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कुंवर नारायण ने चाहा था, हिंदी आत्म-संस्कृति और जीवन-विवेक की समर्थ आवाज़ बने

हमारे दौर के सर्वाधिक प्रतिभाशाली कवियों में से एक कुंवर नारायण की आज जयंती है. इस अवसर पर उनकी पुस्तक 'शब्द और देशकाल' का यह अंश 'हिन्दी का भविष्य- भविष्य की हिन्दी' साहित्य आजतक पर पढ़ेंः

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aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 19 September 2019
कुंवर नारायण ने चाहा था, हिंदी आत्म-संस्कृति और जीवन-विवेक की समर्थ आवाज़ बने कुंवर नारायण की पुस्तक: शब्द और देशकाल का कवर

हमारे दौर के सर्वाधिक प्रतिभाशाली कवियों में से एक कुंवर नारायण की आज जयंती है. 19 सितंबर, 1927 को कुंवर नारायण का जन्म हुआ. उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से 1951 में अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया. 1973 से 1979 तक वह 'संगीत नाटक अकादमी' के उप-पीठाध्यक्ष भी रहे. 1975 से 1978 तक वह सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका के सम्पादक मंडल के सदस्य भी रहे.
साल 2005 में कुंवर नारायण को साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा उन्हें 1995 में साहित्य अकादमी पुरस्कार व 2009 में देश के दूसरे सबसे बड़े सम्मान 'पद्म विभूषण' से भी अलंकृत किया गया था. 90 साल की उम्र में जब कुंवर नारायण का 15 नवंबर, 2017 को देहावसान हुआ था, तब तक हिंदी साहित्य उनकी कविताओं से काफी समृद्ध हो चुका था.
कुंवर नारायण ने हिंदी साहित्य को अपनी विविध कृतियों से नवाजा. उनके काव्य-लक्ष्य जितने उजले थे, उतनी ही उजली मनुष्य-मात्र में उनकी आस्था थी. कहा जाता है कि कुंवर नारायण की कविताएं अपने समय से संवाद थीं. उनमें अस्तित्व की अनुगूंज है. उनकी रचनाओं में कविता संग्रह: चक्रव्यूह, तीसरा सप्तक, परिवेश: हम तुम, आत्मजयी, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं,  इन दिनों, वाजश्रवा के बहाने, हाशिये का गवाह प्रमुख हैं, तो कहानी संग्रह: आकारों के आसपास और समीक्षा पुस्तक: आज और आज से पहले जैसी कृतियां काफी चर्चित रहीं.
'शब्द और देशकाल' नामक पुस्तक उन की विचार संपदा का एक अनूठा उदाहरण है. इसमें विभिन्न अवसरों पर दिए गए व्याख्या के साथ लेख भी हैं. भाषा, साहित्य, समाज, मीडिया, अनुवाद और अन्य प्रश्नों पर केंद्रित उनके विचार ध्यानपूर्वक पढ़े जाने की मांग करते हैं. विश्व-विवेक के साथ चिन्तन करनेवाले, कुंवर नारायण के ये लेख पाठक को तात्विक रूप से समृद्ध करते हैं. कुंवर जी साहित्य को केवल साहित्य की दृष्टि से नहीं बल्कि अर्थशास्त्र, विज्ञान, राजनीतिक, इतिहास, शास्त्रों आदि की दृष्टि से भी देखते हैं. इसके मूल में साहित्य के प्रति उन की अखंड आस्था है जिसकी तरफ वे संकेत करते हैं, ''साहित्य की 'जगह' कितनी ही छोटी क्यों न हो, 'समय' बड़ा होता है." आज कुंवर नारायण की जयंती पर उनकी पुस्तक 'शब्द और देशकाल' का यह अंश साहित्य आजतक पर पढ़ेंः

हिन्दी का भविष्य- भविष्य की हिन्दी
मैं ठेठ शास्त्रीय अर्थों में भाषाविद् नहीं हूँ, न ही साहित्य का सिद्धान्तकार, लेकिन एक कवि और लेखक की हैसियत से हिन्दी भाषा को रचनात्मक ढंग से बरतने के अपने अनुभवों के आधार पर कुछ बातें कहना चाहूँगा.
हिन्दी इस समय संसार में बोली जाने वाली प्रमुख भाषाओं में से मानी जाती है. अन्य भाषाएं अंग्रेज़ी, चीनी और स्पानी-मूल की भाषाएँ हैं. भाषाई आंकड़े बताते हैं कि इस समय दुनिया में 6000 से अधिक भाषाएं बोली जा रही हैं लेकिन जिस तेज़ी से छोटी भाषाओं का लोप हो रहा है उससे यह अन्देशा भी पुष्ट होता लगता है कि इस सहस्राब्दि के अन्त होते-होते इनमें से 600 भाषाएं भी नहीं बचेंगी! हिन्दी का भाषाई भविष्य उज्ज्वल है. एक रचनाकार की दृष्टि से- ‘परिवर्तन’ और ‘विकास’ के बीच एक बारीक़ फ़र्क करते हुए- तेज़ी से बदलती हुई हिन्दी भाषा की नब्ज़ को पढ़ने की कोशिश करता हूं.
यह ‘बदलाव’, और उसकी ‘तेज़ी’,  हिन्दी के स्वभाव पर किस तरह का गुणात्मक असर डाल रहे हैं? यह गुणात्मक-पक्ष साहित्य के लिए ख़ास माने रखता है जो मूलतः ‘मानवीय’ और जीवन का ‘आत्मीय’ पक्ष है. वह साहित्य में कई-कई तरह प्रतिबिम्बित और अभिव्यंजित होता है. वह भाषा सबसे पहले आपसी सौहार्द्र, सहानुभूति, सौजन्य और सहिष्णुता की दीर्घ संस्कृति की भाषा है, जिसमें हम अपने एक सभ्य मनुष्य होने की सबसे मूल्यवान छवि को पहचानते हैं. सहज ही ध्यान जाता है कि हिन्दी भाषा ने मेरा मतलब यहां हिन्दी के उस व्यापक परिप्रेक्ष्य से है जिसमें उर्दू और स्थानीय बोलियों का साहित्य शामिल है. विश्व-स्तरीय और कालजयी साहित्य तब भी दिया है जब वह ‘वैश्विक भाषा’ नहीं थी, केवल छोटे-छोटे ‘क्षेत्रों’ की भाषा थी.
वह समय भी याद आता है जब पूरे भारत को एक भावनात्मक सूत्र में जोड़े रखने का काम भक्ति-कालीन काव्य और कलाओं द्वारा सम्भव हुआ- राजनीतिक स्पर्द्धाओं और मार-काट के बावजूद. आज भी दुनिया की तमाम छोटी-छोटी भाषाएं विश्व-स्तरीय महान साहित्य दे रही हैं. नोबेल-पुरस्कार विजेताओं की लिस्ट पर एक नज़र डालना ही काफ़ी होगा इस तथ्य को पुष्ट करने के लिए कि ‘बड़े’ साहित्य की रचना के लिए ‘बड़ी’ भाषा अनिवार्य नहीं है. अंग्रेज़ी भी एक छोटी ही भाषा थी जब शेक्सपियर की रचनाओं ने उसे एक बहुत बड़ी भाषा बना दिया.
 इसी तरह अवधी और बृज की असाधारण भाषाई क्षमता को कबीर, जायसी, तुलसी, सूर आदि की साहित्यिक देन के बिना पूरी तरह नहीं समझा जा सकता. एक दुस्साहसिक ढंग का सोच भी मन में आता है कि बड़े साहित्य के लिए शायद बड़ी भाषा कोई बहुत बड़ा वरदान नहीं है. एक भाषा का विस्तार कई कारणों से होता है- प्रमुखतः तिजारती, औद्योगिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि कारणों से. ये ही कारण आज हिन्दी भाषा के विस्तार के पीछे भी साफ़  पहचाने जा सकते हैं. राजनीतिक, आर्थिक और औद्योगिक दृष्टि से भारत और चीन अब पिछड़े हुए देश नहीं हैं. इस विकास के साथ-साथ ही भाषा का महत्त्व भी न केवल बढ़ा है बल्कि उनका ‘इस्तेमाल’ भी बदला है और बहुत तेज़ी से बदल रहा है- लगभग मशीन-युग की रफ़्तार से. मोटे तौर पर कहें तो भाषा ‘मानवीय’ से अधिक ‘मशीनी’ होती जा रही है!
भाषा के मानवीय गुणों की अपेक्षा उसके व्यावसायिक और लेन-देन के मुहावरे और शब्दावली ज़्यादा कामकाज के लगते हैं, अतः ज़्यादा प्रासंगिक. आपसी सम्बन्धों, हमदर्दी और गहरे मानवीय सरोकारों की भाषा बेजान-सी लगती है. यह केवल एक भाषाई संकट नहीं है, भाषा पर पड़नेवाले उस संकट की छाया है जो आज के क्रमशः संवेदनहीन होते जा रहे जीवन की ओर इशारा करता है. आज भी जब हम एक लोकगीत को सुनते हैं या आंचलिक काव्य या उपन्यास को पढ़ते हैं तो उसमें भाषा की एक ख़ास तरह की कोमलता, भावनात्मक ईमानदारी और आत्मीय भाई-चारे की गरिमा को बरक़रार पाते हैं.
आज के औद्योगिक, व्यावसायिक और उपभोक्ता समाज में जो बिलकुल अस्थायी और मतलबी सम्बन्ध बन रहे हैं. उनकी भाषा में गहरे और उदात्त मानवीय सम्बन्धों और सोच-विचार के लिए कितनी जगह बचती है यह चिन्ता केवल साहित्य की ही नहीं, हर आदमी की होनी चाहिए.  छोटी भाषाओं से आ रहे साहित्य में अगर आपसदारी है, कि ये भाषाएँ आज भी अपनी घनिष्ठता और ऊष्मा में बची हुई हैं, तो इसका बहुत बड़ा कारण वह जीवन-शैली भी है जो बड़े शहरों की अपेक्षा छोटी जगहों में कम बदलती है.
भाषा में परिवर्तन और विकास जीवन के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा होता है जिसे व्याकरण के नियम नहीं जीवन की गति निर्धारित करती है, मूलतः जैविक ढंग से. संस्कृत से आज की हिन्दी तक की विकास-यात्रा को भी लगभग उसी तरह समझा जा सकता है जैसे हम आदमी की लम्बी ऐतिहासिक जीवन-यात्रा को समझते हैं.
जिस तरह हम जीवन और इतिहास की गतियों को एक सीधी रेखा में रखकर नहीं सोच सकते, बहुत कुछ भाषा की गति भी उसी तरह जटिल और टेढ़ी-मेढ़ी चलती है. गंगा नदी अपने उद्गम पर जो होती है, बंगाल की खाड़ी में गिरनेवाली नदी वही गंगा नहीं होती. उसमें बीच के प्रदेशों में बहनेवाली तमाम छोटी-बड़ी नदियों का पानी भी इस तरह शामिल हो चुका होता है कि उन्हें फिर से अलग नहीं किया जा सकता. वे सब गंगा की मुख्यधारा बन जाती हैं. हिन्दी भाषा के विकास को भी कुछ-कुछ इसी तरह समझा जाना चाहिए.
भाषा के विस्तार के साथ ‘अमानवीयकरण’ की समस्या को उठाते समय किसी सरल नतीजे पर पहुंचने की जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए. भाषा केवल एक या दो स्तरों पर ही नहीं कई स्तरों पर एक साथ विकसित होती है. भौतिक जीवन में बदलाव के साथ भाषा की ऊपरी सतह पर बदलाव- यानी हमारी बोलचाल, व्यवहार, लेन-देन, वाणिज्य, व्यापार आदि की भाषा में- सबसे पहले और सबसे स्पष्ट दिखाई देता है लेकिन, आदमी के स्वभाव की ही तरह, उसकी भाषा की भी कई आंतरिक परत होती हैं. वे आसानी से नहीं बदलतीं क्योंकि उनमें सदियों के संस्कार और चिन्तन की स्मृतियां अगोचर रूप से दबी-छिपी विद्यमान रहती हैं.
मोटे तौर पर इसे भाषा का ‘अवचेतन’ कह सकते हैं, जो ‘निजी’ से ‘सामूहिक’ तक एक अटूट मानसिक जुड़ाव रखता है. इस सूत्रबद्धता की कुंजी कहीं हमारे जीन्स में है, इसीलिए जीवन और भाषा के विकास की गति जुड़वां मानी गई है.
एक भाषा का बहुस्तरीय होना उसकी जागरूकता की निशानी है. वह अगर एक स्तर पर बोलचाल, लेन-देन, लोक-जीवन की व्यावहारिक भाषा हो सकती है तो दूसरे स्तर पर सोच-विचार, चिन्तन-मनन, अध्ययन-ज्ञान की गूढ़ भाषा भी. दोनों पर ऊंच-नीच का तर्क लागू नहीं होता. ये भाषा के दो बिलकुल भिन्न तरह के उपयोग हैं तथा उसकी सामर्थ्य को बतलाते हैं. भाषा न केवल अपने को दैनिक जीवन के स्तर पर रचती है बल्कि वैचारिक और आत्म-चिन्तन के स्तर पर भी, और भाषा के ये दोनों ही पक्ष जायज़ हैं क्योंकि दोनों मिलकर हमें एक बृहद् जीवन-दृष्टि देते हैं.
इसी तरह साहित्य और कलाओं की भाषाएं भी इस माने में विशिष्ट और जायज़ भाषाएं हैं कि वे जीवन की एक भिन्न प्रकार की व्यंजना और अभिव्यक्ति को सम्भव बनाती हैं. जीवन की ही तरह भाषा की भी इस ‘भिन्नता’ को बिना उदारता से स्वीकार किए हम उसकी समग्र जीवन-शक्ति को आत्मसात् नहीं कर पाएंगे.
हिन्दी भाषा के भविष्य को सोचते हुए कुछ बातें ख़ासतौर पर मन में उठती हैं. हिन्दी भाषा की ‘प्रकृति’ में हजारों साल के अच्छे-बुरे ऐतिहासिक अनुभवों की यादें घुली-मिली हैं. इसमें ज़मीनी सच्चाई भी है और अनेक उदात्त विचारों और कलाओं के अनुभव भी. सैकड़ों वर्षों के गहन वैदिक, वेदान्तिक, सूफ़ी- चिन्तन, कलाओं और काव्य ने भाषा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है, जिसे आज भी हिन्दी भाषा के स्वभाव से अलग कर पाना मुश्किल हो जाता है. विचारों, साहित्यों और कलाओं का दबाव भी एक भाषा को अपनी तरह रचता और उसे सक्षम बनाता है. कभी-कभी यह प्रभाव दैनिक यथार्थ के दबावों से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली होता है.
 जब बौद्ध-विचार मध्य एशिया में फैला तो एशिया की शायद ही ऐसी कोई भाषा रही हो जो उससे अप्रभावित रही हो. अनेक भाषाओं में बुद्ध के विचारों के लिए एक भिन्न स्तर की भाषा निर्मित हुई. आधुनिक समय में भी हम देखते हैं कि किसी बड़े विचार के साथ उसकी अपनी एक विशिष्ट भाषा, विमर्श की भाषा, भी आती है. उसका अपना एक दबदबा होता है और कभी-कभी वह देर तक और दूर तक सामान्य भाषा पर छाया रहता है. आधुनिक समय में विज्ञान के साथ तर्क और विश्लेषण जैसे शब्दों का दबदबा लगभग हर प्रकार की सोच की भाषा पर हावी रहा है. मार्क्स और फ्रायड का चिन्तन इसका प्रमुख उदाहरण है. जिन्होंने बीसवीं सदी की पूरी सोच को दूर तक प्रभावित किया है. जो तर्कसंगत है वही सही है. यह बात कुछ इतनी पक्की तरह हमारे दिमाग़़ों में बैठ गई है या बैठा दी गई है, कि कोई सच्चाई तर्क से परे भी हो सकती है इसे हम विचारणीय ही नहीं मानना चाहते. तर्क अचूक नहीं होता. वितर्क और कुतर्क भी उसके साथ जुड़े होते हैं.
कह सकना मुश्किल है कि भविष्य में हिन्दी का क्या रूप विकसित होगा, पर मन में कहीं एक सपना ज़रूर है कि हिन्दी का अर्थ केवल चीज़ों और उनके उपभोग तक सीमित होकर न रह जाए. वह एक ऐसी आत्म-संस्कृति और जीवन-विवेक की समर्थ आवाज़ भी बन सके जिसकी शक्ति को भारत जैसे देश ने अपने लम्बे और विषम ऐतिहासिक अनुभवों से गुज़रते हुए कई तरह जाना और प्रमाणित किया है.
***

पुस्तक: शब्द और देशकाल
लेखक: कुंवर नारायण
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन
विधा: लेख संकलन
पृष्ठ संख्या: 128
मूल्य: 225/- रुपए हार्डबाउंड

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