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Book Fair 2020: पत्रकार पीयूष पांडे का व्यंग्य संग्रह ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ रिलीज

दिल्ली में जारी पुस्कत मेला में रविवार को व्यंग्यकार और पत्रकार पीयूष पांडे का व्यंग्य संग्रह कबीरा बैठा डिबेट में का विमोचन हुआ, इस दौरान कई बड़ी हस्तियां मौजूद रहीं.

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 06 January 2020
Book Fair 2020: पत्रकार पीयूष पांडे का व्यंग्य संग्रह ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ रिलीज कबीरा बैठा डिबेट का विमोचन

देश में जब आजकल राजनीतिक माहौल इतना गर्मा गया है और हर कोई अपनी बात लोगों तक पहुंचाना चाहता है. तब ऐसे माहौल के बीच हंसना बहुत जरूरी है, इसके लिए व्यंग्य से बेहतर कुछ भी नहीं है. क्योंकि व्यंग्य आपका संदेश भी देता है और हंसने का मौका भी. दिल्ली में जारी पुस्कत मेला में रविवार को व्यंग्यकार और पत्रकार पीयूष पांडे का व्यंग्य संग्रह ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ का विमोचन हुआ, इस दौरान कई बड़ी हस्तियां मौजूद रहीं.

किताब के लॉन्च के दौरान पीयूष ने अपनी पुस्तक की अग्रिम रॉयल्टी को यमुना बचाने में जुटे गैर सरकारी संगठन ब्रज हेरीटेज कंजरवेशन सोसाइटी को दान देने का ऐलान किया. इस अवसर पर पीयूष ने कहा, “ यमुना की तरफ ध्यान दिया जाना जरुरी है. इस दिशा में मेरी ये छोटी सी कोशिश है. मेरा मानना है कि लेखकों को अवॉर्ड वापसी नहीं, रॉयल्टी दान देनी चाहिए ताकि जरुरी मुद्दों पर सार्थक भागीदारी हो सके. ये भी एक व्यंग्य विषय ही है कि अवॉर्ड वापसी करने वाले और पुरस्कार की जुगाड़-तुगाड़ करने वाले साहित्यकारों के एक बड़े वर्ग का जमीनी मुद्दों से कोई जुड़ाव ही नहीं होता.”

दिग्गजों ने भी सराहा
व्यंग्य संग्रह ‘कबीरा बैठा डिबेट में’ का लोकार्पण जाने माने कवि व व्यंग्यकार अशोक चक्रधर ने किया. इस अवसर पर प्रोफेसर अशोक चक्रधर ने कहा, “यमुना के संरक्षण के लिए रॉयल्दी दान की पीयूष की पहल अद्भुत है. मुझे लगता है कि अब इस पर विमर्श शुरु होगा. जहां तक पीयूष के व्यंग्य की बात है तो उनकी अपनी अलग शैली है. उनके पास विषयों की विविधता है और वो जिस अंदाज में कटाक्ष करते हैं, वो दिल को छूता है और दूसरों से उन्हें अलग खड़ा करता है.”

इस अवसर पर वरिष्ठ व्यंग्यकार आलोक पुराणिक ने कहा, “पीयूष ने अग्रिम रॉयल्टी दान देकर एक नई शुरुआत की है, जिसे आगे बढ़ना चाहिए. लेकिन, सच ये भी है कि हिन्दी के ज्यादातर लेखक बेचारों की श्रेणी में आते हैं और खुद पैसे देकर किताब छपवाते हैं. उन्हें रॉयल्टी मिलती ही नहीं तो दान कैसे करेंगे.’’

क्यों खास है ये व्यंग्य संग्रह?
पीयूष पांडे के इस व्यंग्य संग्रह में 65 व्यंग्य हैं, जिसमें किसी व्यंग्य में टिकटॉक के जरिए समाजवाद लाने की परिकल्पना है तो किसी में अनुप्रास अलंकार वाली टीवी पत्रकारिता पर कटाक्ष है. पीयूष ने बताया, ‘मैं खुद बीते 17-18 साल से टीवी मीडिया से जुड़ा हूं तो कई व्यंग्य अनायास मीडिया को केंद्र में रखकर लिखे गए हैं लेकिन आप किताब पलटेंगे तो देखेंगे कि व्यंग्य संग्रह एक गुलदस्ते की तरह है, जिसमें कई रंगों के फूल हैं.”
गौरतलब है कि पीयूष पांडे इससे पहले ‘छिछोरेबाजी का रिजोल्यूशन’ और ‘धंधे मातरम्’ नाम से दो व्यंग्य संग्रह लिख चुके हैं.

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