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जन्मदिन विशेषः रामकुमार सिंह के उपन्यास ज़ेड प्लस का अंश

आज लेखक रामकुमार सिंह के जन्मदिन पर साहित्य तक पर पढ़ें उनके उपन्यास 'ज़ेड प्लस' का अंश

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aajtak.in नई दिल्ली, 17 September 2019
जन्मदिन विशेषः रामकुमार सिंह के उपन्यास ज़ेड प्लस का अंश उपन्यास ज़ेड प्लस का कवर [सौजन्यः सार्थक प्रकाशन]

आज लेखक रामकुमार सिंह का जन्मदिन है. उनका जन्म 17 सितंबर, 1975 को राजस्थान के फतेहपुर शेखावाटी के बिरानिया में हुआ. वह एक अच्छे पटकथा लेखक, गीतकार, सिने-समालोचक के रूप में जाना पहचाना नाम है. उनकी कहानी पर आधारित राजस्थानी फिल्म 'भोभर' ने कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में लोकप्रियता का नया मुकाम हासिल किया है. वहीं 'ज़ेड प्लस' उपन्यास पर फिल्म बनी काफी सफल रही.

'ज़ेड प्लस' उपन्यास का नायक असलम पंचरवाला है. उसे गफलत में जेड सिक्युरिटी मिल जाती है. ज़ेड सिक्युरिटी मिलने के बाद उसकी जिंदगी में भूचाल आ जाता है. देश के सर्वोच्च सुरक्षा-घेरे में जकड़ा हुआ असलम समझ नहीं पाता कि ये उसके लिए वरदान है या अभिशाप. पेंचदार, दिलचस्प और थ्रिलर उपन्यासों की-सी रफ्तार से चलता हुआ यह उपन्यास अपनी प्रस्तुति में हिंदी के लोकप्रिय कथा-लेखन के लिए एक गम्भीर और सरकार-सजग प्रस्थान बिन्दु है. आज लेखक रामकुमार सिंह के जन्मदिन पर साहित्य तक पर पढ़ें उनकी इसी पुस्तक का अंश.

पुस्तक अंश: ज़ेड प्लस

प्रधानमंत्री की यात्रा, हबीब मियां से झगड़ा, स्कूटर चोरी और अब जेड सुरक्षा में रहने वाले असलम मियां को इस भागदौड़ में सईदा की याद ना आई हो ऐसा कैसे हो सकता है. पर मुश्किल दूसरी थी. कहने को वह सुरक्षा में था लेकिन असलम पर चौबीसों घंटों पहरा था. राजू पनवाड़ी की दुकान पर जाना तक छूट गया था. यह भी नहीं पता था कि इन बीते दिनों में शहर में क्या घटित हो गया है. जब कलेक्टर को उसने अपनी दुकान तोड़े जाने की शिकायत की थी तभी से उसकी दुकान वापस सही करवा दी गई थी लेकिन समस्या अब दूसरी हो गई.

यह मामूली लोगों का शहर था. वे बोर्ड तो देखते असलम पंक्चरवाला, लेकिन रुके कौन, जब वे देखते कि दुकान के बाहर पुलिस की दो गाड़ियां खड़ी हैं. दो बाइक खड़ी हैं. दस ग्यारह वर्दीधारी बाहर पहरा दे रहे हैं. धंधा ठप होने लगा.

इसका उलट हमीदा के साथ हुआ. उसकी दुकान पर औरतों की ग्राहकी बढ़ गई. वे दिन-भर हमीदा से बतियाने के बहाने ढूंढ़तीं और लगे हाथ जूतियां भी बिक ही जातीं.

असलम की दुकान पर साइकिल भी आए तो उसे सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता. राजेश को हमेशा शक रहता कि जिसने धमकी दी है वह असलम की हत्या साइकिल बम से भी कर सकता है. असलम ने तय कर लिया कि अब वह पंक्चर की दुकान पर नहीं बैठेगा. उसने हमीदा से बात की. इसी बात पर हमीदा और असलम के बीच झगड़ा बढ़ने लगा था. हमीदा हर रोज किसी न किसी बात पर प्रधानमंत्री को भला-बुरा कहती. असलम उसे कहता, प्रधानमंत्री की क्या गलती है?  उन्होंने तो सब भले के लिए किया है. अब इतने दिनों तक लोगों को बार-बार कहते हुए असलम को सचमुच लगने लगा था जैसे उसे पाकिस्तान से धमकी मिली है. यही बात जब उसने हमीदा के सामने कही तो हमीदा चिल्ला पड़ी,  ''मुए, कमाना-धमाना सब छोड़ दिया है, ऊपर से तुम्हें पाकिस्तान मारेगा. इससे अच्छा तो मार ही डाले तुझे. यूं तो लगेगा कि मर गया खसम. अब बच्चे मुझे ही पालने हैं.''

सईदा ऐसी नहीं है. वह बात कितने प्यार से करती है. कितना अच्छा होता हमीदा यदि इकबाल की बीवी होती. दोनों का स्वभाव कितना मिलता है. मेरा स्वभाव तो सईदा से ही मिलता है. लेकिन असलम नई समस्या में भी फंस रहा था. जिसका अहसास उसे अब होनेवाला था.

सईदा इस बात से नाराज थी कि इतने दिन हुए असलम ने खबर ही नहीं ली. दिन-भर चूड़ियों की दुकान पर बैठी सईदा राजू पनवाड़ी की दुकान की तरफ आस लगाए देखती रहती थी कि शायद उसके भूले हरजाई को अपनी सईदा की याद आए. तड़प बराबर की थी. असलम मियां रोज सईदा को याद करते थे लेकिन अब जेड सुरक्षा के चंगुल में घिर गए थे. वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था कि जेड सुरक्षा के साथ सईदा के घर जाया जाए. आखिरकार चोरी-छिपे मिलना अलग बात होती है. इस पूरे तामझाम को वहां ले जाने का सीधा अर्थ था कि पूरे मोहल्ले में, पूरे कस्बे में और उससे भी ज्यादा खतरनाक हमीदा को यह पता चलना कि उसकी एक सौतन उसके पति के पहलू में है. कल्पना मात्र से ही वह कांप जाता. लेकिन इश्क करने वाले क्या कभी रुकते हैं? असलम मियां ने मन ही मन सोचा. इस भागदौड़ और हमीदा के तानों से दूर वो एक दिन के लिए सुकून चाहता था.

''चाहे कुछ भी हो जाए, आज की रात मैं सईदा से मिलने जाऊंगा.”असलम ने मन ही मन तय कर लिया था.

असलम की हालत एक बंधक जैसी हो गई. पैदा होने से लेकर आज तक उसे यह स्मरण नहीं आ रहा था कि वह कभी इतने बंधनों में रहा. वह जब कभी निकलने को होता तो उसके जेड सिक्योरिटी हैड कैप्टन राजेश का वह आग्रह याद आ जाता कि कम से कम आधा घंटे पहले उन लोगों को सूचना दी जाए,  ताकि वे लोग अपनी तैयारी कर सकें. शुरुआती दिनों में ज्यों ही असलम जाने को तैयार होता था,  यह सूचना देता था. असलम अपना लेम्ब्रेटा स्कूटर उठाता और उसके आगे सिक्यूरिटी के दो बाइकर और पीछे एक जिप्सी चलती. इन पर मुस्तैद फौजी रहते.

बाइक इनफील्ड की थी और स्टार्ट होने के साथ ही पूरे मोहल्ले को यह पता चल जाता था कि असलम मियां अब बाजार जा रहे हैं. उसके ठीक पीछे एक गहरे हरे रंग की जिप्सी होती जिसकी छत के बीचो-बीच एक छेद किया गया था. उसके सामने वाले कांच पर एक लोहे की जाली लगी होती थी. छत के बीच वाले छेद से एक आदमी अपना मुंह निकालकर खड़ा होता था. उसके चेहरे पर काले रंग का एक स्कॉर्फ बंधा होता था. अव्वल तो काले रंग का वह फौजी वैसे ही खतरनाक दिखता था. यह स्कार्फ बांध लेने के बाद वह और भी मजबूत और डरावना दिखने लगता था. किसी की मजाल नहीं कि वह बाइक के पीछे और जिप्सी के आगे चल रहे असलम मियां की तरफ आंख उठाकर भी देख सके. कभी बाजार में भीड़ होती तो जिप्सी वाला सायरन भी बजा देता. मोहल्ले वालों में डर था कि कभी असलम मियां को छत से गौर से देख लिया और किसी सुरक्षाकर्मी की उस पर नजर पड़ गई तो उसे तो पक्का गोली का शिकार होना पड़ेगा. यह डर अनायास नहीं आया था.

इस डर की शुरुआत राजू पनवाड़ी की दुकान से हुई थी. हर बात में अपने आपको ज्ञानी समझनेवाले राजू पनवाड़ी ने उस दिन जेड सुरक्षा पर अपना पूरा ज्ञान देने की कोशिश की थी.

पान पर चूना लगाते हुए उसने शरीफ मियां को भड़काने की कोशिश की थी,
''दरगाह की सेवा तो आपने भी की है मियां? आपको तो कोई धमकी नहीं मिली."
''एक नंबर का गोलीबाज है. मैं जानता हूं उसे कोई धमकी-वमकी नहीं मिली. वह सबको उल्लू बना रहा है.''
''देखना एक दिन पोल खुलेगी इसकी.” उम्मीद पर ही दुनिया कायम है वाले अंदाज में शरीफ मियां असलम के पतन के दिनों का इंतजार कर रहे थे. यह भाइयों की आपसी जलन ही थी जैसे असलम के पतन में ही उसके उत्थान का रहस्य छिपा हुआ है.
***
पुस्तक: ज़ेड प्लस
लेखक: रामकुमार सिंह
विधा: उपन्यास
प्रकाशन: सार्थक, राजकमल प्रकाशन का उपक्रम
मूल्य: 125/-रुपए पेपरबैक
पृष्ठ संख्या: 124

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