित्री के रूप में तेजी से अपनी पहचान बनाई है. उनका जन्म 6 फरवरी 1979 को मध्यप्रदेश के कटनी में हुआ. वह बेहद कम उम्र से ही कविताएं लिखने लगीं और पत्र-पत्रिकाओं में छपने भी लगीं.

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जय प्रकाश पाण्डेयनई दिल्ली, 06 February 2019
एक कवि का निजी जीवन उसकी कविताओं में प्रकट हो ही जाता हैः बाबुषा कोहली बाबुषा कोहली

बाबुषा कोहली ने एक बेहद संभावनाशील कवयित्री के रूप में तेजी से अपनी पहचान बनाई है. उनका जन्म 6 फरवरी, 1979 को मध्यप्रदेश के कटनी में हुआ. वह बेहद कम उम्र से ही कविताएं लिखने लगीं और पत्र-पत्रिकाओं में छपने भी लगीं. उनका पहला पहला कविता-संग्रह 'प्रेम गिलहरी दिल अखरोट' भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ.

वह ट्रेंड इंडियन कंटेम्पररी नृत्यांगना होने के साथ ही केंद्रीय विद्यालय में अध्यापन करती हैं. पर बचपन और अल्हड़ता अब भी उनमें कूटकूट कर भरी है. जो लोग उनसे फेसबुक और ट्वीटर पर जुड़े हैं, अकसर ही उनका साबका इस बाबूषा से होता रहता है.

इसी जनवरी में विश्व पुस्तक मेले में उनकी एक किताब 'बावन चिट्ठियां: ब्रह्मांड नाम के महाजन से शून्य का हिसाब है प्रेम' नाम से लोकार्पित हुई. यह किताब रजा फाउंडेशन के सहयोग से राजकमल प्रकाशन ने छापी थी, जिसका रेखांकन चर्चित चित्रकार मनीष पुष्कले ने किया था.

बाबुषा ने उसी किताब के पेज नंबर 124 के हवाले से एक दिन एक ट्वीट किया, 'प्रेम करना उतना ही सरल है जितना कि एक रुपए की च्यूइंगम चबा कर बेस्वाद हो जाने पर उसे थूक देना और प्रेम सहना उतना कठिन है जितना कि उम्र भर माइग्रेन की गोलियां गटकने की सजा काटना.' तय है कवि मन से इतर यह उनके अंदर की एक समझदार लड़की के उद्गार थे. जो समयजन्य अनुभवों से परिपक्व हो रही है.

ट्वीटर पर ही 'छाँव' शीर्षक की उनकी एक कविता  इस बात की गवाही देती हैः

झड़ते नहीं

न दोमुँहे हो रहते

घने होते बढ़ते सतत

हाँ ! उलझते बहुत हैं

वे बाल जो पक रहे हों

प्रेम की धूप में

आख़िर में बादल बन जाते हैं

तय है कविता के साथ-साथ संगीत और यायावरी ने बाबुषा को यह सिखाया है. बाबुषा कोहली ने दो शॉर्ट फिल्मों 'जंतर' व 'उसकी चिठ्ठियाँ' का निर्माण व निर्देशन भी किया है. वह भारतीय ज्ञानपीठ के दसवें नवलेखन पुरस्कार से भी सम्मानित की गईं. उनकी काव्य प्रतिभा उन्हीं की तरह प्रेम से लबालब व चुलबुली है.

एक और कविता उनके सोशल मीडिया पेज से हीः

तुम्हारी कमीज़ की जेब में

रिसी हुई स्याही नहीं मैं

ज्यों धूप परिचय देती सूर्य का

सुगंध फूलों का पता बताती है

बीज उठते हैं पृथ्वी की नाभि से

धरती का श्वास बन

तुम्हारी आत्मा के धवल पृष्ठ पर

तिरछा हस्ताक्षर बन

उभरती हूँ मैं।

बाबुषा अपनी भावनाओं को लगातार पहले डायरी पर और बाद में सोशल मीडिया पर व्यक्त करती रही हैं. उन्हें जबलपुर जि़ला प्रशासन व मध्य प्रदेश पुलिस के संयुक्त तत्त्वावधान में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2015  का विशिष्ट प्रतिभा सम्मान भी मिल चुका है. उनके जन्मदिन पर 'साहित्य आजतक' ने उनसे एक संक्षिप्त बातचीत की. अंशः

1. आप कवयित्री कब बनीं? कब आपको ऐसा लगा कि आप कविताएं लिख सकती हैं?

बाबुषा कोहलीः बचपन से ही लिखा करती थी डायरी में रोज़मर्रा की बातें, मनमानियाँ और अपनी जिज्ञासाएँ. कभी तुक में बाँध कर तो कभी मुक्त. मुझे कभी पता नहीं चला कि मैं कविताएं लिख सकती हूं. मेरे व्यक्तित्त्व का कवि पाठकों की स्थापना है.

2. आपकी कविताओं का मुख्यबिंदु क्या है?

बाबुषा कोहलीः जीवन की बातें.

3. आप अपनी कविताओं के लिए प्रेरणा कहां से हासिल करती हैं?

बाबुषा कोहलीः प्रकृति के हर स्पन्दन से.

4. आप के समकालीन पसंदीदा लेखक और उनकी रचनाएं?

बाबुषा कोहलीः तेजी ग्रोवर, पारुल पुखराज, व्योमेश शुक्ल, गीत चतुर्वेदी, अविनाश मिश्र, अमृत रंजन.

5. अपने निजी जीवन के बारे में, यथा बचपन आदि के बारे में बताइए?

बाबुषा कोहलीः  एक कवि का निजी जीवन उसकी कविताओं में प्रकट हो ही जाता है.... और रही बात बचपन की, तो वह तो अभी तक चल रहा है.

6.  अपनी कोई ताजा कविता ‘साहित्य आजतक‘ के पाठकों के लिए?  

बाबुषा कोहलीः  साहित्य आज तक के  पाठकों के लिए मेरी एक कविता.

एक कवि को

बेपरवाही से सुननी चाहिए तालियाँ

प्यार से गालियाँ

और

ध्यान से झींगुरों का गान.

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