माँ की वे ममतालु आँखें, प्रकाश मनु की पुस्तक 'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ' का अंश

सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक प्रकाश मनु के विशाल रचना-संसार में एक और मोती. साहित्य आजतक पर उनकी सद्यः प्रकाशित पुस्तक 'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ' का अंश

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aajtak.in नई दिल्ली, 20 June 2019
माँ की वे ममतालु आँखें, प्रकाश मनु की पुस्तक 'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ' का अंश प्रकाश मनु की पुस्तक 'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ' का कवर

सुप्रसिद्ध साहित्यकार, संपादक और बच्चों के प्रिय लेखक प्रकाश मनु ने कई दशकों में फैली लेखन यात्रा के बीच ढेरों काम किए और साहित्य जगत को समृद्ध किया. उनके लेखन में संस्मरण, शोध, साक्षात्कार, कथा, कविता, लेख आदि शामिल हैं. हिंदी के इस सुप्रसिद्ध साहित्यकार और बच्चों के प्रिय लेखक प्रकाश मनु का जीवन कई तरह के झंझावातों, ऊबड़-खाबड़ रास्तों और पगडंडियों से गुजरा है. उन धूल भरे रास्तों से गुजरते हुए उन्होंने जीवन के मर्म को समझा है, तो साथ ही भारतीयता, भारतीय संस्कृति और परंपराओं के मूल उत्स को भी, जिसने उन्हें भीतर से निमज्जित किया और धीरे-धीरे वे लेखक होने की राह पर बढ़े.

'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ' प्रकाश मनु की आत्मकथा का पहला खंड है, जिसमें उनके बचपन, किशोरावस्था और तरुणाई की जोश-खरोश भरी हलचलों का जिक्र है. उन्होंने बड़ी गहन संवेदना के साथ एक ओर अपने शैशव की अबोधता और आत्मलीनता को देखा है, तो दूसरी ओर एक-एक कदम आगे बढ़ाते बचपन को, जिसके साथ अनगिनत किस्से-कहानियाँ और स्मृतियों के न जाने कितने धागे लिपटे हुए हैं. पर इसके साथ ही उन्होंने माँ, पिता, भाई-बहन, उस दौर के मित्रों, अपने प्रिय अध्यापकों और अन्य आत्मीय जनों को भी बड़े प्रेम से याद किया है, जिनकी छल-छल करती स्मृतियाँ इस पूरी आत्मकथा में बिखरी हैं.

जाहिर है, प्रकाश मनु अपनी आत्मकथा में अकेले नहीं हैं, बल्कि इसमें उनके जीवन का पूरा प्रवाह है, समय है, परंपराएँ हैं और उनके बीच अनायास ही बहुत कुछ नया भी निर्मित हो रहा है. इस तरह 'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ' प्रकाश मनु के साथ-साथ उनके समय की भी कथा है. हो सकता है, इस आत्मकथा में बहुत बड़ी घटनाएँ न हों, पर बारीक संवेदना और स्मृतियों के धागे पूरी आत्मकथा में बिखरे हैं.

मनु जी ने उन्हें करीने से सँजोकर एक बृहत कथा में ढाला है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं है. इसलिए यह आत्मकथा सच पूछिए तो जीवन की कहानी है, जीवन के खुले विस्तार की कहानी है, जिसमें हर अध्याय का अपना अलग रस, रंग और स्वाद है.

‘मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ’ प्रकाश मनु के लेखक होने की कहानी भी है. बचपन से ही वे औरों से अलग थे और छोटी-छोटी चीजों पर घंटों सोचते रहते थे. किस्से-कहानियों में उनकी अकूत दिलचस्पी थी और कहानी के पंखों पर उड़ते हुए वे सपने बुनते थे, इस दुनिया को बदलने और कुछ कर गुजरने के सपने. शायद इसी चीज ने उन्हें लेखक बनाया और जीवन का एक अलग रास्ता चुनने के लिए भीतर-बाहर से तैयार किया. बरसों पहले एक साहित्यिक मित्र ने उनसे सवाल पूछा था, 'प्रकाश मनु जी, आप लेखक कैसे हो गए? आपके आसपास कौन सी ऐसी चीज थी, जो आपको लेखक बना रही थी?' इसका जवाब भी शायद यह आत्मकथा ही है'

आशा है, देश के कोने-कोने में फैले प्रकाश मनु जी के पाठकों को उनकी इस आत्मकथा से रचनात्मक संतोष और तृप्ति मिलेगी. साथ ही साहित्य-जगत में इसका उत्साह से स्वागत होगा. याद रहे कि इस आत्मकथा से पहले प्रकाशित उनकी चर्चित कृतियों में उपन्यास; 'यह जो दिल्ली है', 'कथा सर्कस', 'पापा के जाने के बाद' के अलावा कहानी संकलन; 'अंकल को विश नहीं करोगे', 'सुकरात मेरे शहर में', 'अरुंधती उदास है', 'जिंदगीनामा एक जीनियस का', 'तुम कहाँ हो नवीन भाई', 'मिसेज मजूमदार', 'मिनी बस', 'दिलावर खड़ा है', 'मेरी श्रेष्ठ कहानियाँ', 'मेरी इकतीस कहानियाँ', '21 श्रेष्ठ कहानियाँ', 'प्रकाश मनु की लोकप्रिय कहानियाँ' और 'मेरी कथा-यात्रा' शामिल है.

प्रकाश मनु ने कथा साहित्य के अलावा कविताएं, संस्मरण, साक्षात्कार, आलोचना और साहित्येतिहास से संबंधित विचारोत्तेजक लेखन से भी हिंदी साहित्य को समृद्ध किया. उनके काव्य संकलन; 'एक और प्रार्थना', 'छूटता हुआ घर', 'कविता और कविता के बीच' नाम से छपे, तो हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों के लंबे, अनौपचारिक इंटरव्यूज की किताब ‘मुलाकात’ बहुचर्चित रही. ‘यादों का कारवाँ’ में हिंदी के शीर्ष साहित्कारों के संस्मरण. देवेंद्र सत्यार्थी, रामविलास शर्मा, शैलेश मटियानी, रामदरश मिश्र तथा विष्णु खरे के व्यक्तित्व और साहित्यिक अवदान पर गंभीर मूल्यांकनपरक पुस्तकें. साहित्य अकादमी के लिए देवेंद्र सत्यार्थी और विष्णु प्रभाकर पर मोनोग्राफ के अलावा सत्यार्थी जी की संपूर्ण जीवनी ‘देवेंद्र सत्यार्थी: एक सफरनामा’ प्रकाशन विभाग से प्रकाशित हुई. इसके अलावा ‘बीसवीं शताब्दी के अंत में उपन्यास: एक पाठक के नोट्स’ आलोचना में लीक से हटकर एक अलग तरह की पुस्तक है.

प्रकाश मनु के विशाल रचना-संसार में बाल साहित्य की सौ से अधिक पुस्तकें शामिल हैं, जिन्हें बच्चों और बाल साहित्य के अध्येताओं से खूब सराहना मिली. ऐसी रचनाओं में ‘मेरी संपूर्ण बाल कहानियाँ’ (तीन खंड), ‘मेरी संपूर्ण बाल कविताएँ’ तथा ‘मेरे संपूर्ण बाल नाटक’ (दो खंड) सरीखे बृहत् बाल साहित्य संचयन शामिल है. उन्होंने हिंदी में बाल साहित्य का पहला व्यवस्थित इतिहास ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ लिखा. इसके अलावा ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’, ‘हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व’, ‘हिंदी बाल साहित्य के निर्माता’ और ‘हिंदी बाल साहित्य: नई चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ पुस्तकें लिखीं. उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन व संचयन किया. उनकी कई पुस्तकों का पंजाबी, सिंधी, मराठी, कन्नड़ समेत अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

एक खास बात यह भी कि प्रकाश मनु का मूल नाम चंद्रप्रकाश विग है, पर सरकारी दस्तावेजों को छोड़ दें, तो शायद ही उनका यह नाम कहीं प्रचलन में हो. मनु ने इसी नाम से लिखा और कई पुरस्कार भी जीते. वह अपने बाल उपन्यास ‘एक था ठुनठुनिया’ पर साहित्य अकादमी के पहले बाल साहित्य पुरस्कार से नवाजे गए. इसके अलावा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘बाल साहित्य भारती पुरस्कार’ और हिंदी अकादमी के ‘साहित्यकार सम्मान’ से भी सम्मानित हुए. कविता-संग्रह ‘छूटता हुआ घर’ के लिए उन्हें प्रथम गिरिजाकुमार माथुर स्मृति पुरस्कार भी मिला था.

साहित्य आजतक पर सद्यः प्रकाशित उनकी आत्मकथा के पहले खंड- 'मेरी आत्मकथा: रास्ते और पगडंडियाँ' का अंश

आत्मकथा अंशः माँ की वे ममतालु आँखें

                                                - प्रकाश मनु

माँ को याद करता हूँ तो सबसे पहले उनकी आँखें याद आती हैं. वें आँखें जिनमें एक बच्चे का-सा भोलापन था और जानने-समझने की अनवरत जिज्ञासा. इसीलिए हम अपने तईं कोई साधारण-सी बात भी कहते, तो माँ की उत्सुक आँखें फैल जातीं. थोड़ी देर तक अपने ‘सामान्य ज्ञान’ से वे उसे समझने की कोशिश करतीं और फिर अगले ही पल चकित स्वर में कह उठती, "हच्छा...!"

इसीलिए माँ थीं तो जीवन में कोई बनावट नहीं थी, जीवन में कोई जटिलता या असहजता नहीं थी. जीवन में कोई डर नहीं था. माँ, माँ थीं तो आस्था का समंदर भी. जीवन वहाँ ठाठें मारता. कुछ अरसा पहले ‘कथादेश’ में गार्सीया गाब्रिएल मार्केस का इंटरव्यू पढ़ रहा था, जिसका खूबसूरत अनुवाद मंगलेश डबराल ने किया है. उसमें खासकर स्त्रियों को लेकर उन्होंने कुछ अद्भुत बातें कही हैं. उन्हीं में से एक बात यह भी है कि ये स्त्रियाँ ही हैं जो जीवन को थामे रहती हैं. यह जीवन को थामे रहना क्या है और स्त्रियाँ यह काम कैसे करती हैं? इस पर गौर करते हुए मुझे माँ की याद आई. कैसे एक बारीक, बहुत बारीक और अदृश्य तार से उन्होंने हमारे पूरे घर को जोड़ा हुआ था और कैसे उस बारीक तार के न रहने पर बहुत कुछ तिनका-तिनका होकर बिखर गया! इसे याद करता हूँ तो फिर माँ का होना बहुत-बहुत याद आता है.

यों माँ को लेकर दुनिया की तमाम भाषाओं के साहित्य, खासकर लोक साहित्य में कुछ कम नहीं कहा गया. लंबी दाढ़ी और जिंदादिली से भरपूर हमारे घुमंतू साहित्यकार सत्यार्थी जी अकसर एक पुरानी कहावत दोहराया करते थे कि ईश्वर ने माँएँ बनाईं, क्योंकि वह सब जगह उपस्थित नहीं रह सकता था. मुझे लगता है कि माँ को लेकर इससे बड़ी कोई बात शायद ही कही जा सकती हो.

सच तो यह है कि मुझे ईश्वर पर भी भरोसा इसलिए है कि मैंने माँ को देखा है. लगता है, जिसने मेरी माँ को बनाया, वह सचमुच कुछ न कुछ होगा! वह सचमुच महान होगा! जीवन में विश्वास, आस्था, भद्रता और न जाने कौन-कौन सी अच्छी चीजें इसीलिए हैं क्योंकि माँ है और उसका होना हमारे पूरे जीवन में व्याप्त है, उसके न रहने पर भी!

सत्यार्थी जी के जिस विचार की ऊपर चर्चा की है, वह उनके उपन्यास ‘दूध-गाछ’ का तो केंद्रीय विचार या ‘सिगनेचर ट्यून’ ही है. एक और दिलचस्प बात यह है कि ‘दूध-गाछ’ उपन्यास में दूध-गाछ माँ के लिए ही आया है, यानी कि माँ जो ‘दूध का पेड़’ भी है- पूरी दुनिया को तृप्त करने के लिए उगा दूध का दरख्त! सचमुच यह कल्पना ही अनोखी है.

इस दुनिया में माँ का होना भी तो सचमुच ऐसा ही अनोखा है. माँ न होती तो यह दुनिया न इतनी खूबसूरत होती, न अनोखी और न इतने बारीक, परत-दर-परत रहस्यों से भरी!

*
माँ की छवियाँ बचपन की उन निहायत मासूम और धुंधभरी परतों तक फैली हैं जब मुझे अपने और आसपास की शायद ही कोई चेतना रही हो. लेकिन माँ का होना तब भी महसूस होता था. माँ की बातें तब भी अच्छी लगती थीं. शायद इसलिए कि ये बातें सिर्फ बातें नहीं थीं. ये वो प्यारा-सा तिनकों का घोंसला थीं, जिसमें सिर छिपाए-छिपाए, आसपास के ढेर सारे जंजालों से बचता हुआ, मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था.

माँ जब पड़ोसिनों और सहेलियों से बतिया रही होती थीं, तो मुझे अच्छी तरह याद है, एक नन्हे, उत्सुक बच्चे के रूप में मेरा घुसकर उस मंडली में बैठना और गौर से माँ की बातें सुनना. कुक्कू बचपन में मेरा घरेलू नाम था. प्यार से पुकारने का नाम. तो माँ और सहेलियाँ कई बार कटाक्षपूर्ण हँसी हँसते हुए बरज भी दिया करती थीं कि "ओए कुक्कू! तू क्या सुन रहा है? तुझको क्या समझ में आएँगी ये औरतों की बातें!"

और वे बातें क्या हुआ करती थीं, ‘नीं शाणिए, जद मेरा कुक्कू होया सी...!’ या ‘जिस वेले मेरा श्याम होया...!’ या मेरा ‘मेरा किशन, जगन हाले छोटा-ज्या सी...!’ और तब क्या-क्या संकट आए या क्या-क्या आश्चर्यजनक चीजें घटित हुईं, वही सब उन अकथ कहानियों का सार था जिन्हें ‘औरतों की बातें’ कहा जाता था. उन्हीं के बारे में माँ अपनी साथिन स्त्रियों से घंटों तक बतियाती रह सकती थीं और गरमी की लंबी-लंबी दोपहरियाँ और शामें सुख-दुख की इन सहज-सहज बातों के जाल में उलझकर कैसे उड़न-छू हो जाती थीं, यह आज भी मुझे किसी आश्चर्य की नाईं लगता है!

और इतनी ही आश्चर्य की बात यह भी लगती है कि मुझ एक नन्हे बच्चे को इन बातों में ऐसी क्या अकूत दिलचस्पी थी कि बातें समझ में आएँ या न आएँ, मगर वह खत्म होने में न आती थी. और मैं आँखें फैलाए हुए एकटक उन बातों को सुनता, बल्कि पीता था. मेरे लिए दिलचस्पी की बात यही थी कि वे माँ की बातें थीं! पर माँ और उनकी सहेलियाँ जब इतने गौर से मुझे बातें सुनते देखती थीं, तो हँसकर टोक दिया करती थीं, "चल-चल परे हट! तूँ की सुण रेया एँ!" (चलो-चलो, दूर हटो। तुम क्या सुन रहे हो!)

बहुत छुटपन की स्मृति. माँ सिर पर कपड़ों की बड़ी सी गठरी रखे, तालाब पर कपड़े धोने जा रही हैं और मैं साथ हूँ. माँ तालाब के किनारे पड़े पत्थर पर रगड़-रगड़कर कपड़े धो रही हैं और मैं खेतों की मेड़ पर उगे पीले-पीले सुंदर वनफूल तोड़ने और आसपास दौड़ लगाने में मगन हूँ. उन दिनों जानता कम था, लेकिन चीजें महसूस खूब होती थीं. मसलन सर्दियों की गुनगुनी धूप में दौड़ने-भागने और खेलने का सुख क्या है, यह खूब अच्छी तरह महसूस करता था और प्रकृति की अंतरंग सुंदरता को भी! मन तो उत्साह से भरा हुआ-सा पुकारता था, "अरे वाह, तालाब के आसपास के खेतों में सरसों क्या खूब लहक-लहककर उगी है! और सरसों के पीले-पीले फूल ही नहीं, उसकी गंध भी चारों ओर एक झालर-सी रचकर, आसपास के पूरे माहौल को मानो एक अद्भुत उत्सव में ढाल रही है."
 
याद है, उस दिन कोई चार बरस की उम्र में मैंने प्रकृति के अनंत विस्तार की अनुभूति की थी. लगा, मेरा हृदय फैलकर बहुत बड़ा हो गया है और उसमें बहुत कुछ समाता चला जा रहा है. यहाँ तक कि पूरा का पूरा तालाब, आसपास के लह-लह करते खेत और पीले फूलों वाली जंगली झाड़ियाँ भी. यह एक शिशु के मन में जनमी शायद पहली नन्ही कविता थी.

एक और पुराना लेकिन गहरा-गहरा-सा चित्र. माँ एक डोलू में गुड़ के शीरे में डुबोई हुई डोइयाँ (आटे की छोटी-छोटी टिकड़ियाँ) लिए, तालाब के पास ‘गुग्गा’ यानी ‘गोगा पीर’ या फिर कहिए ग्राम देवता को पूजने जा रही हैं और मैं साथ हूँ. पूजा के बाद गुड़ के शीरे में डूबी हुई डोइयाँ मिलती हैं और मुझे लगता है, इससे अधिक स्वादिष्ट चीज दुनिया में कोई और नहीं है. मैं माँगकर और डोइयाँ लेता हूँ. माँ मेरी कटोरी में ढेर सारा शीरा और दो-एक डोइयाँ रख देती है और मुझे लगता है, दुनिया सचमुच कितनी खूबसूरत और स्वाद भरी है!

याद आता है, माँ नहाते समय कुछ पंक्तियाँ दोहराया करती थीं. इनमें ये दो पंक्तियाँ जरूर होती थीं, "गंगे मल-मल नहाइए, स्त्री दा जनम कदी न पाइए...!" माँ बार-बार इन पंक्तियों को दोहराती थीं, मानो इन्हें बार-बार दोहराना ही उन्हें किसी ‘मुक्ति आश्वासन’ की तरह लगता हो. स्त्री का जीवन कष्टकारी है, पर उसे बदलने के बजाय बस प्रार्थना करनी चाहिए, शायद यही बस माँ के हिस्से का ‘सच’ रहा होगा! इस सच की सीमा हो सकती है पर इस सच को साकार करने की माँ की साधना की कोई सीमा नहीं थी.

यों माँ का जीवन दुख, निराशा या किसी किस्म की हीनता से मलिन न था. वे कमेरी थीं और हर दिन उत्साह से नए दिन का स्वागत करती थीं. याद आती है कोई आधी सदी से भी अधिक पुरानी सर्दियों की सुबह. हम लोग तब छोटे-छोटे थे. बड़ी भोर में उठकर, अभी हम बिस्तर पर ही होते थे कि माँ किसी चिड़िया की तरह धीमे-धीमे गुन-गुन करके एक गीत छेड़ देती थीं. और हम अनजाने ही उसे दोहराने लगते थे. सचमुच बड़ी मिठास थी इन गीत में और यह एक मीठी और उत्साह भरी भोर के स्वागत-गान सा लगता था-

उठ जाग सवेरे!
गुराँ दा ध्यान,
गंगा इश्नान.
हथ विच लोटा,
मोढे लोई,
राम जी दी गउआँ
सीता दी रसोई...!

(उठो, बड़ी सुबह-सवेरे उठ जाओ. गुरुओं का ध्यान और गंगा-स्नान करो. हाथ में लोटा और कंधे पर दुशाला. राम जी गउएँ चरा रहे हैं और माँ सीता रसोई तैयार कर रही हैं.)

गीत क्या था, मानो हिंदुस्तानी दांपत्य का आदर्श सामने रखा गया था. एक कर्मलीन जीवन का सीधा-सादा चित्र....काफी लंबा गीत था. धीरे-धीरे बड़ी आरामदारी की-सी सहज, मंथर लय में आगे बढ़ता हुआ. और इसी में आगे चलकर एक पंक्ति आती थी जो मुझे बड़ी प्यारी लगती थी, "चिड़ियाँ वी चुनगुन लाया ई, उठ, जाग सवेरे!!" (चिड़ियों ने भी चुनगुन का राग छेड़ दिया है. बड़ी सुबह-सवेरे उठ जाओ.)

इसी तरह याद पड़ता है कि गायत्री मंत्र भी मुझे पहलेपहल माँ से ही सुनने को मिला. बल्कि सर्दियों की एक सुबह, माँ ने अपनी मीठी, खरखरी आवाज में मुझे यह मंत्र अच्छी तरह याद करा दिया था. आज जब कि नाना जी के असाधारण व्यक्तित्व के बारे में कश्मीरी भाईसाहब से काफी कुछ सुन चुका हूँ, मैं कल्पना कर सकता हूँ कि मेरे विद्वान नाना जी ने कैसे माँ को यह गायत्री मंत्र याद कराया होगा! और जब माँ से वही मंत्र किसी जादुई प्रभाव से मुझ तक आ गया तो मानो माँ के रूप में नाना जी ही वह मंत्र मुझे याद करा रहे थे! जीवन के विकास का यही तो शाश्वत मंत्र है. और यह जितना सीधा-सरल है, उतना ही रहस्यमय भी!

*
माँ की सुनाई कहानियों की भी मुझे खूब अच्छी तरह याद है. इनमें एक तो ‘अधकू’ वाली कहानी थी, जिसका मुझ पर खासा असर पड़ा था. हालाँकि यह कहानी शायद जस की तस मुझे याद नहीं रह गई. इस कहानी को मैंने थोड़ा अलग रूप देकर अपनी बाल कहानियों की पुस्तक ‘इक्यावन बाल कहानियाँ’ में शामिल किया है. पिछले दिनों कश्मीरी भाईसाहब मेरी बाल कहानियों की किताब पढ़कर इस कहानी की चर्चा कर रहे थे, तो एकाएक उनकी बड़े जोरों की हँसी छूट गई. जाहिर है, इस कहानी को पढ़ते-पढ़ते वे भी मेरी तरह अपने बचपन की सीढ़ियाँ उतरकर बचपन के जादुई संसार में चले गए होंगे! शायद यही असर होता है, बचपन में माँ से सुनी हुई कहानियाँ का.

इसी तरह माँ से सुनी कहानियों में एक थी सात कोठरियों वाली कहानी. राजकुमार से कहा जाता है कि वह इस महल की छह कोठरियाँ देख ले, लेकिन सातवीं नहीं. वरना वह मुसीबतों में फँस जाएगा. राजकुमार छह कोठरियाँ देखता है, लेकिन फिर सातवीं कोठरी देखने से भी खुद को रोक नहीं पाता. होने दो जो होता है, पर एक बार तो मैं देखकर रहूँगा कि क्या है सातवीं कोठरी में? वह सोचता है. जिद ठान लेता है. और सचमुच सातवीं कोठरी में प्रवेश के साथ ही मुश्किलें एक के बाद एक भयंकर आँधी, पानी, तूफान की तरह- या फिर एक भीषण पंजों वाले गिद्ध की तरह उस पर टूट पड़ती हैं. पर वह हिम्मत नहीं हारता, बहादुरी से उन्हें झेलता है और आखिर एक दिन सफलता के ऊँचे शिखर पर खड़ा हुआ नजर आता है....

माँ से यह कहानी सुनते हुए लगता था कि चाहे जो हो, मैं भी सातवीं कोठरी में जाकर देखूँगा कि वहाँ भला कौन-सा रहस्य छिपा हुआ है. फिर चाहे जिऊँ या मरूँ! तब चाहे न सोचा हो, पर अब कई बार मैं हैरान होकर सोचता हूँ- तो क्या साहित्य की दुनिया में आना वही सातवीं कोठरी में झाँकना है जिसमें रहस्य ही रहस्य भरे पड़े हैं और अपनी तरह के ‘खतरे’ भी? मैं हैरानी से सोचता हूँ और बड़े ताज्जुब से भर जाता हूँ कि एक ही कहानी अगर वह सचमुच जी लगाकर सुनी-सुनाई गई हो, तो कितने लोगों के लिए कितने भिन्न आशय खोल सकती है. बचपन में सुनी कहानियों की शायद यही ताकत भी है. हमारी माँएँ शायद इसी तरह सदियों से बुराई पर अच्छाई की विजय का मंत्र हमें पिलाती रही हैं! भले ही इसका महत्व बहुत ‘अंग्रेजी’ पढ़े समाजविज्ञानियों को अभी ठीक-ठीक समझ में न आया हो!

और मेरे लिए तो यह अतिरिक्त सुख की तरह है कि माँ अपनी सुनाई कहानियों में छिपी हुई हैं. जब चाहा, वहाँ जाकर उन्हें देख और सुन लिया....

माँ की सुनाई कहानियों में दो-एक कहानियाँ ऐसी भी थीं जिनके जरिए माँ शायद अपने माँ होने या स्त्री होने की तकलीफ को हमारे साथ बाँटना चाहती थीं या कहिए कि एक किस्म का पाठ पढ़ाना चाहती थीं. इनमें एक कहानी में बेटा जो अब अच्छा कमाने-धमाने लगा है, बड़ा होने पर माँ के त्याग का मोल चुकाना चाहता है. वह बार-बार पूछता है, "बोल न माँ, मैं तेरे लिए क्या लाऊँ?" माँ चुप रहती है. बहुत पूछने पर हँसकर कह देती है, "रहने दे बेटा, क्यों तकलीफ झेलता है?" बेटे के बहुत जिद करने पर माँ आखिरकार कहती है कि अच्छा बेटा, समय आने पर कहूँगी.
 
उसी रात को बेटा सोया तो माँ ने उसकी खाट पर लोटे से जरा-सा पानी डाल दिया. लड़का हड़बड़ाकर उठा. पूछा, "माँ...माँ, यह क्या?" माँ बोली, "पता नहीं बेटा, मुझसे कैसे गिर गया. खैर, तू परेशान न हो, सो जा!"

लड़के को नींद आई ही थी कि माँ ने फिर पानी गिरा दिया. अब तो वह बुरी तरह खीज उठा. चिल्लाकर बोला, "माँ, आज तू मुझे सोने देगी कि नहीं?" इस पर माँ ने बड़े ममतालु स्वर में कहा, "चैन से सो बेटे, पर एक बात याद रख. जब तू छोटा था तो रात में न जाने कितनी बार तू पेशाब करता था. पर मैं तुझे सूखे में सुलाती थी, खुद गीले में सो जाती थी. कभी गुस्सा नहीं आता था. पर तू तो बेटा, दो बार में ही परेशान हो गया. तो भला माँ का ऋण तू कैसे उतारेगा?"

कहानी सुनते हुए उस बेटे पर बड़ा गुस्सा आया था जो जरा सी देर में माँ पर झल्ला पड़ा था. मैंने सोचा, मैं तो ऐसा बेटा नहीं बनूँगा. पर क्या मैं सचमुच एक अच्छा बेटा बन सका? आज सोचता हूँ तो अपने ऊपर शर्म आती है.

माँ की कई कहानियों में अद्भुत फैंटेसी भी थी. मसलन माँ की एक कहानी हजारों साल पहले की उस आश्चर्यजनक ‘आदिम’ दुनिया की कहानी थी जिसमें लोग अपने सिर को हँड़िया की तरह उतारकर गोद में रख लेते थे ओर जूएँ बीनते थे. खासकर स्त्रियों को चैन से जूएँ बीनने का अवसर मिल जाता था. धूप में बैठे-बैठे मजे में जूँएँ बीनते रहो.
 
लेकिन फिर एक गड़बड़झाला हो गया. सचमुच अजीब गड़बड़झाला! हुआ यह है कि एक स्त्री ऐसा करते हुए, घरेलू व्यस्तताओं में अपने सिर को कहीं इधर-उधर रखकर भूल गई और दूसरे कामों में लग गई. पीछे से बंदर आया और उसके सिर को उठा ले गया. अब वह स्त्री यहाँ-वहाँ अपना सिर ढूँढ़ रही है, मगर सिर है कि मिल ही नहीं रहा. फिर पता चला कि सिर तो सामने पेड़ पर बैठे हुए बंदर के पास है जो बहुत मिन्नतें करने के बाद बमुश्किल उसे देने को राजी हुआ. उस दिन के बाद से भगवान ने अपनी सृष्टि में तब्दीली की और तब से सबके सिर पक्के जुड़े होने लगे....माँ की भोली दुनिया का एक भोला सच!

अलबत्ता यह हँड़िया की तरह सिर को गोदी में रखकर जूएँ बीनने की कल्पना ऐसी मजेदार थी कि हँसते-हँसते हम लोटपोट हो जाते. और आज भी जब इस कल्पना के बारे में सोचता हूँ, तो हँसी आए बगैर नहीं रहती.

इसी तरह एक मजेदार कहानी थी ‘गिठमुठिए’ की. कल्पना का एक और अश्चर्यलोक! क्योंकि यह कहानी भी एक अद्भुत दुनिया में रहने वाले अद्भुत प्राणियों की थी. गिठमुठिए माने ऐसे लोग जो खड़े हों तो एक ‘गिठ’ यानी बालिस्त भर के हों ओर बैठें तो एक मुट्ठी भर के! ऐसे लोग पाताल से निकलकर धरती पर आते थे और फिर क्या-क्या न हो जाता था! मगर एक बात तय थी कि ये कोई बुरे लोग न थे. भले प्राणी थे जो मुसीबत में धरती के वासियों की मदद करने आते थे.

बाद में मैंने देशी-विदेशी परीकथाओं में बौनों के बारे में तमाम किस्से-कहानियाँ पढ़ीं. बहुत सी तो ग्रिम बंधुओं की परीकथाओं में भी हैं. बौनों को लेकर लिखी गई ज्यादातर परीकथाएँ बड़ी दिलचस्प हैं, पर उनमें एक भी गिठमुठिए जैसी मजेदार नहीं है. हो सकता है, माँ ने भी यह कहानी बचपन में अपनी माँ से सुनी हो. इस लिहाज से परीकथाओं की भारतीय परंपरा भी एकदम नई तो नहीं है. और उसमें अगर लोककथाओं को भी जोड़ लिया जाए, तब तो यह परंपरा सदियों पुरानी ठहरती है.

ऐसा नहीं कि माँ की कहानियों में यथार्थ न हो, पर यथार्थ की उस अभिव्यक्ति में फैंटेसी घुली-मिली रहती थी. मुझे याद पड़ता है, माँ की एक हैरतअंगेज कहानी ‘भूख’ को लेकर थी और इसे वे गांधारी से जोड़ती थीं. महाभारत युद्ध में गांधारी के सौ पुत्र मारे गए थे. शोक के मारे उसका बुरा हाल था. गांधारी के बहुत रोने-पीटने के बाद, कृष्ण ने उसे दिलासा देते हुए शोक का परित्याग करने और कुछ खा लेने के लिए कहा. पर गांधारी नहीं मानी. आखिर कृष्ण समझा-बुझाकर चले गए. युद्ध के मैदान में अकेली गांधारी रह गई. आधी रात के समय गांधारी को जोर से भूख लगी. रोते-रोते उसका ध्यान सामने झाड़ पर लगे एक बेर पर गया. उसने सोचा, "रोने के लिए अभी रात पड़ी है. एक बेर ही खा लूँ तो थोड़ी जान आए." सोचकर उसने बेर को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो बेर ऊँचा हो गया.

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