फिदेल कास्त्रो: किताब एक जिंदा क्रांति, एक सच्चे जीवन पर

फिदेल कास्त्रो अपने जीवनकाल में पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद-विरोध का प्रतीक बन चुके थे. मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में मुट्ठी-भर साथियों को लेकर कास्त्रो ने क्यूबा के तानाशाह बतिस्ता और उसके पोषक अमेरिकी साम्राज्यवाद को सदा-सदा के लिए क्यूबा से विदा कर दिया था.

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Aajtak.inनई दिल्ली, 13 August 2019
फिदेल कास्त्रो: किताब एक जिंदा क्रांति, एक सच्चे जीवन पर पुस्तक फिदेल कास्त्रो का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]

फिदेल ऐलेजैंड्रो कास्त्रो रूज़ की आज जयंती है. आप सोच रहे होंगे कि साहित्य से फिदेल का क्या वास्ता? वाकई अगर हिंदी में वी. के. सिंह ने यह किताब 'फिदेल कास्त्रो' न लिखी होती तो हम यहां उनकी चर्चा न कर रहे होते. फिदेल कास्त्रो अपने जीवनकाल में पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद-विरोध का प्रतीक बन चुके थे. मात्र पच्चीस वर्ष की आयु में मुट्ठी-भर साथियों को लेकर और बिना किसी बाहरी मदद के फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा के तानाशाह बतिस्ता और उसके पोषक अमेरिकी साम्राज्यवाद को सदा-सदा के लिए क्यूबा से विदा कर दिया था.

क्यूबा के शोषित-पीड़ित किसानों, मजदूरों को क्रन्तिकारी योद्धाओं में बदलने वाले और अपने देश को सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर एक बेहतर राष्ट्र के रूप में विकसित करनेवाले फिदेल कास्त्रो ने अन्तरराष्ट्रीयता की नयी परिभाषाएं गढ़ीं और समूची दुनिया को हर तरह की विषमता से मुक्त करने का एक बड़ा सपना देखा. आज इस सपने को विश्व का हर वह इन्सान अपने दिल के करीब महसूस करता है जो इस दुनिया को मनुष्य के भविष्य के लिए एक सुरक्षित आवास में बदलना चाहता है.

क्यूबा की क्रांति का पैरा-दर-पैरा इतिहास बतानेवाली इस पुस्तक के केंद्र में फिदेल कास्त्रो का जीवन है. लेखक के व्यापक शोध और गहरी प्रतिबद्धता से उपजी यह पुस्तक न सिर्फ फिदेल के जीवन, बल्कि क्यूबा तथा शेष विश्व की उन राजनीतिक-आर्थिक परिस्थितियों का भी तथ्याधारित विवरण देती है, जिसके बीच फिदेल का उद्भव हुआ और क्यूबा-क्रांति संभव हुई.

इस पुस्तक में क्रांति की प्रेरक उस विचार-निधि को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है जिसके कारण फिदेल का सपना, पहले क्यूबा और फिर दुनिया के हर न्यायप्रिय व्यक्ति का संकल्प बना. इस पुस्तक से हमें फिदेल के सबसे भरोसेमंद साथी चे गुएवारा को भी काफी नजदीक से जानने का मौका मिलता है, जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य दुनिया में जहाँ भी साम्राज्यवाद है, उसके विरुद्ध संघर्ष करना था, और अल्प आयु में ही जीवन बलिदान करने के बावजूद जो आज हर जागरूक युवा ह्रदय में जीवित हैं!

फिदेल: एक जिन्दा क्रान्ति, एक सच्चा जीवन

फिदेल कास्त्रो को घटनाओं और उपलब्धियों के दायरे में नहीं परखा जा सकता. दरअसल, फिदेल को किसी भी दायरे में रखकर नहीं परखा जा सकता. फिदेल एक विचार, एक आदर्श, एक सपने का नाम है. मनुष्य और मनुष्यता की असीम सम्भावनाओं का नाम है. विचार, आदर्श, सपने और सम्भावनाएं सीमाओं के मोहताज नहीं होते. अनगिनत नामों और उपाधियों- क्यूबाई क्रान्ति का कमांडेंट एन जेफे (कमांडर-इन-चीफ), मैक्सिमो लिडेर (महानतम नेता), क्यूबा की आधी सदी का राष्ट्राध्यक्ष, नए क्यूबा का निर्माता, नई दुनिया, नए समाज की उम्मीद, क्यूबा की काउन्सिल ऑफ स्टेट का अध्यक्ष, क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रथम सचिव- इन सब सीमाओं से परे केवल एक नाम फिदेल के व्यक्तित्व कृतित्व की मुकम्मल पहचान है- 'फिदेल.'

क्यूबा की क्रान्ति के सन्दर्भ में फिदेल का कहना है: 'क्यूबा की क्रान्ति को क्यूबा के नजरिए से देखना समझना होगा.' फिदेल के जीवन को भी फिदेल के नजरिए से देखना-समझना होगा. फिदेल के अनुसार उन्होंने अपना सारा जीवन पूरी सहजता और शान्ति से जिया है.

अमेरिका या फिर उसके चन्द सहयोगियों द्वारा फिदेल को तानाशाह, क्रूर या सनकी करार दिए जाने को लेकर फिदेल का कहना है कि यह दुनिया में नफरत का जहर फैलाने की साम्राजी मुहिम का हिस्सा है. वे सोचते हैं कि अगर आप लगातार प्रचार करते रहे कि यह आदमी शैतान से भी खतरनाक है, लोग उससे धीरे-धीरे नफरत करने ही लगेंगे.

फिदेल का प्राधिकार ऐतिहासिक सन्दर्भों से उन्हें हासिल जनता की शक्ति, जनता के बीच प्रभाव और जनता के सम्मान पर आधारित है, जिसका उन्होंने कभी दुरुपयोग नहीं किया- मनमाने निर्णय, आदेश, या डिक्री से कभी सरकार नहीं चलाई. क्यूबा में राष्ट्रपति प्रणाली की सरकार नहीं है. राष्ट्रीय संसद और मंत्री परिषद है, उसका सामूहिक नेतृत्व है. हर महत्त्वपूर्ण निर्णय सोचने-समझने-विचार-विमर्श-बहस करने के बाद सामूहिक रूप से लिया जाता है. राष्ट्रपति द्वारा मंत्रियों या राजदूतों की नियुक्ति नहीं होती. अगर इसका नाम तानाशाही है तो यह ऐसा सोचनेवालों की समस्या है.

किसने अपना सारा जीवन अन्याय के खिलाफ, हर तरह के दमन-शोषण-अत्याचार के खिलाफ, दूसरों के लिए काम करते हुए, दूसरों के लिए  लड़ते हुए, लोगों के बीच एकजुटता, सहयोग और अपनत्व को विकसित करते हुए बिताया है? किसने हमेशा मनुष्य की शारीरिक और मानसिक गरिमा की सुरक्षा का ध्यान रखा है? क्यूबा में किसी बन्दी को यातना नहीं दी जाती, किसी की हत्या नहीं होती, कोई 'गायब' नहीं, कोई 'सफाया' नहीं होता.

क्यूबा में कभी आपातकाल नहीं लागू किया गया- कभी किसी विरोध-प्रदर्शन पर एक भी लाठी, आँसू गैस या गोली नहीं चली. इन सबका एक अपवाद भी नहीं मिल सकता. क्यूबा की क्रान्ति जनता की, समूचे राष्ट्र की अपनी क्रान्ति है, उनके अपने खून, अपनी ताकत से हासिल और उनके अपने समर्थन, अपनी कोशिशों और अपनी हिम्मत से रक्षित. तमाम अफ्रीकी, एशियाई, लातिनी अमेरिकी देशों की जनता के अपने अत्याचारी-क्रूर-दलाल शोषकों से मुक्ति की आवाज पर क्यूबा के लाखों नौजवान स्वयंसेवकों ने उनके संघर्षों में साथ दिया, अपना खून बहाया, शहादतें दीं.

लातिनी अमेरिका और उससे बाहर भी, तीसरी दुनिया के तमाम देशों में हजारों क्यूबाई डॉक्टर, चिकित्साकर्मी, शिक्षक, कृषि-विशेषज्ञ अपनी सेवाएँ दे रहे हैं. लातिनी अमेरिका और पूरी दुनिया से दसियों हजार छात्र चिकित्सा-विज्ञान की विशेषज्ञ शिक्षा मुफ्त हासिल कर रहे हैं. यदि इन सबका नाम तानाशाही, क्रूरता और सनक है तो यह सोच की समस्या है.

अपने जीवन के बारे में फिदेल का कहना है कि वह हमेशा, खुद को लेकर सबसे कठोर रहते हैं, हमेशा अपनी गलतियाँ निकालते हुए, खुद से लड़ते हुए. उन्हें काम पर यकीन है, दिखावे पर नहीं. आप को हमेशा अपने अन्दर से, अपनी प्रवृत्तियों से लड़ते रहना होता है. उनका मानना है कि यह शिक्षण है, गम्भीर और लगातार चलनेवाला, कभी हार नहीं मानने वाला स्व-शिक्षण जो एक अदने से प्राणी को मनुष्य बनाता है.
 
इनसान की ऊर्जा का स्रोत उसकी शारीरिक क्षमता नहीं, उसका संकल्प, उसकी प्रतिबद्धता है- इसलिए उम्र के साथ ऊर्जा घटती नहीं, ज्यादा उत्साह, ज्यादा प्रतिबद्धता, ज्यादा आवेग लाती है.

फिदेल कभी निराश नहीं होते, कभी हार नहीं मानते, कभी मैदान नहीं छोड़ते. जनता पर उनका अविचल विश्वास है, जनता को लेकर कभी उन्हें निराशा-हताशा नहीं हुई. फिदेल कहते हैं कि पूरे जीवन में विश्वासघात की मुश्किल से दो-चार गिनी-चुनी घटनाओं से उनका सामना हुआ होगा. क्रान्तिकारी संघर्ष और नवनिर्माण अभियान के 90 नेता फिदेल के 26 जुलाई आन्दोलन से रहे हैं. उनमें कोई भी ऐसा नहीं निकला जिसने क्रान्ति से विश्वासघात किया हो. सबके सब अपने अन्तिम दम तक क्रान्ति के साथ और क्रान्ति के लिए जीते रहे.

अपने सहयोगियों-साथियों को याद करते हुए फिदेल कहते हैं कि वे तमाम योद्धा जो मोन्काडा या ग्रान्मा अभियान के साथी थे- चे, केमिलो, राउल, अल्मीडा और तमाम साथी- वाल्देस, गार्सिया- क्रान्ति के तमाम कमांडेंट वे असाधारण लोग थे या हैं जिन्होंने संकट की, निर्णय की हर घड़ी को फौलादी प्रतिबद्धता के साथ जिया, एक भी अवसर पर, एक भी क्षण के लिए विचलित हुए बिना.

आज क्रान्ति के साथ उन अगली पीढ़ियों के नए विचारों, नए मूल्यों, नए खून और नई ऊर्जा का भी हुजूम है, जो क्रान्ति विजय के समय तक पैदा नहीं हुए थे. उनमें न जाने कितने क्रान्ति के नायकों, योद्धाओं, शहीदों के रक्त से पैदा हुए हैं. ये कभी क्रान्ति के साथ विश्वासघात नहीं कर सकते.

अपनी वर्दी के बारे में फिदेल कहते हैं कि सियेरा अभियान के जमाने से ही वह इसे हमेशा पहनते आ रहे हैं और इसमें खुद को सबसे सहज महसूस करते हैं. इसकी आदत सी हो गई है. फिदेल की वर्दी में सियेरा के जमाने से ही लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है. अनगिनत संघर्षों के विजयी योद्धा फिदेल अपनी वर्दी पर कोई तमगा, कोई अलंकरण नहीं लगाते.

आगे के दिनों में नागरिक परिधानों को भी पहनने को लेकर वह याद करते हैं कि 1994 में सेन्टियागो डे-ला-इन्डिया के इबेरा-अमेरिकी शिखर सम्मेलन में कोलम्बियाई मेजबानों ने सभी राष्ट्राध्यक्षों से कोलम्बियाई पारम्परिक परिधान 'गुयाआबेरा' पहनने का आग्रह किया. उसके बाद से वह अन्तर्राष्ट्रीय बैठकों-सम्मेलनों के अवसर पर और क्यूबा में भी विशेष अवसरों पर 'नागरिक सूट' पहनते रहे हैं.

फिदेल को उनके पिता ने 14-15 वर्ष की आयु में उनकी पहली सिगार 'प्यूरो हबानो' थमा दी. तबसे वह बराबर सिगार पीते रहे और यह उनकी छवि, पहचान का एक हिस्सा बन गई थी. फिदेल ने करीब पिछले तीस सालों से सिगार को हाथ नहीं लगाया.

फिदेल कहते हैं कि यह देश की भलाई और जनता के स्वास्थ्य के लिए उनका जरूरी त्याग था. मोटापा, मनमानी जीवनशैली और तम्बाकू के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले भयावह दुष्प्रभावों को सुनते हुए फिदेल ने फैसला लिया कि जन-स्वास्थ्य के हित में उन्हें यह आदत छोड़ देनी चाहिए.

अपनी गलतियों को लेकर फिदेल का मानना है कि उन्होंने गलतियाँ की हैं मगर वे सब कार्यनीतिक भूले थीं न कि रणनीतिक भूलें. क्यूबाई राष्ट्र और समाज नवनिर्माण के लिए अपने प्रयासों को लेकर कभी पछतावे की स्थिति नहीं आई.
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पुस्तकः फिदेल कास्त्रो
लेखकः वी.के.सिंह
विधा: जीवनी
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन
कीमत: 295/-रुपए पेपरबैक
पृष्ठ संख्याः 412

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