Sahitya AajTak
Sahitya AajTak

15 अगस्त स्पेशलः कृष्णा सोबती के उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' का अंश

देश जब आजादी की 73वीं वर्षगांठ के जश्न में डूबा हुआ है, तब पढ़िए उस दौर पर लिखी प्रख्यात लेखिका कृष्णा सोबती के उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' का एक अंशः

Advertisement
aajtak.in
aajtak.in नई दिल्ली, 15 August 2019
15 अगस्त स्पेशलः कृष्णा सोबती के उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' का अंश उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

सदियों-सदियों के बाद देश में अवतरित होनेवाली आजादी हर हिंदुस्तानी दिल में धड़कती रही थी. इस उमगती विरासत को राजनीतिक शक्तियों ने विभाजित कर देश का नया भूगोल और इतिहास बना दिया. नई सरहदें खींच दीं. फिर भी हर हिंदुस्तानी के दिल में धड़कता यह अहसास था कि विभाजन के अँधेरों में उपजी 'आजादी' एक पवित्र शब्द है- हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और बरकतों का प्रतीक.

देश जब आजादी की 73वीं वर्षगांठ के जश्न में डूबा हुआ है, तब पढ़िए उस दौर पर लिखी प्रख्यात लेखिका कृष्णा सोबती के उपन्यास 'गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान' का एक अंशः 
***

उदास-सी दुपहरिया को गुँजाते हुब्बुलवतनी के ये बोल मँझली के तन-बदन को लहरा गए. सड़क पर शायद गोलाकार बिजली का ट्रांसफार्मर धकेला जा रहा है. लाहौर हॉस्टल में आई मँझली ने अखबारों में से लीडरों की तस्वीरें काटते-काटते कैंची कुशन पर रखी और परदा उठाकर बाहर झाँका. दूर होती 'होइश्शा’ की घनीली आवाज के साथ सहसा घोड़े की टाप मिलकर कुरेशी अंकल के घर के सामने आकर रुक गई. परदा उठा लॉन के पार देखा.

यह भी चले जा रहे हैं. सामान ताँगे में रखा जा रहा है. पी.डब्ल्यू.डी. के चौकीदार साहिब ताला डालने को मुस्तैदी से खड़े हैं. तो आज जा रही है- लाहौर जानेवाली पाकिस्तान स्पेशल. कुरेशी आंटी ने ताँगे के पायदान पर पाँव रखा- एक बार पलटकर घर की ओर देखा और आँखें पोंछीं. उसने आंटी का हाथ छुआ और रोने लगी. वैसे ही जैसे वह होस्टल के फाटक तक पहुँचकर रोई थी. पलटकर डबडबाई आँखों से एक बार फिर अपने कमरे की ओर देखा था और दौड़कर कमरे के दरवाजे पर जा खड़ी हुई थी. मन ही मन दोहराया था- बहती हवाओं, याद रखना हम यहाँ पर रह चुके हैं. लौटकर फाटक पर पहुँची तो लगा वह कमरा हमेशा के लिए दूर जा चुका था. कुरेशी अंकल ने पुचकार कर सिर पर हाथ रखा और कहा, जाओ बिटिया जाओ- बाहर खड़े रहने का वक्त नहीं.

अंकल गुडबाइ-
-गुडबाइ, जीती रहो.

वह मोड़ से ओझल होते ताँगे को देखती रही. फिर घर की ओर बढ़ी. आखिरी स्पेशल आज ही जा रही है, तो राहत हैदर भी स्टेशन के लिए निकल जाएँगे. वह घर की ओर जाते-जाते कर्जन रोड की ओर लपकी. बाराखम्भा लेन यह रही- उनके जाने से पहले पहुँच लूँगी. वह तेज-तेज डग भर कीलिंग रोड की पटरी पर चलने लगी. घने पेड़ों पर पाखियों का शोर दिल को उदास कर रहा था। चौराहे से बाराखम्भा लेन की ओर मुड़ गई.

कान खड़े हुए. क्या ताँगों की छनछनाहट! नहीं. बँगलों की कतार खामोश है. आखिरी बँगले के बरामदे में पाँव रखा- वही पी.डब्ल्यू.डी. का ताला लटका पड़ा है. वह खड़े-खड़े कुछ देर चुपचाप देखती रही- लम्बा विराम. फिर सड़क पर हो गई. कहीं पिछवाड़े से मुत्रैनी-सा चेहरा सामने आ खड़ा हुआ- मिस साहिब वह लोग रात को पुराने किले कैम्प में चले गए. आज उनकी स्पेशल ट्रेन निकलनेवाली है. आपके लिए राहत आपा ने लैटरबॉक्स में रुक्का छोड़ा था. मैंने उठाकर सँभालकर रख लिया-

यह लीजिए-

उसने रेतीली खुश्क आँखों से पढ़ा- ''हम लोग चल दिए. पुराने किले आने की कोशिश बिलकुल न करना. गुडबाइ. -राहत हैदर ताहिर."

उसने देनेवाले का शुक्रिया किया और मन ही मन अलविदा कहा और आँखों से बाराखम्भा लेन की नजदीकी को जैसे हमेशा के लिए पोंछ लिया. सड़कें पहले की तरह उजाड़ थीं. पाँव में अपने होने की हिम्मत भरी और कीलिंग रोड को छोड़ हेली रोड की ओर बढ़ गई. क्या कान बज रहे थे, कि कहीं पास से आवाजें उठ रही थीं. हर-हर महादेव! -लाहौर वाली आवाजों की खूनी लड़ाई यहाँ भी. जल्दी-जल्दी तेजी से घर की ओर बढ़ी कि हेली रोड के पिछवाड़े सहमी-सी पड़ी बाऊली से सयानी आवाज ने चेतावनी दी- यह वक्त हवा खाने का नहीं. कोई मार फेंक देगा. समझी मुनिया. पीर का दिन दिल्ली के लिए बहुत खतरनाक है. पीर के दिन शहर दिल्ली मुगलों के हाथों से गया, पीर के दिन ही अंग्रेज ने इस पर कब्जा किया, आज के हालात तो देख रही हो न? जाओ- यह हवा खाने की दुपहर नहीं.

कर्जन रोड पर दो-एक कारें खामोशी को समेटते हुए, यह जा और वह जा. सोचा घर का दरवाजा तो खुला न होगा. चुपचाप नौब घुमाने से भी चलेगा नहीं. काँच पर हौले से आवाज करने से शायद जगदीश भाई दरवाजा खोल दें. ऐसा न हुआ तो सम्बन्धियों की भीड़ उसके पीछे पड़ जाएगी. कोई न कोई जरूर उस पर बोलेगा- अरी! इस गदरी वक्त में कहाँ घूम रही थी? दफा करो अपने इन हमसायों को.

उसने चुपीती आँखों से कुरेशी अंकल के दरवाजे की ओर देखा. हमारे लिए वह हमेशा को बन्द हो चुके. देश का बँटवारा और आजादी एक साथ. अपने बरामदे में पाँव रखते ही रफ्तार में कुछ ऐसी खींच पड़ी ज्यों किसी हमले का सामना करना हो.

दरवाजा खटखटाना नहीं पड़ा- भिड़ा था और बाहर किसी की थकी-हारी बदरंग पेशोरी जूतियाँ पड़ी थीं. तो एक और कोई अपना सम्बन्धी, अपने ही वतन से भागा हुआ जख्मी घायल. जाने कैसा हिसाब बना- कोई यहाँ से गया और कोई वहाँ से आया- राहों में मार-काट, दीवानगी- यहाँ से रवानगी तो वह गए, वहाँ से पीठ तो कुछ यहाँ पहुँचे, कुछ रास्ते में ही...

मरजाई चक वाले मामा ने खट्टी आवाज के बोल उस पर बुहार दिए.

काकी अब किसे रुखसत कर आईं- अरी हम अन्दर ही अन्दर घुख मर रहे हैं और तुम अब भी सरकारी मुँह-मुलाहजों पर हो. राख डालो गोरी सरकार और अपने डराकल लीडरों पर जिन्होंने मुसलमानों को पहले सिखाया-पढ़ाया था फिर अपने वतन की चीर-फाड़ कर दी.

वह जवाब में कुछ कहे न कहे कि मामा आँखें मूँद फिर अपने अन्दर हो गए. हारे हुए यह सब और उनके बुचके, पोटलियाँ, बदरंग पुरानी सन्दूकचियाँ, गठरियाँ, मैले-अधमैले दुपट्टे, चेहरे- पिटी हुई नफरत से तपते हुए- कोई ठंडी हुई खूँखार नफरत से निढाल, कोई जवान बेटे के बिछुड़े चेहरे के साथ सटा- कोई बेटी के रांगले चूड़ों पर सलाखों को गोंदते हुए- हाय ओ रब्बा- उसकी बाँहें- कोई पीछे छूट गए बूढ़े माँ-बाप को याद करता- घरों को पागलखाना बना दिया- सियासत ने. सारा शहर भरा है अपने-अपने घरों से फेंके गए वजूदों से. इनसानी चिथड़ों से. स्टेशन, प्लेटफॉर्म, पटरियाँ, गलियाँ, चौक-बाजार और खँडहरों के आसपास फैली तितर-बितर खूँरेजियाँ. नेताजी सुभाष के मुँह से निकली यह ऐलानी चुनौती जैसे पंजाब, बंगाल और सिन्ध के लिए पेशीनगोई बन गई. दिल्ली चलो, मरो, कटो मगर दिल्ली चलो.
दिल्ली- भारत की राजधानी दिल्ली, नई दिल्ली, शाहजहांनाबाद, पुरानी दिल्ली, चिराग दिल्ली- एक नहीं अनेक दिल्लियाँ. आजाद पाकिस्तान की पहली दिवाली होगी. झंडा फहराया जाएगा. अल्लाह-ओ-अकबर की ऊँची तरंगें उठेंगी. आवाजें- पाकिस्तान जिन्दाबाद, मुहम्मद अली जिन्ना पाइंदाबाद! वे लड़े, उन्होंने पाया, हम डरे, हमने गँवाया. बापू गांधी तुमने हमारे घर-बाहर, धरती-पानी सब पराए कर दिए. यह कैसी सियासत!

सिकन्दर लाल की मैली पगड़ी ऊँघते हुए सिर पर से सरकने लगी. कड़वे गले से बोले- ब्रादर, यह तवारीख का काला सपारा सियासत पर यूँ गालिब हुआ कि जिन्ना ने दौड़ाए इस्लामी घोड़े और गांधी, जवाहर ने पोरसवाले हाथी. दिमागी घोड़े दौड़ा उन्होंने मुल्क बना लिया और यह हाथियों का झुंड लिये अपने बन्दे पेड़ों की टहनियाँ तोड़-तोड़ नीचे फेंकते रहे. वही पुरानी तवारीख.

उर्दू अखबारों का कीड़ा बलदेवराज नन्दा बुजुर्गों को समझाने के अन्दाज में बोला- अब ऐसी जिरह से क्या फायदा! जो होना था सो हो चुका। सवाल तो यह है कि कल आजादी के बाद सरकार हमें क्या देती है?
***

पुस्तकः गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान
लेखकः कृष्णा सोबती
विधाः उपन्यास
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
कीमत: रुपए 295/- पेपरबैक
पृष्ठ संख्याः 255

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay