जयंती विशेषः बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'देवी चौधरानी' का अंश

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने कुल 15 उपन्यास लिखे. इनमें 'देवी चौधरानी' एक ऐसी नारी की गौरव गाथा पर आधारित है, जो ससुराल से निकाल दिए जाने पर भी आजीवन पतिपरायणा बनी रही.

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aajtak.in नई दिल्ली, 27 June 2019
जयंती विशेषः बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'देवी चौधरानी' का अंश बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'देवी चौधरानी' का कवर [सौजन्यः मैपल प्रेस]

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने कुल 15 उपन्यास लिखे. इनमें से आनंदमठ, दुर्गेश नंदिनी, कपालकुंडला, मृणालिनी, चंद्रशेखर, देवी चौधरानी, राजसिंह आज भी बेहद लोकप्रिय हैं. 'देवी चौधरानी' उपन्यास में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय भारतीय स्त्रियों की दुर्दशा को जीवंत रूप दिया है. प्रफुल्ल एक गरीब लड़की है, जिसका विवाह सुखी-सम्पन्न परिवार में होता है. परंतु गरीबी के कारण उसे घर से निकाल दिया जाता है. इसके बाद वो पूरी कहानी में संघर्ष करती नजर आती है. 'देवी चौधरानी' एक ऐसी नारी की गौरव गाथा है, जो ससुराल से निकाल दिए जाने पर भी आजीवन पतिपरायणा रही.

इतना ही नहीं डाकुओं के चंगुल में पड़ कर वह डाकू भले ही बन गई हो, पर उस ने कभी डाका नहीं डाला, कभी किसी को सताया नहीं. कालांतर में अपार धनदौलत की मालकिन हो कर भी उस ने सदैव गरीबों और निस्सहायों का उपकार किया. फिर भी क्या वह अपने पति का प्रेम पा सकी? इस कहानी में स्त्री के मजबूत इरादों को सुंदर तरीके से उकेरा गया है.

बंगला और हिंदी ही नहीं विश्व साहित्य के महान लेखक बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की जयंती पर साहित्य आजतक पर पढ़िए उनके उपन्यास 'देवी चौधरानी' का अंश.

उपन्यास अंशः देवी चौधरानी

प्रथम-खण्ड
प्रथम परिच्छेद

"प्रफुल्ल, अरी ओ प्रफुल्ल! अरी मुंहजली."

"आई माँ!"

माँ ने आवाज दी और बेटी आ गई.

"क्या माँ?" वह बोली.

"जा घोष के घर से एक बैंगन ले आ." माँ ने कहा.

"मैं नहीं लाऊंगी माँ! मुझे शर्म आती है भीख मांगने में."

"तब खायेगी क्या? घर में आज कुछ भी नहीं."

"केवल भात ही खा लूंगी! भला रोज-रोज मैं क्यों मांगने जाऊं."

"तो फिर ऐसा ही भाग्य लेकर जन्मी होती. भला गरीबों को मांगने में कैसी शर्म!"

प्रफुल्ल कुछ नहीं बोली. "तब तू भात चढ़ा दे, मैं तब तक जरा तरकारी का प्रबंध कर लूं."

प्रफुल्ल ने कहा- "भीख मांगने मत जाना, तुम्हें मेरी सौगंध है. घर में चावल है, नमक है, पौधे पर कच्ची मिर्च लगी है, और क्या चाहिए औरतों को."

प्रफुल्ल की माँ खुश हो गयी. भात का पानी चढ़ा दिया था, माँ चावल धोने चली गयी.

चावल की हांडी देखकर माँ ने माथा पकड़ लिया, बोली- "चावल कहाँ है?" प्रफुल्ल को दिखलाया- केवल आधी मुट्ठी चावल था, "इतने में तो एक व्यक्ति के पेट भी नहीं भरता?"

माँ हांडी लेकर बाहर आयी. प्रफुल्ल ने कहा, "कहाँ जा रही हो?"

माँ- "कुछ चावल उधार ले आऊं, नहीं तो कोरा भात भी नसीब नहीं होगा."

प्रफुल्ल- "हम लोगों ने कितना चावल उधार ले लिया, परंतु अभी तक लौटाया नहीं. अब और उधार मत लाओ."

माँ- "अरे अभागन, खाएगी क्या? घर में एक भी पैसा नहीं है."

प्रफुल्ल- "व्रत कर लूंगी."

माँ- "कितने दिन तक रखेगी व्रत? कैसे जिएगी?"

प्रफुल्ल- "तो मर जाऊंगी."

माँ- "मेरे मर जाने पर जो मन में आये सो करना. पर तू व्रत करके मरेगी, यह मैं देख नहीं सकती. कैसे भी हो, तुझे भीख मांगकर भी खिलाऊंगी."

प्रफुल्ल- "कोई जरूरी है क्या भीख मांगना? आदमी एक दिन उपवास रखने से मरता नहीं. आओ माँ! माँ-बेटी मिलकर यज्ञोपवीत बनायें. कल बेचकर पैसों की व्यवस्था कर लेंगी."

माँ- "सूत कहाँ हैं?"

प्रफुल्ल- "चरखा तो है."

माँ- "लेकिन रूई कहाँ है."

प्रफुल्ल नीचे मुंह करके रोने लगी. माँ हांडी लेकर फिर चावल उधार लेने चली गयी. प्रफुल्ल ने माँ के हाथ से हांडी दूर रख दी.

"माँ मैं भीख मांगकर, उधार मांगकर क्यों खाऊं? मेरे पास तो सब कुछ है." प्रफुल्ल बोली. माँ आँसू पोंछकर बोली, "बेटी, सब तो है पर भाग्य कहाँ है."

प्रफुल्ल- "भाग्य क्यों नहीं होता माँ! क्या गुनाह किया था मैंने, जो ससुर के पास अन्न होते हुए भी नहीं खा पाऊं."

माँ- "इस अभागिन की कोख से जन्मी यह गुनाह और तेरी किस्मत."

प्रफुल्ल- "सुनो, मैंने अब फैसला कर लिया है माँ-भाग्य में ससुर का अन्न है तो खाऊंगी, नहीं तो न खाऊंगी. तुम जैसे भी भीख मांगकर खा लो चाहे, पर मुझे मेरी ससुराल पहुँचा दो."
 
माँ- "यह क्या बेटी, भला ऐसा भी हो सकता है!"

प्रफुल्ल- "क्यों नहीं हो सकता माँ."

माँ- "बिन बुलाये क्या ससुराल जाया जाता है."

माँ- "वो लोग तो भूलकर भी तुम्हारा नाम नहीं लेते."

प्रफुल्ल- "मत लें. इसमें मेरा अपमान नहीं है. जिस पर मेरे भरण-पोषण की जिम्मेदारी है, उससे अन्न की भीख मांगने में मुझे शर्म नहीं आती अपना ही धन तो मांगकर खाऊंगी, इसमें शर्म की क्या बात है."

माँ धीरे-धीरे रोने लगी. प्रफुल्ल ने कहा- "तुम्हें अकेली छोड़कर जाने का मेरा मन नहीं होता, लेकिन मेरा दुःख दूर होने पर ही तो तुम्हारा दुःख घटेगा. इसी आशा से जाना चाहती हूँ."

काफी देर तक माँ-बेटी में बातचीत हुई. माँ ने सोचा- बेटी का कहना उचित है. माँ ने जो चावल था बनाया, परन्तु बेटी ने किसी भी तरह खाना मंजूर नहीं किया. अतः माँ ने भी नहीं खाया. प्रफुल्ल बोली- "रास्ता बहुत लंबा है, समय खराब करने से क्या लाभ."

माँ ने कहा- "आ, तेरे बाल बांध दूं."

प्रफुल्ल बोली- "रहने दो."

माँ ने सोचा- "मेरी बेटी को सजाने की जरूरत ही नहीं पड़ती." और बेटी ने सोचा, "सज-संवरकर क्या किसी को लुभाने जाऊं? छिः."
गंदे कपड़े पहने ही दोनों घर से निकलीं.

***
पुस्तकः देवी चौधरानी
लेखकः बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय
विधा: उपन्यास
प्रकाशनः मैपल प्रेस
कीमतः रुपए 110/-
पृष्ठ संख्या: 168

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